बड़ा पुराना मुहावरा है- ‘तेल देखो, तेल की धार देखो’। अब तेल कौन सा है, उसकी धार कैसी है, किस पर गिर रही है और उसके गिरने का अंदाज़ क्या है, असर क्या है? यह मामला सोचने का है, सोचने से ज्यादा समझने का है और समझने से अधिक झेलने का है। तेल से जुड़ा मुहावरा एक और भी है- ‘न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी’। अब न मन रह गया और न ही राधा, जो कुछ बचा है वह सिर्फ टेढ़ा आंगन है।

तो बात कर रहे थे तेल की धार की। हमारे यहां सरसों का तेल होता है, तिल का तेल होता है,  सूरजमुखी का तेल भी आ गया और छछूंदरों के लिए चमेली का तेल भी आ गया। लेकिन जिस तेल को लेकर हाय तौबा है वह है खाड़ी देशों में पैदा होने वाला बैरेल का तेल। गैलेन में बिकने वाला तेल जिसकी धार को राधा तो राधा पूरी दुनिया के बड़े-बड़े नचैया गवैया तक ढूढ़ रहे हैं लेकिन इसकी धार के आधार से अपनी पटरी बिठा पाने में सभी हथेली मलने को मजबूर हैं। यह तेल जब जमीन के नीचे रेत के टीलों के अन्दर या समुद्र के पानी के अंदर महंगा होता ही है ऊपर आने पर बड़ी से बड़ी सरकार का अर्थशास्त्र फेल हो जाता है। यानी बड़े बड़ों की खुल गई इस तेल के चक्कर में। इस चक्कर ने बड़े बड़ो का तेल निकाल दिया है।

मोहल्ले के लल्लू हलवाई और कल्लू पानवाले जो लखटकिया नैनों के बाण में उलझने की योजनाएं बना रहे थे अब तेल की धार से फिसल कर फिर पुरानी साईकल की सफाई के लिए बीबी का फटा पेटीकोट ढूढने में व्यस्त हो गए हैं या यूं कहें कि तेल की धार से त्रस्त हो गए हैं।  छोटों की कौन कहे बड़े बड़ों के पायजामे ढीले कर दिए हैं, इस तेल की मार ने।

और तो और अमरीका तक ने इस तेल पर नकेल डालने से हाथ खड़े कर दिए हैं। बेचारे छोटे-मोटे देश किस खेत की मूली हैं,  जो इस तेल की धार से मुकाबला कर सकें। बहरहाल अभी तो शुरुआत है अंत की। अभी क्या है बतज़र् एक शायर के- अभी तो दुम ही झड़ी है प्यारे, अभी तो न जाने कितनों की पगड़ी उछलेगी, लुंगी की गांठें खुलेंगी और साड़ी का पल्ला गले का फंदा बनेगा, नाइक के जूतों के तले घिसेंगे। कुछ बेहत्थों दलों की खीस निपुरेगी, भगवाधारी चेहरों पर मुस्कानें चमकेगी, साईकल झाड़ पोछ के तैयार होगी, हाथी भी सूड़ फटकारने के लिए हिले डुलेगा पर यह सब कुछ निर्भर करेगा तेल की धार या कहें तो तेल की मार पर। बेचारा हाथ किस किस के हाथ जोड़ेगा किस किस से हाथ मिलाएगा और किस-किस से हाथ झटकने के रिश्ते झेल पाएगा।

बहरहाल आम आदमी बेचारा पहले भी सिर्फ एक तेल को जानता था जो उसके पसीने से घेलुए में निकलता था । उस बेचारे को महंगे तेल से क्या लेना देना। हर हाल में पहले उसी का तेल निकलना है, ऐसे में छप्पन इंची मुस्कान अगर देश को तेल की बचत करने का उपदेश देते हैं तो भी तेल गरीबी का ही निकलना है। सरकार आखिर सरकार ठहरी।  वह सबकी बचत समेटने के बाद भी सबसे और बचत करने को बोलती रहेगी, क्योंकि इसी कहावत में सत्ता की हनक है। सत्ता का दम है।

सरकार कभी घोड़े पर सवार रहा करती थी अब मोनो, बुलेट की बात करती है एक सत्ताधारी आदमी के पीछे कारों का पूरा काफिला चलता है।  बेचारा आम आदमी कहीं से एकाध बाइक, स्कूटर का जुगाड़ कर भी लेता है तो उसे तेल की धार पैदल कर देती है, ऊपर से बचत का सरकारी फंदा उसके कदमों को लड़खड़ा देता है। गरीबों के पेट कोंच कर, गरीबों का तेल निकालने वालों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है।