एक दिन बातों ही बातों में मैंने अपनी काम वाली बाई से पूछा कि तुम कितना कमा लेती हो तो उसने कहा कि मैं सात घरों में काम करती हूं और मुझे महीने के पूरे 12 हजार मिलते हैं। फिर मैंने पूछा कि तुम क्या करती हो इन पैसों से, उसने कहा कि मैं सारे पैसे पति को दे देती हूं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, मैंने फिर कहा कि तुम अपने पास कुछ भी नहीं रखती, कभी तुम्हें भी तो पैसों की जरुरत पड़ सकती है..तो उसने कहा नहीं, पति कहता है कि तुम अपने पास रखोगी तो खर्चं कर दोगी। मुझे उसकी बात सुनकर काफी दुख हुआ। उसका अपनी ही कमाई पर खुद का हक नहीं। वो दिन भर घरों में जाकर झाड़ू-पोछा और बर्तन करती है, मेहनत कर 12 हजार कमाती है और उसके बाद भी वह अपने खर्चों के लिये अपने पति पर निर्भर है। उसे क्यों नहीं पूरी आजादी है अपने पैसों को खर्चं करने की। क्यों उसे अपने ही कमाये गये पैसों का हिसाब अपने पति को देना पड़ता है। क्या सचमुच हर मामले में महिलायें आजाद हैं? शायद नहीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस पुरुष वाले वर्चस्व समाज में आज भी बहुत सी जगहों पर महिलायें आर्थिक मामलों में पूरी तरह से आजाद नहीं है। पति चाहे जिस ढंग से खर्चं करे, वह जायज और पत्नी करे तो नाजायज। कैसी विकृति मानसिकता है पुरुषों की? क्यों कामकाजी महिलायें पुरुषों की तरह ही अपनी कमाई को मन चाहे ढंग से खर्च नहीं कर सकती हैं।

अपनी ही कमाई पर पूरी आजादी नहीं

सिर्फ गरीब तबके की महिलाओं के साथ ऐसा नहीं होता बल्कि ऊंचे तबकों की महिलाओं के साथ भी यही होता है। वो महिलाएं जो पढ़ी-लिखी हैं, ऊंचे पद पर कार्यरत है और सैलरी के रुप में मोटी रकम कमाती हैं, उनका तक अपनी कमाई पर पूरा हक नहीं है। वो अपने पैसे खुद पर खर्चं करने के लिये पूरी तरह से आजाद नहीं है। आपने अपनी दोस्त या फिर किसी सहेली को यह कहते हुये कई बार सुना होगा कि यार मैं ज्यादा खर्चं नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे पति बोलते हैं कि तुम अपनी सैलरी उड़ा देती हो। सवाल ये है कि जब आपकी पत्नी आपकी सैलरी का हिसाब-किताब नहीं लेती तो क्यों आप अपनी पत्नी की सैलरी का हिसाब लेते हैं? आप की तरह उसे भी पूरी आजादी होनी चाहिये अपने कमाये हुये पैसों को अपने तरीके से खर्चं करने के लिये लेकिन ऐसा कम ही होता है। आज भी महिलायें अपनी ही कमाई के पैसों को खर्चं करने के लिये पूरी तरह से आजाद नहीं है।

पत्नी की कमाई है एक्सट्रा प्राॅफिट

दरअसल गौर से सोचा जायें तो कामकाजी महिलाओं की कमाई को उनके पति एक्सट्रा प्राॅफिट के रुप में लेते हैं। एक सैलरी के साथ दूसरी सैलरी भी। पति की यही कोशिश रहती है कि पत्नी की सैलरी बचें जिसका इस्तेमाल वह किसी इंवेस्टमेंट या फिर कोई बड़ी खरीदारी में कर सकें। एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली खुशी का कहना है कि मैं अपनी सैलरी खर्चं नहीं करती हूं। मेरे अपने खर्चों के लिये मेरे पति मुझे पैसे देते हैं लेकिन उनके द्वारा दिये गये पैसे हिसाब से चलाने होते हैं। मुश्किल तब होती है जब आपके खर्चें कभी-कभार बढ़ जाते हैं और फिर आपको और पैसों की जरुरत होती हैं, तब अपने ही पैसे निकालने के लिये सोचना पड़ता हैं या पति से पूछना पड़ता है। आखिर क्यों एक कामकाजी महिला को अपनी कमाई के पैसों को अपने ऊपर खर्चं करने के लिए सोचना पड़ता है। उसकी कमाई पर क्या सिर्फ उसके पति का ही ज्यादा हक है उसका नहीं।

मर्द को ही पैसे की समझ

हमारे समाज में पुरानी मानसिकता आज भी विद्यमान है। उदाहरण के तौर पर अगर कहीं प्रापर्टी इंवेस्टमेंट करना हो या फिर कोई इंस्योरेंस पाॅलिसी लेनी हो तो ये घर का मर्द ही तय करेगा, भले ही ये बात और है कि सेंविग के पैसे उसकी अपनी पत्नी की कमाई के हो लेकिन इन पैसों का क्या करना है या कहा खर्चं करना है ये तो पति ही तय करेगा। ये मानसिकता की मर्द को ही पैसों के मामले में समझ होती है औरतों को नहीं, इसे पूरी तरह सही ठहराना गलत होगा। पत्नी क्यों नहीं अपने सेंविग के पैसों को समझ-बूझकर किसी अच्छी जगह इंवेस्ट कर सकती है। उसे भी इस मामले में पूरा अधिकार होना चाहिये।

यकीनन पत्नी अपने घर परिवार के लिए ही कमाती है और उसी पर खर्च करना भी चाहती है पर उसकी कमाई पर पति का हक जताना ठीक नहीं, इससे पत्नी के स्वाभिमान और सम्मान को ठेस पहुंच सकती है। पत्नी अपनी कमाई के पैसों को स्वेच्छा से दे, वह बात अलग है लेकिन जबरन उसके पैसों पर हक जताना ठीक नहीं है। पुरुषों के इस वर्चस्व वाले समाज में आज भी महिलायें आर्थिक मामलों में निर्णय लेने में कमजोर समझी जाती हैं इसलिये यह बहुत जरुरी है कि चाहे महिला शादीशुदा हो या ना हो उसे आर्थिक रुप से मजबूत होने की आवश्यकता है ताकि समय पड़ने पर वह किसी भी आर्थिक संकट का डटकर सामना कर सकें।

 

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