kashi vishwanath mandir

भगवान शिव को समर्पित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्थलों में से एक है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बना ये तीर्थ पवित्र नदी गंगा के पश्चिमी तट पर मौजूद है, जो बारह ज्योतिर्लिंग में से नौवें स्थान पर है। वाराणसी शहर को काशी कहकर भी पुकारा जाता है। ऐसे में ये पावन स्थली काशी विश्वनाथ के नाम से जाना जाता है।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। जबकि दूजी तरफ नज़र दौड़ाएं, तो भगवान शिव नज़र आते हैं। काशी को मुक्ति क्षेत्र कहकर भी पुकरा जाता है। तंत्र की दृष्टि से इस मंदिर का विशेष महत्व हैं। जी हां बाबा विश्वनाथ के इस मंदिर में चार प्रमुख द्वार बनाए गए हैं। इनके नाम शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार और निवृत्ति द्वार है। ज्योतिष और तंत्र की बात करें, तो इन चारों द्वारों का अपना एक अलग महत्व है। इस जगह की खासियत ये है कि समस्त संसार में अकेला ऐसा स्थान है, जहां शिव और आदिशक्ति एक साथ विराजमान हैं।

चार द्वार के अलावा भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग भी इस स्थान का विशेष बनाता है, जो मंदिर के गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। यूं तो इस स्थान से कई मान्यताएं और कहानियां जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक कहानी के मुताबिक भगवान शिव ने अपने एक भक्त के सपने में दर्शन दिए। दर्शनों के दौरान भगवान शिव ने कहा कि तुम्हें गंगा स्नान करने के बाद दो शिवलिंग मिलेंगे। भगवान शिव के कहे मुताबिक भक्त को दो शिवलिंग प्राप्त हुए। अब शिवजी ने भक्त को दोनों शिवलिंग को जोड़कर स्थपित करने का आदेश भी दिया था। अब भक्त ने भी शिवजी की आज्ञा का पालन किया और उसी प्रकार से उन्हें जोड़कर रख दिया। शिव जी ने भक्त को कहा था कि अगर वो उन दोनों शिवलिंग को एक साथ जोड़कर स्थापना करेगा, तो शिव और शक्ति का दिव्य शिवलिंग स्थापित हो जाएगा। ऐसी मान्यता है कि तभी से भगवान शिव यहां मां पार्वती के साथ यहां पर विराजमान हैं।

वहीं, अन्य मान्यताओं की मानें, तो मां भगवती ने स्वंयम् महादेव को यहां स्थापित किया था। बाबा विश्वनाथ के मंदिर में त़ड़के सुबह मंगला आरती के अलावा पूरे दिन में चार बार आरती होती है। मान्यता है कि सोमवार को चढ़ाए गए जल का पुण्य अधिक मिलता है। खासतौर पर सावन के सोमवार में यहां जलाभिषेक करने का अपना एक अलग ही महत्व है।

इतिहासकारों के मुताबिक इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माणकार्य 11वीं सदी में राजा विक्रमादित्य ने अपने हाथों से स्वयं करवाया था। वहीं 1194 ईस्वी में इस भव्य मंदिर को मुहम्मद गौरी ने तुड़वाया था। वहीं इल्तुतमिश के गद्दी वर बैठते ही इस मंदिर को एक बार फिर दोबारा से बनाया गया था, मगर  एक बार फिर 1447 ईस्वी में जौनपुर के सुल्तान महमूद गोरी ने इस मंदिर को तोड़ने का साहस जुटाया।

मगर लोगों की आस्था और अटूट विश्वास के चलते मुगल शासक अकबर के शासनकाल में इस प्राचीन मंदिर को फिर से राजा मान सिंह के शासनकाल में बनाए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद फिर सन 1585 में अकबर के शासनकाल में ही राजा टोडरमल ने पंडित नारायण भट्ट की सहायता से मंदिर का पुनरोद्धार करवाया था। काफी वक्त बीतने के बाद एक बार फिर इस मंदिर का तोड़ने के फरमान जारी हुए। जी हां औरंगजेब ने अपने शासनकाल में इस मंदिर को फिर से तोड़ने का ठान ली। काफी मशक्कत और जद्दोजहद के बाद का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में करवाया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में बनारस में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के पहले चरण का उद्घाटन किया है। वर्तमान समय में इस कॉरीडोर के निर्माण कार्य पूरा करने में 2600 मजदूरों ने दिन रात काम किया है। 900 करोड़ रुपये की लागत से बने इस प्रोजेक्ट के तहत परिसर में 24 भवन बनाए गए हैं, जिनमें मुख्य मंदिर परिसर, मंदिर चौक, मुमुक्षु भवन, सिटी गैलरी, जलपान केंद्र, मल्टीपरपज हॉल, यात्री सुविधा केंद्र, इत्यादि शामिल हैं।

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