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नवदुर्गा की तृतीय देवी चंद्रघंटा की महिमा: Maa Chandraghanta
Maa Chandraghanta

Maa Chandraghanta: नवरात्रि में तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना किये जाने का विधान है। नवरात्रि के हर दिन साधना के लिए महत्वपूर्ण है और इस तीसरे दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में होता है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ‘मणिपुर चक्र’ क्या है तो आपको बता दें कि मणिपुर चक्र में ‘मणि’ का अर्थ ‘गहना’ और ‘पुर’ से तात्पर्य ‘स्थान’ से है। यह चक्र नाभि के पीछे स्थित होता है और इस चक्र का आधार तत्व अग्नि है। यही वजह है कि इसे सूर्य केंद्र के नाम से भी संबोधित किया जाता है। कहते हैं जिस भी व्यक्ति पर मां चंद्र घंटा की कृपा होती है उसे विचित्र अलौकिक शक्तियों जैसे विभिन्न प्रकार की सुगंधों और विविध प्रकार की ध्वनियां सुनाई देती हैं। जिस भी साधक पर मां की कृपा हो उसे कभी पेट से जुड़ी समस्याएं नहीं होती हैं। इतना ही नहीं उसे मधुमेह और रक्तचाप जैसे रोगों का सामना करना पड़ता है।

मां चंद्रघंटा का रूप

मां का स्वरुप बड़ा ही मनमोहक और निराला है। उनकी ललाट पर अर्ध चंद्र और हाथ में गर्जना करने वाला एक घंटा ध्वनि का प्रतीक है इसलिए उन्हें चंद्रघंटा नाम से पुकारा जाता है। दस हाथों में अस्त्र-शास्त्र लिए हुए वे सिंह की सवारी करती हैं। देवी मां के हाथ में विराजमान घंटे की गर्जना से सभी दैत्य, असुर और राक्षस भयभीत रहते हैं जबकि उनके भक्त के जीवन में इसकी ध्वनि सुख-समृद्धि लेकर आती है।

चंद्रघंटा से जुड़ी कथा

Maa Chandraghanta
Maa Chandraghanta Katha

देवी सती के देह त्याग के बाद उन्होंने पार्वती के रूप में हिमालयराज के घर जन्म लिया। उन्होंने ब्रह्मचारिणी बनकर भगवान शिव को पति स्वरुप पाने के लिए साधना और घोर तपस्या की। इसके बाद शिव अघोरियों के साथ पार्वती जी से विवाह करने आये। उनके रूप को देखकर पार्वती की मां मूर्छित हो गई। इसके बाद पार्वती चंद्रघंटा का रूप धारण कर शिव के पास गईं और उन्हें एक आकर्षक राजकुमार बनकर आने के लिए आग्रह किया। उनके आग्रह को शिव ने स्वीकार किया और तभी से मां चंद्रघंटा के इस रूप की पूजा की जाने लगी।

मां चंद्रघंटा का श्लोक

पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ||

मां चंद्रघंटा का मंत्र

ॐ देवी चंद्रघण्टायै नम:

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