जब भी हम किसी शुभ कार्य अथवा मांगलिक उत्सव का शुभारंभ करते हैं तो अत्यंत विनम्र होकर ये प्रार्थना करते हैं-

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटी समप्रभ:।

निर्विघ्रं सर्वकार्येषु सर्वदा॥

अर्थात हमारे समस्त कार्य बिना विघ्र के सम्पन्न हो। गणेश जी दयालु तथा अत्यंत शुभदायक हैं। वे अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। तभी तो हम वन्दना करते हैं।

गजाननं भूतगणादि सेवितम्।

कपित्थजम्बुफल चारुभक्षणम्॥

उमासुतं शोकविनाशकारम्।

नमामि विघ्रेश्वर पाद पंकजम्॥

हाथी के मुख वाले, सभी प्राणियों से सेवा किए जाते हुए, कैथ और जामुन के फलों को रुचि से खाने वाले, सभी प्रकार के दु:खों का नाश करने वाले, उमा पुत्र, विघ्रों को हरने वाले गणेश को नमन।

गणेश चतुर्थी का इतिहास अत्यंत पुराना है। 1630-1680 के दौरान यह उत्सव शिवाजी के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था।

यह सन् 1893 में लोकमान्य तिलक द्वारा पुनर्जीवित किया गया। गणेश चतुर्थी एक वार्षिक त्योहार के रूप में हिन्दुओं द्वारा मनाना शुरू किया गया। मुख्यत: यह त्योहार ब्राह्मïण और गैर ब्राह्मïण के बीच संघर्ष को हटाने के साथ लोगों के बीच एकता लाने के लिए एक राष्टï्रीय पर्व के रूप में मनाना शुरू किया गया था।

गणेश विसर्जन की प्रथा लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित की गई थी। धीरे-धीरे लोगों द्वारा यह त्योहार परिवार के समारोह के बजाय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से मनाया जाने लगा। समाज और समुदाय के लोग इस त्योहार को एक साथ मनाने के लिए लोक संगीत, कविता नाटक आदि करते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि गणेश जी की उत्पत्ति कैसे हुई। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी कहते हैं।

एक बार माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपाल बना दिया। कहा, ‘जब तक मैं आदेश ना दूं किसी को अंदर मत आने देना।’ इसी बीच वहां शंकर भगवान पहुंच गए। बालक यह नहीं जानता था कि महादेव जी उसके पिता हैं। शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक नहीं माना। तब महादेव जी और बालक में भयंकर युद्घ हुआ परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर पाया। अंततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया। इससे भगवती पार्वती कु्रद्घ हो उठी और उन्होंने प्रलय करने की ठान लीं। भयभीत देवताओं ने देवर्षि नारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया, महादेव जी के निर्देश पर विष्णु जी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव हाथी का सिर काटकर लाए। मां पार्वती ने हर्षातिरेक होकर उस गजमुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आर्शीवाद दिया। ब्रह्मïा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित कर अग्रपूज्य होने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा हे गिरिजानन्दन विघ्र नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगाा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा गणेश्वर तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चन्द्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्रों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्घियां प्राप्त होगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चन्द्रोदय के समय तुम्हारी पूजा करने के पश्चात समस्त कार्य पूर्ण होंगे।

दूसरी कथा ये है कि एक बार भगवान शंकर और पार्वती चौपड़ खेल रहे थे। जब वे दोनों नर्मदा नदी के निकट बैठे थे। वहां देवी पार्वती ने कहा हमारे इस खेल में हार जीत का निर्णय कौन करेगा इसके जबाव में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना दिया और उस पुतले की प्राणप्रतिष्ठा कर दी पुतले से कहा बेटा हम चौपड़ खेलना चाहते हैं।

परंतु हमारी इस हार-जीत का निर्णय तुम्हें करना है। चौपड़ का खेल तीन बार खेला गया और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई। खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का निर्णय करने को कहा गया तो बालक ने महादेव जी को ही विजयी बताया। इस पर पार्वती जी क्रोधित होकर लंगड़ा होने व कीचड़ में पड़े रहने का शाप दे दिया। इस पर बालक ने माता से क्षमा मांगी और कहा मुझसे अज्ञानतावश ऐसा हो गया है। मैंने किसी से द्वेष नहीं किया। बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा यहां गणेश-पूजन के लिए नाग-कन्याएं आएंगी उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करना और ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे। ऐसा कहकर पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं। ठीक एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं। उन्होंने गणेश व्रत की विधि बताई। 21 दिन तक लगातार गणेश व्रत किया। उसकी श्रद्घा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए और वर मांगने को कहा। बालक ने कहा विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरो से चलकर अपने माता-पिता के पास पहुंचे और वो हमें देखकर प्रसन्न हो गणेश जी कहा तथास्तु। वह पुतला महादेव जी के पास कैलाश पर्वत पर चला गया। उस समय पार्वती जी वहां नहीं थीं। जब महादेव जी ने पूछा तब पुतले ने सारी बात बताई, तब महादेव जी ने ये व्रत किया। पार्वती जी प्रसन्न हुईं वह स्वयं कैलाश पर्वत पर आईं। तब पार्वती जी ने यह व्रत किया और कार्तिकेय जी उनसे मिलने आए। कार्तिकेय जी ने जब यह बात विश्वामित्र को बताई तो उन्होंने ये व्रत किया और वे ब्रह्मïर्षि हो गए।

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