पति-पत्नी की आपसी सहमति आवश्यक

भारतीय संविधान के हिंदू एडाप्शन एक्ट के तहत अगर कोई दंपत्ति बच्चा गोद लेना चाहें, तो यह निर्णय हमेशा पति ही लेगा, अपनी पत्नी की सहमति से। जाहिर-सी बात है कि इस तरह का निर्णय पति-पत्नी की आपसी सहमति के बाद ही होना चाहिए। लेकिन पत्नी को निर्णय लेने के इस अधिकार से वंचित करने को वाजिब नहीं ठहराया जा सकता।

रीती- रिवाजों को दी गई है मान्यता

गोद लेने के निर्णय के अधिकार के मामले में संविधान में अपवाद भी मौजूद है। भारतीय संविधान में रीति-रिवाजों को भी मान्यता दी गई है। खासकर, पर्सनल एक्ट के अंतर्गत आने वाले नियम, प्रथाओं व रीति-रिवाजों से खासे प्रभावित हैं और यही वजह है कि गोद लेने के इस नियम के भी कुछ अपवाद हैं। उदाहरण के लिए केरल के नायर समाज और मेघालय के खासी जनजाति में मातृत्व प्रधान समाज की प्रथाएं रही हैं। यहां पारिवारिक मामलों में मां या पत्नी को अपेक्षाकृत अधिक अधिकार प्राप्त हैं। इसलिए गोद लेने का अधिकार पत्नी पा सकती हैं।

अलग-अलग धर्मो के लिए अलग-अलग नियम

गोेद लेने के मामले में कानून पेंचींदा तो है ही – जैसे हमारे संविधान में अलग-अलग धर्मो के लिए अलग-अलग नियम हैं। हिंदू दंपत्ति अगर बच्चा गोद लेते हैं, वह बच्चा परिवार का एक सदस्य माना जाता है और उसे अपने पिता की संपत्ति पाने का पूरा अधिकार होता है। लेकिन गैर हिंदू दंपत्ति द्वारा गोद लिए गये बच्चे इस अधिकार से वंचित रहते हैं। गैर हिन्दू दंपत्ति गार्जियनशिप एंड वार्ड एक्ट के तहत बच्चा गोद ले सकते हैं, लेकिन उस बच्चे का माता-पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता, न ही वह उस परिवार में सदस्य का दर्जा पा सकता है। इस एक्ट के अनुसार व्यस्क होने तक बच्चे की जिम्मेदारी माता-पिता की मानी जाती है। 18 वर्ष की उम्र के बाद कानूनी रूप से यह संबंध खत्म हो जाता है। भावनात्मक जुड़ाव बना रहे, तो ठीक, लेकिन कानूनन उन पर कोई जोर नहीं चल सकता। यानी 18 वर्ष के बाद गोद लिए बच्चे को उसकी नियति पर छोड़ दिया जाता है। इस नियम को बदलने के लिए बहस तो चल रही है, लेकिन कोई ठोस कदम उठाना संभव नहीं हो पाया है। गार्जियनशिप एंड वार्ड एक्ट के तहत हिंदू दंपत्ति भी बच्चा गोद ले सकते हैं, लेकिन गैर हिंदू दंपत्ति एडाप्शन एंड मेनटिनेंस एक्ट के तहत बच्चा गोद नहीं ले सकते।

बच्चे के लालन-पालन का दायित्व मां के ऊपर अधिक

किसी के लिए भी बच्चा गोद लेने से पहले खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लेना बहुत जरूरी होता है। बच्चे के लालन-पालन की जिम्मेदारियों को समान रूप से तैयार कर लेना बहुत जरूरी होता है। बच्चे के लालन-पालन की जिम्मेेदारी समान रूप से माता-पिता दोनों की होती है, लेकिन मां के ऊपर बच्चे के लालन-पोषण का दायित्व कुछ अधिक माना जाता है और होता भी है। इसलिए बच्चा गोद लेने से पहले मां के लिए इसके हर पहलू की जानकारी होना बहुत जरूरी है।

गौरव की बात है बच्चा गोद लेना

आपने बच्चा गोद लिया है, इसमें शर्म की कोई बात नहीं, बल्कि गौरव की बात है। इसलिए इस तथ्य को छुपाने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए। हमारे समाज में अधिकतर लोगों की ऐसी मानसिकता होती है। अगर किसी ने बच्चा गोद लिया है, तो उसकी एकमात्र वजह औरत का बांझपन मान लिया जाता है।

गोद लिये बच्चे से वजह नहीं छुपानी चाहिए

अक्सर यही एक वजह होती नहीं और अगर यही कारण है भी, तो इसे छुपाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योकि यह बिल्कुल सही कदम है। इस कदम से अपने घर में तो खुशियां आती ही हैं, साथ ही उस एक बच्चे को भी घर और मां-बाप का प्यार-दुलार मिल जाता है। अपने गोद लिए बच्चे से भी यह बात नहीं छुपाना चाहिए कि उसे कैसे अपनाया है। हां, बच्चे को यह बताने के लिए सही समय व सही तरीके का चुनाव जरूरी होता है। मां ही बताये, तो ठीक रहता है। उसके सही मानसिक विकास के लिए उसका सच जानना आवश्यक है और इसके लिए मां से ज्यादा सही व्यक्ति कोई और नहीं हो सकता।

