टीनएज,वो उम्र जब बच्चे दुनिया को अपनी समझ के हिसाब से समझने की कोशिश कर रहे होते हैं। वो सही गलत के भीतर छुपी सच्चाई को जान रहे होते हैं। ये जानने की कोशिश ही उनके मन में ढेरों विचारों की वजह बनती है। फिर मन में उठते हैं ढेरों सावल। ऐसे सवाल जो भावनात्मक तौर पर किशोरों की परीक्षा लेते हैं। वो भावनात्मक तौर पर टूटा हुआ या कहें कि कंफ्यूज महसूस करते हैं। इतने कंफ्यूज कि कई बार तो ये कंफ्यूजन उनके चेहरे पर दिखने लगता है। टीएजर्स के इमोशन को इस समय मैनेज करना जरूरी होता है। और ये जरूरी काम करते हैं पेरेंट्स। आप भी टीएजर के पेरेंट्स हैं तो उनके इमोश्न्स को मैनेज करने की जिम्मेदारी लीजिए,उन्हें समझाइए और सिखाइए भी। ताकि जिंदगी के आगे के सफर में वो कम से कम भावनात्मक रूप से ना हारें,उनकी जीत निश्चित हो-

 

रोलर कोस्टर पर आप नहीं-

टीनएजर्स के लिए ये उम्र इमोशनल तौर पर रोलर कोस्टर जैसी होती है। वो ढेरों सवालों के बीच परेशान होते हैं। इस परेशानी से उनको निकालने के लिए ये जरूरी नहीं है कि उनके साथ आप भी रोलर कोस्टर राइड पर सवार हो जाएं। बल्कि उनको इस राइड से बाहर निकालने के लिए आपको बहुत शांत रहना होगा। खुद को शांत रखने के बाद ही आप उन्हें भावनाओं का कैलकुलेशन सीखा पाएंगी। उन्हें बता पाएंगी कि परेशान होकर काम नहीं चलेगा। बल्कि समझदारी से ये सब हैंडल किया जा सकता है। खुद को शांत रख कर ही ये सब किया जा सकता है। अगर बच्चा किसी वजह से परेशान है और फिर आप भी परेशान हो जाएंगी तो काम बनेगा नहीं बल्कि बिगड़ेगा। इसलिए खुद को पूरी तरह से शांत रखिए।

तीन काम करें जरूरी-

इस काम को पूरा करने के लिए सिर्फ शांत रहना ही जरूरी नहीं है। बल्कि आपको बच्चे के सामने तीन खास बातों का ध्यान रखना होगा,ये वो बातें होंगी जो आपके लिए ये काम आसान बना देंगी। आप अपने काम में सफल होंगी ही। ये तीन बातें बच्चे को भावनाओं को हैंडल करना तो सिखाएंगी ही आपका उनके साथ रिश्ता भी मजबूत होगा। ये हैं वो तीन बातें-

अपनी फिलिंग को नाम दो-

बच्चों को सिखाइए कि वो अपनी भावनाओं को कुछ नाम दें। कई बार गुस्सा,नाराजगी,दुख सब आपस में गडमड हो जाते हैं। इनको पहचानना मुश्किल हो जाता है। लेकिन मां होने के नाते आप बच्चे से उनकी भावनाओं को नाम देने के लिए कहिए। जब भावना को नाम मिलेगा तो उसके पीछे के कारण भी सामने आ जाएंगे। जैसे बच्चा अगर दुखी है तो वो दोस्त की बात से इमोशनल तौर पर हर्ट हुआ हो सकता है। लेकिन वो वो गुस्सा फील कर रहा है तो हो सकता है कि उसकी भी कुछ गलती हो। या उसने दोस्त को गलत समझ लिया। इस वक्त आप उसे फीलिंग के हिसाब से स्थिति और भावनाओं को हैंडल करना सीखा पाएंगी।

परेशान होना भी ठीक है-

बच्चों को इस वक्त आपको ये बताना होगा कि परेशान होने में कोई खराबी नहीं है। हमेशा खुश रहना मुश्किल है और दुख से जुड़े इमोशन फील करके खुद को कमतर नहीं समझना है। इस बात को समझकर बच्चा परिस्थिति को हैंडल करने की कोशिश करेगा न कि सिर्फ उससे परेशान होता रहेगा। इसलिए बच्चे को बताइए कि दोस्त से परेशान होकर दुखी होना,कम नंबर आने पर रो देना,ये सब नॉर्मल है। ऐसी फिलिंग सबको आती है और इसको हैंडल करने का हुनर ही उन्हें बाकी सबसे अलग बनाता है। याद रखिए हार्मोन बदलने का ये दौर ऐसा होता है कि जब कई बार बच्चे अपनी परेशानी का कारण भी नहीं समझ पाते हैं। जब कारण ही नहीं पता होगा तो उनकी दिक्कत समझना बड़ा काम होती है। इस वक्त आप जरूर समझदारी से काम लें।

तुम तो हो ही ऐसे-

“तुम तो हो ही ऐसे” ये वो बातें हैं जो अक्सर लोग एक दूसरे के दुखी होने पर कह देते हैं। टीनएजर्स के साथ ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। उनको इस स्थिति से सच्चाई का साथ देते हुए बाहर आने का तरीका समझाइए। उनको “इस समस्या की वजह तुम ही हो” जैसी बातें कह कर आप और दुखी ही कर देंगी। वो समस्या में फंस जाएगा। वो इससे निकलने के बारे में सोचेगा भी नहीं। इसलिए बच्चे को उसकी फीलिंग्स के लिए ब्लेम ना करें।

आपको रोल मॉडल बनना होगा-

देखिए जब टीनएजर बच्चा अपनी फीलिंग को हैंडल करना सीखेगा तो वो आपकी इमोशन हैंडल करने के तरीके से प्रेरणा लेगा। इसलिए खुद को इमोशनल स्ट्रॉंग बनाने की कोशिश करें। बच्चों को दिखाइए कि आप भी ये काम कितने अच्छे से कर लेती हैं। बच्चे समझेंगे कि जो बात आप उसे समझा रही हैं वो काम आप खुद भी अच्छे से करती हैं। इसलिए बच्चों को जो भी बता रही हैं उसे खुद की जिंदगी में भी शामिल करें।

 

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