newborn care
नवजात की देखभाल

मां बनना अपने आपमें किसी खुशनुमा अनुभूति से कम नहीं है। नन्हा सा बच्चा जब गोद में पहली बार आता है तो उस अनुभव को शब्दों में बयान करना बेहद मुश्किल है। उस नन्हे की अठखेलियां, उसका रोना- सोना- खेलना सब कुछ इतना प्यार से भरा होता है कि कोई भी मां सहज तौर पर उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती है।

बच्चे को अपने गर्भ में धारण करने के बाद से ही मां उसे लेकर रंग- बिरंगे सपने सजाती है, पेट के अंदर से ही उसकी हर गतिविधि पर खिलखिला उठती है, उससे बातें करती है, अपने सुख- दुख उससे बतियाती है। अपने नन्हे की हर एक धड़कन को संजोती मां उसके आने का इंतजार करती है। बच्चा भले ही रात भर मां कोे जगाए और दिन में भी चैन न लेने दे, मां उसकी देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ती। 15 से 21 नवंबर के बीच सेलिब्रेट किये जाने न्यूबॉर्न केयर वीक के मौके पर हम नवजात की देखभाल से संबंधित छोटी- छोटी बातों के बारे में जानेंगे।

मां का दूध

मां का दूध

मां का दूध ही बच्चे के लिए सर्वोत्तम आहार है। संभव है कि शुरुआत में बच्चे को पूरी तरह से दूध न मिले लेकिन इससे हिम्मत हारने की जरूरत नहीं है। यह याद रखें कि अपने जीवन के पहले साल में जो नवजात मां का दूध पीते हैं, उनके बीमार पड़ने की आशंका बहुत कम रहती है। गैस्ट्रोएंट्रोटाइटिस, निमोनिया, ब्राॉन्काइटिस, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन, एग्जिमा और कान में इंफेक्शन जैसे रोगों से मां का दूध नवजात को बचाता है। शोध तो यह भी बताते हैं कि मां का दूध पी चुके लोगों का ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल स्तर कम रहता है और उन्हें टाइप टू डायबिटीज होने का खतरा भी उन लोगों के बजाय कम रहता है, जो लोग ऊपर का दूध पीकर बड़े हुए हैं।

बच्चों के मस्तिष्क विकास के लिए भी मां का दूध बेहतरीन है। बच्चे को अपने दूध की आदत लगवाने के लिए आपको कई तरह की कोशिश करनी होगी। दूध पिलाते समय आपकी पोजिशन इस तरह की हो कि उसे कंफर्टेबल महसूस हो। चाहें तो कुशन या तकिये की मदद लें। यह याद रखें कि हर मां और बच्चे का दूध पिलाने और पीने का तरीका अलग होता है। आपको ही अपने फीडिंग स्टाइल पर ध्यान देना और अपनाना पड़ेगा।

बच्चे की नींद

नवजात की नींद

औसत तौर पर एक नवजात 16 घंटे के लिए सोता है। तीन महीने के होने पर भी उसे 15 घंटे की नींद चाहिए होती है। छह से नौ महीने के बच्चे के लिए 14 घंटे की नींद जरूरी है। रात में भी भूख लगने पर वह कई बार जाग सकता है। संभव है कि शुरुआत में वह आपको पूरी रात जगाए। ऐसे में अपनी नींद तब पूरी कीजिए, जब वह सोए। कुछ बच्चे एक बार में दो घंटे सोते हैं तो कुछ इससे कम। बाद में वह रात में चार- पांच बार जाग सकता है। इसकी वजह शूशू भी हो सकती है और भूख भी। बच्चे केवल मां के दूध पर आश्रित रहते हैं, शूशू के साथ यह निकल जाता है। इसलिए भूख लगने पर वह रात में जाग जाता है। बड़े होने पर वह रात में अधिक सोने लगता है।

एक साल के होने पर वह सुबह के चार- पांच बजे ही आपको उठाएगा। एक साल के बच्चे के लिए भी कम से कम दस घंटे की नींद जरूरी है। कुछ को शोर में नींद आ जाती है तो कुछ को पर्याप्त शांति चाहिए। उसके सोते समय ध्यान दें कि कमरे में कोई शोर न हो रहा हो और ना ही तेज रोशनी हो। बच्चे के विकास के लिए उसकी अच्छी नींद बेहद आवश्यक है। एक बात और, बच्चे का सिर गोल ही रहे, इसके लिए बिल्कुल शुरुआत में हॉर्सशू तकिये का इस्तेमाल जरूर करें। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चे का सिर बेहद कोमल होता है, उसे जिस तरफ दबाकर रखा जाएगा, उस ओर दब ही जाता है। बाद में सेमर के रुई का बना पतला तकिया इस्तेमाल करें।

