उसका बच्चा मेरे बच्चे से अधिक क्यों खाता है?
यह मानना कि अधिक देखभाल, अच्छे खानपान से जुड़ी है, यह धारणा ही उनके लिए ‘देखभाल’ का अर्थ है, ‘ज्यादा लाड’ या ‘बच्चे के साथ ज्यादा वक्त बिताना’ दूसरे, बच्चे के खानपान की आदत आपके प्यार या देखरेख के अनुपात में नहीं होती, यह इसका उलट भी हो सकता।
बच्चे के खानपान को कई तथ्य प्रभावित करते हैं। सबसे पहले तो यह बात आती है कि उनके आनुवांशिक गुण क्या है? इन्हीं से उसका वजन व कद नियंत्रित होते है। इसी से उसके भोजन की जरूरत व मांग तय होती है। आप इस पर अपना वश नहीं रख सकते।
दूसरा है ‘भोजन का अनुशासन’ या खान-पान की बेहतर आदतें। आप इस पर नियंत्रण रख सकते हैं और जीवन की शुरूआती अवस्था में इसे सुधार भी सकते हैं। खानपान की ये आदतें पूरी तरह से, भोजन के प्रति बच्चे के रवैए तथा माता-पिता पर निर्भर करती हैं। हम अगले अध्याय में इस विषय में चर्चा करेंगें। यहाॅं, मैं इन तथ्यों में तुलना के प्रभाव की चर्चा करना चाहता हूॅं। जब हम लगातार दूसरे सेहतमंद या ज्यादा खाने वाले बच्चे से अपने बच्चे की तुलना करते हैं, तो इससे निम्नलिखित बदलाव आते हैं।
1. बच्चे आपके शब्दों पर पूरा यकीन रखते हैं, इसलिए जब आप किसी से उसकी तुलना करते हैं तो उन्हें लगने लगता है कि वे दूसरे बच्चे की तुलना में हीन हैं। इससे उसका न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।
2. इस तुलना से जबरन खाना खिलाने की प्रवृति को भी प्रोत्साहन मिलता है। बच्चे पर हमेशा ज्यादा खाने के लिए दबाव डाला जाता है। नतीजा वह खाने से नफरत करने लगता है। ऐसा बच्चा ज़रूरत से ज्यादा भोजन खाने पर भी विकसित नहीं हो पाता।
3. थोड़ा बड़ा बच्चा, इस तुलना के कारण घर से बने भोजन से दूर होता जाता है व फास्ट फूड खाने लगता है। भोजन से प्राप्त असंतुष्टि को बाहरी भोजन से पूरा करना चाहता है। नतीजा किशोरावस्था में कम वजन-एनीमिक-अधिक वजन-एनीमिक – मोटापा! मैंने कम वजन से मोटापे की ओर जाने वाले कई बच्चे देखें हैं। ये न केवल सारी जिंदगी अस्वस्थ रहते हैं बल्कि हीनता की भावना के फलस्वरूप किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं कर पाते। हीनभावना के कारण इन्हें दूसरों से मिलने व बात करने में भी संकोच होता है। यह सब इसलिए होता है कि माता-पिता स्वयं को तुलना करने से रोक नहीं पाते।
यह सब सुनने के बाद साहिल की माॅं सोच में पड़ गई व बोली-‘‘ तो इसका हल क्या है?”
‘‘आसन है, भगवान ने बच्चे को एक खास इंसान के रूप में बनाया है। हर व्यक्तित्व की अपनी सकारात्मक व नकारात्मक विशेषताएॅं होती हैं। आप उसके व्यक्तित्व में ऐसे गुणों को जबरन लाना चाहते हैं, जो इस खूबसूरत संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। उसे पड़ोसी के खोल की बजाए अपने ही खोल में पनपने दें। उसे प्रोत्साहन से भरपूर स्वस्थ व प्रेरक माहौल में फलने-फूलने व अपने तरीके से विकसित होने का अवसर दें
अगर आप दिमाग से यह ंचिंता नहीं निकाल सकते तो दो बातों पर ध्यान दें।
1. मांग व पूर्ति- इसी तथ्य पर बच्चे की भूख निर्भर करती हैं। बच्चे को किसी ऐसे खेल में शामिल करें, जहां ज्यादा कैलोरी खर्च हो सके।
2. स्वस्थ प्रतियोगिता- हालांकि प्रतियोगिता को भी तुलना से जोड़ा जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है। यदि प्रतियोगिता को सकारात्मक रूप से लिया जाए तो कई चमत्कार हो सकते हैं। दो बच्चों में अच्छी सेहत, अच्छे आहार या अच्छी आदतों की जानकारी के लिए प्रतियोगिता की जा सकती है। बशर्ते यह प्रतियोगिता बच्चों में खेल की तरह पनपे, उन पर इसे थोपा न जाए। दूसरे बच्चों के कंधे से झांक-झांक कर यह न देखें कि प्रतियोगिता कैसी चल रही है। इससे तुलना की भावना प्रकट होगी, यहाॅं आपको रैफरी नहीं बनना। बस प्रतियोगिता के प्रेरक बने रहिए। यदि बच्चा आपको नतीजा बताना चाहे या कोई मदद माॅंगें तो आगे आईए।
तो अगली बार, दूसरे बच्चे की डाइट या कद-काठी देखकर मन विचलित हो तो ठंडा पानी पीकर चैन की साॅंस लें। आपके बच्चे का भी उचित विकास हो रहा है, यह सोचकर उसकी सकारात्मकताओं पर केंद्रित रहें।