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गृहलक्ष्मी अक्टूबर २०१४

दिल की बात आपके साथ

त्योहार परंपरा है खुशी मनाने और रिश्ते निभाने की। त्योहार श्रद्धा है संदेशों और आदर्शों की साधना की। त्योहार के साथ सही गलत और अच्छे-बुरे की सोच भी उतनी ही जुड़ी है जितनी उमंग उत्साह और मौज मस्ती। दीवाली पर अपने नैतिक दायित्वों का निर्वहन भी उतना ही जरूरी है जितना परंपरा का। दीपावली सिर्फ मौज-मस्ती और हुड़दंग का ही नाम नहीं है बल्कि यह हमें अपने जीवन मूल्यों पर खरे उतरने और इन्हें सुदृढ़ करने के लिए भी प्रेरित करती है।

भगवान राम के अयोध्या लौटने पर इस दिन घी के दीपक जलाए गए थे। तब से दीपक जलाकर खुशी मनाने की परंपरा चल पड़ी। बाद में दीपक के घी की जगह तेल ने ले ली और अब मोमबत्ती और पटाखों से खुशी मनाई जाने लगी। यह बदलाव धीरे-धीरे आया लेकिन क्या इन परंपराओं को निभाते-निभाते हम यह भूल गए कि त्योहारों के बहाने हम अपने पर्यावरण को क्या सौगात दे रहे हैं। पटाखे जलाने से सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रेट, कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी अनेक जहरीली गैसें वातावरण में फैलती हैं, जो हमारे पर्यावरण के साथ साथ हमारे स्वास्थ्य के लिए भी बेहद हानिकारक हैं।
आज पूरा विश्व जहाँ पर्यावरण के लिए जागरूक हो गया है वहीं हम अपने त्योहारों की बदौलत अपना ही भला-बुरा नहीं समझ पा रहे हैं। दुखद है कि हमारे ब्रह्मांड में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कोई कमी नहीं आ रही है। आंदोलन चलाया जा रहा है कि पटाखों से तौबा करें और हवा को बचाएं। कुछ लोगों ने इस अभियान के असर में पटाखे चलाना कम किया है लेकिन दूसरी ओर ऐसे लोग भी कम नहीं हैं, जो दीवाली में पटाखों पर हजारों रुपये फूंक देते हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि पटाखे के बिना दीवाली दीवाली नहीं लगती। पटाखे न चलाएं तो क्या करें। पटाखे का कोई विकल्प नहीं है।
क्या वाकई पटाखों का कोई विकल्प नहीं है। हमारे देश में जहां हर किसी चीज का विकल्प मौजूद है, वहाँ ऐसा कैसे हो सकता है कि पटाखों का कोई विकल्प न हो। दीवाली की सभी परंपराओं को अपनी संस्कृति और अपने मूल्यों के प्रतीक रूप में देखें तो यह हमारे देश के लिए ही नहीं बल्कि पूरे ब्रह्मांड के लिए कल्याणकारी होगा। पर्यावरण बिगाडऩे के बजाय अपने मूल्यों को संजोने- संवारने के लिए दीवाली मनाएं तो इससे अच्छा क्या हो सकता है। दीवाली पर हम रंगोली बनाते हैं, द्वार पर तोरण सजाते हैं और… और भी बहुत कुछ करते हैं। ऐसे में हम रंगोली बनाएं तो साधारण रंगों के साथ अपने संस्कारों के रंग भी इसमें डालें। घर की चौखट पर बंदनवार बांधें तो इसमें ज्ञान की लडिय़ाँ लगाएं। घर का द्वार सजाएं तो उसमें नेकी और विनय के रंग हों। दीपक जलाएं तो साथ में अपने विश्वास को भी रोशन करें ! ईश्वर की आराधना करें तो उसमें अपनी आस्था को पूरी तरह रचा-बसा कर करें। घर को सजाएं तो सद्भावना का भी इसमें समावेश करें। कलश रखें तो अपने रीति रिवाज़ों और गहन परम्पराओं के रखें। कलश पर संयम का श्रीफल रखकर नैतिकता का स्वास्तिक बनाएं तभी हमारी आराधना को ईश्वर सच्चे रूप में स्वीकार करेंगे।

पटाखों में हम अनार की जगह अपनी आशाओं- उम्मीदों की लौ जलाएं। वायु व ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले साधारण पटाखों को जलाने की बजाय मजेदार चुटकुलों से खिलखिलाहट की बौछार करें। दीवाली के दिन हम तेज गंध और चिंगारियों वाली फुलझड़ी जलाने की जगह प्रेम और स्नेह की चुटकियों का सहारा लें तब हमारी दीवाली सही अर्थों में मनेगी।

पटाखे जलाने से ग्लोबल वॉमिंग होती है या नहीं, इस पर भी बहस चल रही है। ग्लोबल वॉमिंग न भी होती हो, तब भी हमारे आसपास मौजूद सांस या दिल के मरीजों को पटाखों से निकलने वाले धुएं से तकलीफ तो होती ही है। छोटे बच्चों, बीमार और बूढ़े लोगों को भी परेशानी होती है। पहले पटाखे कम चलाए जाते थे, तब पटाखे चलाने का अर्थ सिर्फ खुशी मनाना होता था, जबकि आज पैसे के प्रदर्शन के नजरिये से पटाखे चलाए जाते हैं। जितने ज़्यादा पटाखे, उतनी ही बड़ी शान। यहां हमारी चिंता लोगों की शान को लेकर नहीं, हमारे पर्यावरण, हमारे आस पास रह रहे बीमारों और भारतवासियों के स्वास्थ्य को लेकर है। जिसकी हवा सांस के माध्यम से हमारे-आपके फेफड़ों को बीमार करती हो, ऐसे त्योहार- खुशी और ऐसे पटाखों से क्या फायदा।

आज दरकार है कि हम मिलकर कोशिश करें अपने जीवन मूल्यों और अपने पर्यावरण को बचाने की। कोशिश करें कि अगर खत्म न कर सकें तो कम तो कर सकें उस दम घोंटने वाले धुएं को जो दीवाली के नाम पर पटाखे और फुलझड़ी छोड़ते हैं।