जरूरी सामान

नवजात का जरूरी सामान

नवजात को दिन भर में कम से कम 12 नैप्पी बदलने की जरूरत पड़ती है। इसलिए ढेर सारे नैप्पी खरीद या बनवा लीजिए। यूं तो सूती नैप्पी ही पहनाना चाहिए लेकिन कहीं बाहर जाने के लिए डायपर पहनाने से गुरेज मत कीजिए। डिटॉल वाले पानी में ही बच्चे के कपड़े धोइए और आयरन कर लीजिए। आयरन से अतिरिक्त कीड़ों का खात्मा हो जाता है। अब बाजार में वाइप्स मिलते हैं, जिनका इस्तेमाल आब बच्चे के पॉटी करने पर पोछने के लिए कर सकती हैं। नैप्पी बदलने के लिए अलग से प्लास्टिक शीट रखिए। अब जमाना है क्विक ड्राई शीट का, जो बहुत जल्दी सूख जाता है। इसके लिए बिछौने के नीचे प्लास्टिक बिछाने की जरूरत नहीं पड़ती।

नवजात को सिमट कर रहने की आदत रहती है, इसलिए उनके लिए चार- पांच पतली और मोटी चादरें खरीद लें। सूती मोजे और टोपी पर्याप्त मात्रा में खरीद लें। इनके सिर और पैरों का ढका रहना जरूरी है। चाहें तो हथेली ढकने के लिए मिट्टन्स भी खरीद लें। दूध पीते समय कई बच्चे उल्टी कर देते हैं या गिरा देते हैं। इसलिए छह बिब भी खरीद कर रख लें। रुमाल भी जरूर रखें। छोटी नेल कटर, नैप्पी रैश क्रीम, पाउडर, बेबी क्रीम, बेबी लोशन, बेबी शैंपू, साबुन, कंघी अलग से नवजात के लिए रखिए। नहाने के बाद बच्चे को भी तौलिये की जरूरत पड़ती है। अलग से दो- तीन तौलिया रख लें। यदि आपके घर में मच्छर हैं तो बढ़िया क्वालिटी की नेट भी खरीद लें। पेट दर्द, उल्टी, जुकाम- खांसी, बुखार आदि की दवाइयां हमेशा अपने पास रखें। साथ ही दो डॉक्टर के नंबर ताकि जरूरत पड़ने पर आप उनसे मदद मांग सकें।

त्वचा का रखें खास ख्याल

नवजात की त्वचा का खास ख्याल

बच्चों के स्किन की सबसे निचली परत यानी डेरिम को पूरी तरह विकसित होने में 10 साल का समय लगता है। वहीं, उनके ऑयल सिक्रेटिंग ग्लैंड्स भी तब तक पूरी तरह से एक्टिव नहीं होते हैं। तेल मालिश को लेकर सावधान रहें, क्योंकि इससे एलर्जी भी हो सकती है। हमारे यहां बच्चों में 50- 60 एलर्जी त्वचा से जुड़ी होती है। कभी भी बच्चे के खास अंगों के पास तेल का इस्तेमाल ना करें। तेल मालिश करते वक्त ध्यान रखें, कि आप बच्चे की त्वचा को रगड़ें नहीं, बल्कि बाल जिस दिशा में उग रहे हैं, उसी दिशा में हल्के हाथों से तेल लगाएं, नहीं तो बैक्टीरिया आपके बच्चे के हेयर फॉलिकल्स में जाकर उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं।

