एसिड अटैक महिलाओं के खिलाफ एक ऐसा अपराध है, जो की इंसान को न सिर्फ शारीरिक क्षति बल्कि मानसिक क्षति भी पहुंचाता है। किसी लड़की या महिला पे तेज़ाब से हमला करना, सबसे क्रूर हमला माना गया है। इसका कारण यह है कि यह इंसान को ज़िन्दगी भर के लिए दूसरे का मोहताज तो बना ही देता है साथ ही साथ उस इंसान का सामाजिक जीवन भी ख़त्म कर देता है। वह इंसान फिर से आत्मविश्वास के साथ समाज का सामना नहीं कर सकता। लेकिन आज हम एक ऐसी शख्स की बात करेंगे, जो न सिर्फ इस दर्द से उभरीं, बल्कि आत्मविश्वास की साथ जीना भी शुरू किया और आज कई ऐसी महिलाओं के जीवन में रोशनी ला रही हैं।

शादी के 12 दिन बाद हुआ हमला

हम बात कर रहे हैं बंगलुरु की प्रज्ञा की, जिनपर 2006 में हमला हुआ था, जब वे प्लेसमेंट के लिए बनारस से दिल्ली जा रही थीं। शादी से पहले वह बनारस में रहा करती थीं, हादसे से सिर्फ 12 दिन पहले ही उनकी शादी हुई थी। उनपर हमला करने वाला कोई और नहीं उनका रिश्तेदार ही था, जो उनकी पिता की उम्र का था, जिसका प्रस्ताव प्रज्ञा ने ठुकरा दिया था। इस वजह से उस व्यक्ति ने प्रज्ञा पर ट्रेन में ही तेजाब से हमला कर दिया। इस हमले में प्रज्ञा के चेहरे का काफी हिस्सा झुलस गया और उन्हें लगभग 2 साल तक शारीरिक और मानसिक कष्ट से जूझना पड़ा। लेकिन सलाम है प्रज्ञा के पति को, जिन्होंने प्रज्ञा का साथ नहीं छोड़ा और उनके लिए इस मुसीबत से लड़ने की प्रेरणा बने रहे। प्रज्ञा बताती हैं कि उस शख्स ने जान बूझ कर मुझपर ट्रेन पर हमला किया ताकि मुझे पानी न मिले और मैं तड़प कर मर जाऊं लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। उन्हें ट्रेन में तैनात पुलिस ने अस्पताल पहुंचाया जहां प्राथमिक इलाज मिला।

दर्द से उभरीं और शुरू की संस्था

एसिड अटैक हमले में बुरी तरह झुलस जाने वाली प्रज्ञा प्रसून अब ‘अतिजीवन फाउंडेशन’ के जरिए एसिड अटैक पीड़िताओं की मदद करती हैं, उन्होंने कई पीड़िताओं को नया जीवन दिया और उनके लिए रोजगार के अवसर भी खोल रही हैं। प्रज्ञा अपनी संस्था के जरिए पहले इन पीड़िताओं को ट्रेनिंग देती हैं और फिर उन्हें रोजगार दिलवाती हैं। एक एसिड अटैक सर्वाइवर के हालातों को समझने की वजह से उन्होंने अतिजीवन फाउंडेशन की स्थापना की। हादसे के समय प्रज्ञा सिर्फ 22 साल की थी। प्रज्ञा कहती हैं पहले मैंने देश भर की पीड़िताओं को संपर्क किया और ऐसे लोगों को चुना, जिन्हें वाकई मदद की जरूरत थी। सबसे पहले मैं महिलाओं को सिलाई कढ़ाई और छोटे छोटे कामों की ट्रेनिंग दिलवाती हूं, जब वो सीख जाती हैं, तो उनकी प्रदर्शनी लगवाती हूं और जो कमाई होती है वो उन पीड़िताओं को देती हूं।

डॉक्टरों से लेती हैं परामर्श

अब प्रज्ञा तमाम लोगों के लिए प्रेरणा की स्रोत बन चुकी हैं। अपनी संस्था के तहत प्रज्ञा बड़े डॉक्टर्स के साथ मिलकर काम करती हैं, जिनसे वह पीड़िताओं के लिए सुझाव एवं परामर्श लेती हैं। वह पीड़िताओं की व्यक्तिगत रूप से भी काउंसलिंग भी करती हैं। साथ ही इनके लिए जीवन बसर करने के लिए कमाई के साधन भी मुहैया कराती हैं। प्रज्ञा ने कई पीड़िताओं की शादी भी करवाई, जो आज अपने जीवन में खुश हैं।

प्रज्ञा की मुहीम और सोच को सलाम

एसिड अटैक एक ऐसा भयावह और अमानवीय अपराध है जो की इन्सान को एक असीम दर्द लेकर जीने को मजबूर कर देता है, एक ऐसे अँधेरे में डाल देता है जिसकी रोशनी का कोई ठिकाना नहीं होता। एसिड अटैक सिर्फ शरीर का जलना ही नही है, ऐसे हादसे अक्सर मन से लेकर आत्मा तक को छलनी कर जाते हैं। लोग अपनी पहचान खो बैठते हैं। वह चेहरा जो इन्सान की पहचान हुआ करता था, अपनी पहचान की तलाश करने लगता है। यह बस शरीर पर हमला नही होता, बल्कि उन सपनों, और उन अरमानो पर भी हमला होता है जो इन्सान ने कभी पिरोये थे। पीडिता की सामाजिक ज़िन्दगी ख़त्म सी हो जाती है। लोगों से मिलना जुलना, साथ उठना -बैठना सब बंद हो जाता है। ऐसे में इंसानों के सवालों का जवाब देना बहुत मुश्किल हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान बस पत्थर की मूरत, एक जिन्दा लाश बन के रह जाता है। ऐसे में प्रज्ञा का संस्था के जरिए ऐसी महिलाओं को सशक्त बनाने का तरीका काबिल ए तारीफ है।

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