मानव स्वभाव गुण दोष का विचित्र संगम है हर अच्छे से अच्छे व्यक्ति में भी कुछ कमियां जरूर होती हैं, पर हर व्यक्ति अपने गुणों की प्रशंसा चाहता है, वह स्वयं तो तारीफ का भूखा है, पर दूसरे की प्रशंसा करने में एकदम कंजूस है औरतें ही नहीं, पुरूष भी ईष्र्या से पीड़ित हैं, कोई स्त्री अपने पति के सामने दूसरे पुरूष की सज्जनता की प्रशंसा भर कर दें तो पति कुढ़ जाएगा, कहेगा, ‘‘हां, सब भले हैं, अच्छे हैं, एक मैं ही खराब हूं”

जरूरी है सही व्यवहार की तारीफ :- सही गुण, सही व्यवहार की तारीफ जरूरी है, पर इतनी अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं कि व्यक्ति की आंखें ही चढ़ जाएं, दिमाग आसमान पर जा बैठे, ज्यादा तारीफ झूठे गर्व से भर देती है और व्यक्ति सीधे मुंह बात नहीं करता। उसे लगात है कि वह वास्तव में वह इसी तारीफ के काबिल है। इन सब से ऊपर है और वह जिन्होंने उस की तारीफ की उन को ही हेय मान बैठता है।

हर चीज की एक सीमा होती है :-  अति हर चीज की बुरी है, जीवन में बुराई नहीं करूंगा। बुरी बात की जगह हर बात का अच्छा भला पक्ष ही देखेंगे, यही नियम होना चाहिए। हर व्यक्ति की भलाई देखनी चाहिए, बुरी बात देखकर भी चुप रहना चाहिए कभी चर्चा चलने पर भी उसकी अच्छी बात ही पेश करनी चाहिए। कोई सामने न हो तो भी इसी का पालन करना चाहिए।

प्रशंसा का जादू चलता है सदा :- प्रशंसा सुन कर दिल जरूर खुश होता है, पर बारबार की तारीफ से नम्रता आदमी में से गुम हो जाती है और उस का स्थान दंभ ले लेता है। व्यक्ति को लगता है मैं श्रेष्ठ हूं मेरे बराबर और कोई नहीं। ऐसा व्यक्ति सबसे पहले उसी को दुतकारता है जिसने बारबार प्रशंसा कर उसे उस स्थिति में पहुंचाया । वह यह समझ बैठता है कि वह वास्तव में प्रशंसनीय है। उस में जरूर कुछ ऐसा है, जो उसे विशिष्टता प्रदान करता है। इस विशेष होने का पूरा श्रेय वह परखने वाले को नहीं, स्वयं को देता है वह सोचता है कि वह है ही इस लायक, तभी तो उसे ऐसा समझा जाता है।

तारीफ कीजिए बनाईए सभी को अपना :- तारीफ जरूर कीजिए, यह किसी को भी अपना बनाने का मंत्र है, पर जरा नियंत्रण में रह कर किजिए बढ़ाचढ़ा कर तारीफ से असलियत खो जाती है और ऊपर दंभ का मुलम्मा चढ़ जाता है। यह चमक संबद्ध व्यक्ति की आंखों को चकाचैंध कर देगी और वह अपने को आप से कहीं उंचा बेहतर समझने लगेगा।

                  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बातचीत में एक संतुलन जरूर रखें :- बच्चा हो, नौकर हो, बड़ा हो, सब से बातचीत में एक संतुलन जरूर रखें, ऐसी तारीफ जिस से आप की कीमत घट जाए, भूल कर भी न करें, नौकर को कभी यह एहसास न कराएं कि आप उस के बिना पंगु हैं, वह वक्त पड़ने पर आप की इसी बात के दाम वसूल करने में नहीं हिचकिचाएगा। बच्चों को भी इतना सिर पर न चढ़ाएं कि वे अपने को आपसे ज्यादा अक्लमंद समझने लगें और जब तब आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें।

दूसरे की तारीफ करें :- दूसरे की तारीफ में कजूंसी न बरतें। पर उतने उदार भी न बने कि दोनों हाथों से प्रशंसा की संपदा भावविभोर हो कर लुटाते फिरें और खुद बाद में उपेक्षित हो कर रह जाएं। इतना ध्यान रखिए कि खुद ही कही बात को बाद में जरूरत पड़ने पर नकारना बड़ा मुशकिल होता है संबंध तो टूटते ही हैं मन में कटुता आती है।