आमतौर पर माना जाता है कि सास अपनी बहुओं को प्रताड़ित करती हैं या उन पर तरह-तरह के जुल्म ढाती हैं, लेकिन यह सिक्के का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि आज अनेक सास भी प्रताड़ित हो रही हैं अपनी बहुओं से। अब यह बात अलग है कि प्रताडऩा के बावजूद वे उफ तक नहीं करतीं अन्यथा बहुएं उन्हें वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा दें।
 
स्थिति उलट है
सदियों से सास के बारे में प्रचलित है कि उसमें दया, ममता, प्रेम नाम की कोई चीज नहीं होती है अथवा वह किसी जल्लाद से कम नहीं होती। सच तो यह है कि वे मुफ्त में ही बदनाम हैं। आमतौर पर कोई सास अपनी बहुओं के साथ बुरा व्यवहार नहीं करती, अपितु आज स्थिति इससे उलट है। बहुओं को सास की आवश्यकता तभी तक है, जब तक कि बच्चे छोटे हैं ताकि उन्हें रख सकें। बच्चों के बड़े हो जाने या सास के बूढ़ी हो जाने पर उन्हें उनकी आवश्यकता नहीं रहती और यहीं से शुरू होती है सास की उपेक्षा होना। जब तक सास युवा या प्रौढ़ रहती है, तभी तक उसकी चलती है और उसके वृद्ध या विधवा होते ही सत्ता बहुओं के हाथ में आ जाती है। अपने साथ हो रहे अपमानजनक व्यवहार की पीड़ा वे किससे कहें? कौन उनकी पीड़ा समझेगा? ऑल इंडिया मदर्स-इन-ला
 
प्रोटेक्शन फोरम
ऑल इंडिया मदर्स-इन-ला प्रोटेक्शन फोरम (एआईएमपीएफ) के बैनर तले 700 सासुओं ने बहुओं की हिंसा और यातना से बचाने और संपत्ति के अधिकार जैसी मांगों को लेकर एक संगठन बनाया है। इसकी सदस्यों में फोरेंसिक एक्सपर्ट, वकील, डॉक्टर, प्रोफेसर, प्रोफेशनल और घरेलू महिलाएं शामिल हैं। इस संगठन का अगला कदम दहेज उन्मूलन और घरेलू हिंसा कानून में बदलावों पर जोर देने का होगा। इस बारे में संगठन ने राष्ट्रीय महिला आयोग व पुलिस को पत्र लिखकर बहुओं के खिलाफ सासुओं की शिकायत को दर्ज करने का आग्रह किया है। संगठन इन मुद्दों पर न्यायपालिका के रुख में भी परिवर्तन चाहता है। संगठन की समन्वयक नीना धुलिया कहती हैं, ‘अब यह आंकड़ों से साबित हो चुका है कि सासों को बेवजह बदनाम किया जाता है। असल जिंदगी में वही पीडि़त हैं, जो सब कुछ चुपचाप सहन करती हैं। भारत में 31 फीसदी बुजुर्ग महिलाएं अपने ही घरों में सताई जा रही हैं। इन्हें सताने के मामले में 23 फीसदी बहुएं जिम्मेदार हैं। 55 फीसदी बुजुर्ग सास अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की शिकायत किसी से नहीं करतीं। शायद ऐसा अपनी इज्जत को बचाए रखने के लिए करती हैं।
 
प्रताडऩा का शिकार
एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार करीब एक तिहाइ बुजुर्ग महिलाएं अपनी बहुओं की प्रताडऩा का शिकार है। यह सर्वे 33 जिलों में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम से जुड़े एक एनजीओ एजवेल रिसर्च एंड एडवोकेसी सेंटर की ओर से किया गया। इसके लिए एक पूरी प्रश्नावली तैयार की गई थी।
 
बुजुर्ग महिलाएं सबसे अवांछित 
सर्वेक्षण की रिपोर्ट कहती है कि बुजुर्ग महिलाएं परिवार की सबसे अवांछित सदस्य मानी जाती हैं जिनकी परिवार में हैसियत खत्म होती जा रही है। वे लगातार प्रताडऩा का शिकार हो रही है और इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि इनमें ज्यादातर अशिक्षित या कम शिक्षित हैं। इनकेपास संपत्ति या खुद का पैसा नहीं है और किसी तरह के रोजगार से भी जुड़ी नहीं हैं। ऐसे में वे अपने घर की चारदीवारी में ही सिमटी हुई हैं।
 
सास की आपबीती
एक वृद्ध सास ने अपनी आप बीती कुछ इस तरह सुनाई, ‘मेरे पति के देहांत के बाद से ही बहू रोजाना छोटी-छोटी बातों को लेकर मुझसे झगड़ा करती है। पिछले एक साल से तो उसने मेरा जीना हराम कर दिया है। बेटा महीने में 20 दिन बाहर रहता है। उसके जाते ही वह अपने तेवर दिखाना शुरू कर देती है। मुझे घर की नौकरानी बनाकर रख दिया है। कामवाली बाई की छुट्टïी कर दी है। झाडू, पोंछा, बर्तन, घर की साफ-सफाई सब मेरे ही जिम्मे है। वह अपने कपड़े भी मुझसे धुलवाती थी। यह सब भी मैं सह लूं, लेकिन बात-बात में झिड़की देना, भद्दी गालियां देना और दुत्कारना मुझे सहन नहीं होता। एक दिन तो उसने किसी बात पर मुझे झाडू से मारा। मैं चीखी, चिल्लाई, दौड़कर पड़ोसी आए तो उनसे कहने लगी, बुढ़ापे में मांजी को दिखता कम है, इसलिए ठोकर खाकर गिर पड़ी। अब मैं क्या कहती कि बहू ने मुझे मारा।
 