कभी- कभी जन्म के तुरंत बाद बच्चे के शरीर और चेहरे पर डैंड्रफ जैसी हल्की सफेद पपड़ी जम जाती है। धीरे-झीरे यह पपडी खुद ही झड़कर शरीर की त्वचा से अलग हो जाते हैं। आप नवजात को एक- दो दिन छोड़कर नहला सकती हैं। जब वह छह माह का हो जाए तो रोज नहलाने में दिक्कत नहीं है। सर्दियों में तभी नहलाएं, जब धूप निकली हो। नहाने का पानी ना ज्यादा गर्म होना चाहिए और ना ही ज्यादा ठंडा। उनके नहाने का समय भी धीरे-धीरे निर्धारित करें। बच्चों को नहलाने के लिए आम तौर पर बेबी सोप का ही इस्तेमाल किया जाता है। आप चाहें तो ग्लिसरीन आधारित या फिर पीएच बैलेंस वाले साबुन का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। नहाने के बाद कभी भी कलर्ड या खुशबूदार मॉयश्चराइजर का इस्तेमाल हरगिज ना करें। बेबी प्रोडक्ट्स खरीदने से पहले अपने डॉक्टर और प्रोडक्ट्स में दिए निर्देशों को ध्यान से पढ़ें।

लाडले का पहला फर्नीचर

लाडले का फर्नीचर

सेफ्टी और कंफर्ट- ये दो मुख्य बातें हैं, जो बेबी फर्नीचर की खरीदारी के समय ध्यान में रखनी चाहिए। अपने बेबी के लिए क्या-क्या खरीदना है, इसकी लिस्ट बना लें। पालना से लेकर चेंजिंग टेबल, हाई चेयर, रॉकिंग चेयर, झूला, स्ट्रॉलर, ड्रॉअर और शेल्फ आदि। ये सारे फर्नीचर खरीदना आवश्यक नहीं है। यदि आपका बजट इजाजत न दे रहा हो तो आवश्यक चीजें जैसे पालना और स्ट्रॉलर ही खरीदें। पालना के बीच की जगह कम संकरी होनी चाहिए ताकि बच्चे का सिर, हाथ और पैर पालने से बाहर न निकल पाएं। पालने के बीच की खुली जगह ढाई इंच से अधिक की नहीं होनी चाहिए। हाई डेंसिटी फोम मैट्रेस लाडले के लिए खरीदें। पालना में बंपर पैड अवश्य होना चाहिए। यह बच्चे को अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है।

चेंजिंग टेबल पर आप अपने बच्चे के डायपर और कपड़े आसानी से बदल सकती हैं। ये सॉलिड लकड़ी की बनी हों, पार्टिकल बोर्ड की नहीं। बाउंसर, रॉकर या रॉकिंग चेयर पर शिशु आराम महसूस करता है। इसका पिछला हिस्सा हल्का गोल होना चाहिए। प्रैम के बकल्स लैच और अनलैच करने के लिए आरामदायक होने चाहिए। इसका पहिया इतना चौड़ा हो कि प्रैम या स्ट्रॉलर लुढ़के नहीं। इसमें ब्रेक भी हों ताकि पहिया अपनी जगह पर लॉक हो सके। कभी भी बेबी फर्नीचर की सुरक्षा को लेकर समझौता न करें। 

सुरक्षित रखें सजग रहें

बच्चे के साथ सतर्क रहना जरूरी

बच्चा जब खिसकने लगता है तो उसे अधिक देखभाल की जरूरत पड़ती है। आपको हमेशा उसके लिए तैयार रहना पड़ेगा। वह इलेक्ट्रिक सॉकेट को छू सकता है, इसलिए इस पर सेलो टेप लगाना बेहतर रहेगा। टेबल, डेस्क और बिस्तर के कोने पर पैडिंग कर दें ताकि उसे चोट न लगे। घर में फालतू सामानों को फेंक देने में ही भलाई है। पेन, कैंची, स्टेपलर, क्लिप, नेट कटर आदि को आलमारी में बंद करके रखें। माचिस, अगरबत्ती, लाइटर को भी हटा दें।

उसके खिलौनों को साफ करते रहें क्योंकि, इसकी गंदगी मुंह में चले जाने से बच्चे को पेट में दर्द और लूज मोशन की शिकायत हो सकती हैं। मौसम के अनुकूल भी बच्चे की विशेष देखभाल जरूरी है। सर्दियों के मौसम में जहां उसे ऊनी कपड़े की जरूरत है तो गरमी में उसे बहुत ज्यादा एसी या कूलर में न रखें। एसी या कूलर को बर्दाश्त करने की क्षमता उनमें नहीं होती है। इसी तरह बारिश के दिनों में भी उन्हें गरम कपड़ा पहनाकर रखें। ऊनी नहीं बल्कि कपड़े की तीन- चार लेयरिंग बारिश के लिए अधिक सही रहती है।

Leave a comment