प्यार-दुलार से जीतें बच्चे का दिल

यदि बिल्कुल कम उम्र के बच्चे को गोद लिया है, तो सही वक्त का इंतजार करना चाहिए। धीरे-धीरे किस्से कहानी के जरिये उसे सच बताइए। बच्चे के मन में यह विश्वास पैदा करना चाहिए कि आपकी कोख से पैदा नहीं होने के बावजूद वह आपका अपना है। अगर तीन-चार वर्ष के बच्चे को अपनाया है, तो उसे यह विश्वास दिलाया कि वह आपका अपना है, ज्यादा मुश्किल काम है। फिर भी गलत कहानी गढ़ने से अच्छा है कि सच बताया जाये और प्यार-दुलार से उसका दिल जीता जाये। एक बात का खास ख्याल रखना जरूरी होता है कि रिश्तेदार या मित्र भी बच्चे से उसी प्यार व सहजता से मिलें, जैसे आपसे मिलते हैं। बच्चे को अपने प्रति किये गये व्यवहार में कोई फर्क नहीं महसूस होना चाहिए।

जरूरी है एक उदाहरण

एक उदाहरण यहां देना जरूरी है किसी परिवार ने एक लड़की को गोद लिया। उनके यहां बेटा पहले से था। आपस में उनके संबंध थे, लेकिन पारिवारिक उत्सव के अवसर पर जब रिश्तेदार वगैरह मौजूद होते, तो स्थिति बदल जाती। रिश्तेदारों के लिए वह लड़की बाहर से आयी हुई थी और उससे वैसा ही औपचारिक व्यवहार किया जाता। उसके सामाने घरेलू मसलों पर खुल कर बात करने से लोग कतरा जाते थे। घर के अन्य बच्चों को अपने रिश्तेदारों से जो प्यार-दुलार मिलता, उससे वह लड़की वंचित रह जाती थी। इन सबका उसके मन पर बहुत बुरा असर हुआ। माता-पिता को जब इस बात का अहसास हुआ, तब तक बहुत नुकसान हो चुका था।

इस तरह की मानसिक कुंठा बच्चे में नहीं पैदा हो, इसके लिए एक बात का ख्याल रखना बहुत जरूरी है। अपने मित्रों-परिचितों और रिश्तेदारों को आगाह कर दें कि उनसे आप अपने बच्चे के प्रति कैसे व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं।

समान होना चाहिए दोनों बच्चों के प्रति व्यवहार

पहले से एक बच्चा है और दूसरा गोद लिया है, तो दोनों के प्रति व्यवहार भी समान होना चाहिए। इससे उन बच्चों के आपसी रिश्ते भी मजबूत होंगे। आपको बेटी चाहिए या बेटा, यह तो आपकी इच्छा पर निर्भर करता है, लेकिन इस मामले में भी कुछ नियम लागू होते हैं। यदि एक बेटी है और बेटा गोद लेना चाहें, तो कोई बाधा नहीं है। लेकिन पहले एक बेटा होने बाद आप बेटा गोद नहीं ले सकते। इसी तरह दो लड़के या दो लड़की गोद नहीं ले सकते।

लड़का ही नहीं लड़की भी गोद लें

यह नियम इसलिए जरूरी माना गया, ताकि लोग सिर्फ लड़का ही गोद न लेना चाहें, बल्कि लड़की भी गोद ले। हमारे समाज में बेटे को अधिक अहमियत दी जाती रही है, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि बेटे से ही वंश चलता है।

पुरातन काल में गोद लेने की परंपरा धार्मिक मजबूरी

हमारे देश में गोद लेने की परंपरा बहुत दिनों से है और इसके पीछे भी यही वंश चलाने की मान्यता कारण रही है खासकर, हिंदू समाज में वंश चलाने के लिए जरूरतमंद या इच्छुक दंपत्ति द्वारा बेटा गोद लेने की प्रथा सी रही है। पुरातन काल में यह एक धार्मिक मजबूरी थी। हिंदू धर्म के अनुसार मृत्यु के बाद पिंड दान के लिए भी बेटा का होना आवश्यक होता है। इसीलिए जरूरतमंद दंपत्ति द्वारा अपने नजदीकी रिश्तेदारों में से किसी के बच्चे को गोद लेने का चलन था। खून का संबंध होना आवश्यक समझा जाता था। 

बेटी गोद लेने वालों की संख्या अधिक

समय बदलने के साथ इस मानसिकता में धीरे-धीरे ही सही, लेकिन बदलाव आया है। ऐसी तमाम संस्थाएं काम कर रही हैं, जहां से बच्चा गोद लिया जा सकता है, लेकिन यहां बच्चे की जाति या धर्म का कोई अता-पता नहीं होता। फिर भी बच्चा गोद लेने के इच्छुक दंपत्तियों की कतारें लगी हैं, जिनमें बेटी चाहने वालों की भी अच्छी खासी संख्या है। यह परिवर्तन स्वागत योग्य है।

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