 
 
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पांच सालों से घर में कैद
इसी प्रकार कुछ दिनों पूर्व एक समाचार पत्र में एक ऐसी वृद्ध सास के बारे में छपा था जिसे उसकी बहू ने पिछले पांच सालों से घर में कैद कर रखा था। उसे अपने कमरे में बाहर निकलने और किसी से मिलने-जुलने की मनाही थी। बहू जब भी घर से बाहर जाती, सास के कमरे का ताला लगाकर चाबी साथ ले जाती। जब इस बात की भनक मीडिया को लगी और कैमरामैन वहां पहुंचे तो बहू ने स्पष्टीकरण कुछ इस तरह दिया, ‘मेरी सास पागल है, पागलपन में कुछ भी कर सकती है। यहां तक कि मेरी व मेरे बच्चों की हत्या भी।
जब इस वृद्ध सास का मेडिकल चेकअप कराया गया, तो बात बिल्कुल झूठी निकली। वह सामान्य महिला थी जो कि अपनी बहू द्वारा प्रताडि़त थी। उसे ठीक से खाना-पीना नहीं मिलता था, इसलिए वह शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो गई थी।
 
नौकरों जैसा व्यवहार
जिस सास की एक से अधिक बहुएं होती हैं, उनकी बहुत फजीहत होती है, क्योंकि सभी बहुएं बूढ़ी सास का भार एक-दूसरे पर डालने का प्रयास करती हैं। कैसी विडंबना है कि चार-चार बहुओं के होते हुए भी कोई बूढ़ी सास को सहर्ष स्वीकार कर अपने साथ रखने को तैयार नहीं होती। वृद्धावस्था उस समय असहनीय हो जाती है जब अपनी ही बहुएं उनके साथ नौकरो जैसा व्यवहार करती हैं तथा बात-बात पर ताने और झिड़कियां सुनाने लगती हैं। सास की इतनी दुर्दशा है कि उन्हें छोटी-छोटी चीजों के लिए भी अपनी बहुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। कई बार बहुएं अपनी सास को झिड़क देती हैं और बेचारी सास अपमान चुपचाप सहन करती चली जाती हैं। बूढ़ी सास को परिवार में सबसे दयनीय प्राणी के रूप में समझा जाता है। उन्हें बार-बार प्रताडि़त किया जाता है और उनसे ऐसे काम लिए जाते हैं जो उनके सम्मान के खिलाफ है।
 
पैसे पर बहुओं की नजर
वृद्धावस्था में हुई विधवा सास की हालत तो काफी बदतर हो जाती है और जैसे-तैसे वह अपनी जिंदगी के बाकी बचे हुए दिन काटती है। क्योंकि उसका सुख-दुख जानने वाला कोई नहीं होता। बहुएं अपने पति और बच्चों में ही व्यस्त रहती हैं। नौकरी पेशा सास को रिटायरमेंट के समय प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्यूटी तथा लिवकेशमेंट का पैसा एक मुश्त मिलता है। इस पैसे पर बहुओं की नजर रहती है तथा वे बहला फुसलाकर उसे हथिया लेती हैं।
 
बुढ़ापे की मूलभूत आवश्यकताएं
बुढ़ापे में भी कुछ मूलभूत आवश्यकताएं बनी रहती हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वृद्धावस्था में शरीर थक चुका होता है और अनेक बीमारियां घर कर जाती हैं। बहुएं बुजुर्ग सास के इलाज पर पैसा खर्च करना धन की बर्बादी समझती हैं। यदि डॉक्टर एक्स-रे, सोनोग्राफी, सिटी स्कैन, एमआरआई आदि कराने को कहता है तो बहुओं के लिए गैर जरूरी है क्योंकि इसमें पैसा लगता है। बात यदि ऑपरेशन की हो तो बहुएं ऑपरेशन करवाने से मना कर देती हैं, क्योंकि उनकी नजर में मौत की दहलीज पर खड़ी सास पर खर्च करने का क्या औचित्य है?
बुजुर्ग सास को बहुएं अपने साथ रखना ही नहीं चाहती, क्योंकि अब उन्हें उनकी जरूरत नहीं है। मतलब निकल जाने के बाद दूध में मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंकना चाहती हैं। आज की बहुओं में सेवा नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। यदि सामाजिक भय से बहुएं बुजुर्ग सास को घर में रखती भी हैं तो वे घर के किसी एक कोने में पड़ी रहकर आंसू बहाते रहती हैं। उनका दुखदर्द जानने की न तो बहुओं की इच्छा है और न ही चाहत। आज नई पीढ़ी के नैतिक मूल्य इतने गिर गए हैं कि बुजुर्ग भी बोझ लगने लगे हैं। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि यह सब बेटों की आंखों के सामने होता है। वे भी अपनी बुजुर्ग मां का साथ देने की बजाय पत्नी के गुलाम बन जाते हैं और उसकी हां में हां मिलाते हैं। 
 
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