• अथॉरिटेटिव (Authoritative)

इन चारों में से आपका पेरेंटिंग का तरीका क्या है?आपने इस तरह से शायद सोचा ही न हो। लेकिन बच्चे को अच्छी परवरिश देनी है तो आपको परवरिश के इन 4 तरीकों में से बेस्ट को चुनना होगा। हो सकता है आप सबसे खराब वाले तरीके को अपनाती हों या फिर आप सबसे अच्छे वाले तरीके से बच्चे को बड़ा कर रही हों। तो चलिए पेरेंटिंग के इन तरीकों से रूबरू हो लेते हैं क्योंकि इनको पहचान कर आप सही-गलत का निर्णय आसानी से ले पाएंगी-

अथॉरिटेरियनहैं तो बच्चे की नहीं सुनेंगी-

आप अक्सर अपनी बात बच्चे को मनवाना चाहती हैं। आपको लगता है कि उसकी बात सुनना जरूरी नहीं है क्योंकि वो बच्चा है तो आपअथॉरिटेरियनकैटेगरी वाली पेरेंट हैं। आप ज्यादातर बार बच्चे के दिल की बात सुनना ही नहीं चाहती हैं। बच्चा क्या चाहता है,इसके पीछे वजह क्या है?इन सबसे आपको अगर कोई मतलब नहीं है तो बच्चा एक उम्र के बाद आपसे अपने रिश्ते उतने मजबूत नहीं रखना चाहेगा,जितना आप चाहती हैं। इसके साथ ही अगर आपअथॉरिटेरियनपेरेंट हैं तो अक्सर ही भले ही वो छोटी बात हो आप बच्चे पर हाथ उठाने से ही नहीं कतराती हैं। आपको लगता है कि बच्चा मार-पीट से ही सुधर सकता है।

अब पेरेंट्स के ऐसे बिहेव करने का बच्चों पर असर तो होगा न। पर कैसा?बच्चा आपका या तो बहुत नियम-कायदों में रहने वाला हो जाएगा या फिर वो बिलकुल ही नियम न मानने वाला बन जाएगा। बच्चा अपनी सोच को लेकर भी सही से निर्णय नहीं ले पाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि बचपन से ही उसने अपनी बातों को ना माने जाते हुए देख होता है। इसलिए उसको अपनी सोच को लेकर हमेशा शक ही रहता है। बड़े होकर यही बच्चा अपनी बात दबाव में पूरी कराने की कोशिश करने लगता है। उसको लगता है,बचपन में नहीं सुनी गई तो अब तो सुननी पड़ेगी। फिर इस रवैये के कई साइड इफेक्ट होते हैं। बच्चे की इस बात का असर कई और लोगों पर भी पड़ता है।

अथॉरिटेटिव पेरेंटिंगका प्यार-

आप अगर बच्चे के साथ अपने रिश्ते को लेकर थोड़ी भी मेहनत करते हैं तो आपअथॉरिटेटिवपेरेंट हैं। आप बच्चों को कोई नियम फॉलो करने के लिए कहते हैं तो उन्हें इसकी वजह भी बताते हैं। आप बताते हैं कि इस नियम को मानना क्यों जरूरी है। इस तरह के पेरेंट बच्चों को दोस्त बनाकर रिश्ते को बेहतर करना चाहते हैं। कुलमिलाकर आप बच्चों की भावनाओं की कद्र करते हैं। आप उन्हें उनकी फिलिंग बताने की आजादी देते हैं। आप उन्हें गलत पर गलत और सही पर सही रिजल्ट मिलने की सलाह भी देते हैं। ऐसे बच्चे बड़े होकर अपनी भावनाओं को दूसरों के सामने अच्छे से रख पाते हैं और दूसरों की भावनाएं समझ भी पाते हैं। उस वजह से उनका जीवन को लेकर नजरिया सकारात्मक होता है। वो जीवन के निर्णय सही ले पाते हैं और सफल होते हैं।

 परमिसिव पेरेंटिंगयानि कोई चिंता नहीं-

परमिसिव पेरेंटिंग,परवरिश का वो तरीका है,जिसके तहत आप बच्चे को खुद गलती करके सीखने की इजाजत दे देते हैं। वो बच्चों को तब तक टोकते नहीं जब तक समस्या ज्यादा बड़ी हो चुकी हो। उनके लिए सख्ती दिखाना ऐसे पेरेंट्स को अच्छा नहीं लगता है। बच्चों को डांटने पर अगर वो रो देते हैं तो ऐसे पेरेंट तुरंत नॉर्मल होकर बच्चों मनाने में जुट जाते हैं। मगर दोस्त बनने की इस कोशिश में वो बच्चों को भावनात्मक रूप से सहयोग करने में भी असफल हो जाते हैं। बच्चे अपने निर्णय लेने के लिए इतने आजाद होते हैं कि एक समय पर वह खुद को हर मोड़ पर अकेला खड़ा पाते हैं। क्योंकि ऐसे बच्चों को कभी भी नियम-कायदे बताए ही नहीं गए होते हैं इसलिए आगे चल कर अगर उन्हें रूल्स में रहना होता है तो ये उनके लिए काफी कठिन हो जाता है। अक्सर ऐसी स्थिति में वो खुद को कमजोर और हारा हुआ मानते हैं।

बेपरवाह:अनइंवॉल्वड पेरेंटिंग-

ये वो पेरेंटिंग है जिसको बेपरवाह कहा जा सकता है। इस पेरेंटिंग में पेरेंट्स को बच्चों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है। न ही वे बच्चों के साथ समय बिताते हैं और न ही उन्हें ये पसंद होता है। उनके लिए सिर्फ बच्चे की जरूरतें पूरी करना ही काफी होता है। इसलिए वो बच्चे की मानसिक जरूरतों को भी इगनोर करते रहते हैं। ऐसे बच्चे निगलेक्टेड महसूस करते हैं और कभी मानसिक तौर पर मजबूत भी महसूस नहीं कर पाते हैं। उनको अपनी और जिंदगी की अहमियत नहीं समझ आती है।ऐसे बच्चे पढ़ाई की अहमियत भी नहीं समझते हैं और अक्सर पढ़ने में कमजोर होते हैं। बच्चों के लिए बेपरवाह होना वैसे भी सही नहीं होता है। ऐसे पेरेंट के बच्चे अक्सर अपने लिए गलत रास्ता चुन लेते हैं क्योंकि सही निर्णय लेने का तरीका उन्हें बताया ही नहीं गया होता है।

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