अनंत है शिव

कतिपय विद्वानों की मान्यता है कि शिव आर्यों के देवता नहीं थे। मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा की खुदाई में योगस्थ शिव की मूर्तियां मिली हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि शिव मूलत: द्रविड़ों के देवता थे। कुछ अन्य विद्वान उन्हें आष्ट्रिक या नीग्रो संस्कृति की देन मानते हैं। आर्यों में जब अन्य जातियों के साथ समन्वय की प्रवृति बढ़ी और उनसे विवाह संबंध हुए तो अन्य जातियों की महिलाएं, आर्य परिवारों में अपने साथ शिव संबंधी विचारधारा भी लाईं।

डॉक्टर भण्डारकर की मान्यता है कि शिव का सम्बन्ध किसी ऐसी जंगली जाति से रहा होगा, जो सर्प-पूजक होंगे। उनके विचारों के अनुसार इस जाति के प्रभाव के कारण ही शिव के साथ सर्प, विष, शव, खप्पर और शमशान में निवास करने जैसी अनेक बातें जुड़ गई होंगी। 

शिव को आर्येतर मानने के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अधिकांश असुर, शिव के भक्त थे और शिव से वरदान पाकर ही वे शक्तिशाली बनते थे। इन भक्तों में बाणसुर, भस्मासुर और रावण आदि के नाम लिए जा सकते हैं। दक्ष प्रजापति ने जो यज्ञ किया, उसमें शिव को स्थान नहीं दिया गया। यह घटना भी शिव के आर्येतर स्वरूप को उभारती है। इन बातों के अतिरिक्त शिव-पुराण के आधार पर ही हिन्दुओं में शिव का प्रसाद खाना निषिद्ध माना जाता है। यदि शिव आर्यों के ही देवता थे तो उनका प्रसाद खाना निषिद्ध क्यों? 

आर्य संस्कृति के प्रतीक-शिव 3

शिव को आर्येतर देवता मानने का मुख्य आधार अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा प्रतिपादित यह विचारधारा है कि आर्य, भारत के मूल निवासी नहीं थे, बल्कि वे बाहर से आये थे। दूसरी ओर, मोहनजोदड़ों के निवासी द्रविड़ों में शिव पहले से ही प्रतिष्ठित देवता थे। किन्तु यह विचारधारा स्वयं विवादास्पद है। वस्तुत: आर्य, भारत के ही मूल निवासी थे तथा द्रविड़ भी आर्यों के ही एक अंग थे। ‘द्रविड़’ का मूल शब्द ‘द्रविण’ है, जिसका संस्कृत में अर्थ होता है धन संपदा। उन दिनों जो लोग व्यापार करके धन संपदा अर्जित किया करते थे, उन्हीं को द्रविड़ कहा जाता था। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार ‘वेदों में द्रविड़ों को निषाद कहा गया तथा समाज के अन्य चार वर्णों के साथ, उन्हें पांचवे वर्ण के रूप में सम्मान के साथ सम्बोधित किया गया।’ असुरों को परास्त करने के लिए वेदों में पांचों वर्णों का आह्वान है- ‘पंचजना: मम होत्रं जुषध्वम्ï’ अर्थात् पंचजन मेरा आह्वान सुनें। इस ‘पंचजन’ शब्द की व्याख्या यास्क ने अपने निरुक्त में इस प्रकार की है – ‘चत्यारों वर्ण्णा: पंचयोनिषाद:’ अर्थात् चारों वर्ण और पंचम् निषाद’। 

यदि यह मान भी लिया जाये कि शिव आर्यों के नहीं, अपितु आर्योतर जाति के देवता थे तथा आर्यों के ऋषि उन्हें वास्तव में घृणा की दृष्टि से देखते थे, तो यह कैसे माना जा सकता है कि ऐसा देवता आगे चलकर न केवल आर्यों के तीन प्रमुख देवताओं में ही अपना स्थान ग्रहण करले, अपितु अनेक स्थानों पर अन्य दो से भी ऊंचा हो जाए। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि प्राचीन युग में ब्रह्मï, विष्णु, महेश (शिव) इन तीन देवताओं के समर्थक तीन अलग-अलग गुटों में विभाजित थे और वे एक दूसरे की कटु निंदा करते थे। तब क्या यह संभव नहीं है कि इस आपसी विरोध के कारण ही विष्णु या ब्रह्मï के समर्थक भक्तों ने शिव को नीचा दिखलाने के लिए कुछ ऐसी कथाएं गढ़ ली हों, जिनका वर्णन आगे चलकर वामन-पुराण आदि में किया गया। 

शिव को असुरों या दैत्यों का इष्टदेव बतलाना सही है। यह भी सत्य है कि शिव से वरदान प्राप्त करके असुर शक्तिशाली बनते थे। मगर भारतीय संस्कृति में शिव भोले भण्डारी और दानवीर माने गये हैं। वर मांगने पर वे किसी को मना करते ही नहीं। उन्होंने रावण की भक्ति स्वीकार की थी, लेकिन राम के द्वारा पूजन किये जाने पर उन्हें भी विजय का वरदान दिया था। देवताओं की उन्होंने अनेक बार सहायता की, उनके शत्रुओं का संहार किया, यहां तक कि देवताओं के शत्रु तारकासुर का वध करने हेतु पुत्र प्राप्त करने के लिए ही उन्होंने पार्वती से विवाह भी किया। यह भी सर्वविदित है कि अपनी दानशील प्रवृति की अति के कारण ही उन्हें उस समय संकट में फंसना पड़ गया, जब उन्होंने भस्मासुर को यह वरदान दे दिया कि वह जिसके सिर पर भी हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। तब अन्य देवताओं के सहयोग तथा विष्णु की कूटनीतिक चाल के कारण ही वे भस्मासुर से बच पाये। इसलिए असुरों और दैत्यों के द्वारा वन्दनीय होने तथा उन्हें वरदान देते रहने के आधार पर ही शिव को आर्योतर नहीं कहा जा सकता।

जहां तक शिव के प्रसाद को खाने या न खाने का सम्बन्ध है, उसमें मुख्य बात यही है कि परम्परानुसार शिव के पूजन में मिष्ठान्न या इस प्रकार का अन्य कोई पदार्थ रखा ही नहीं जाता, जिसे प्रसाद रूप में प्राप्त करने का प्रश्न उत्पन्न होता हो। उन पर सामान्यत: बिल्वपत्र और आक या धतूरे के पुष्प चढ़ाये जाते हैं तथा अपवाद स्वरूप कभी-कभी कुछ फल भी चढ़ा दिये जाते हैं। भंग के शौकीन जब भंग पीते हैं तो प्राय: बमभोले शंकर का नाम लेकर अथवा उनका भोग लगाकर ही प्रसाद स्वरूप उसे प्राप्त करते हैं। कहीं अगर उनके प्रसाद खाने पर कोई एतराज रहता भी होगा तो केवल इसलिए कि शिव, श्मशान या मृत्यु-देवता के रूप में पूजे जाते हैं। इससे व्यक्ति को उनका प्रसाद लेने में शंका हो सकती है। मगर इस तर्क  से भी शिव का आर्येतर स्वरूप प्रमाणित नहीं होता। दक्ष प्रजापति के द्वारा शिव को यज्ञ में स्थान न देने की घटना केवल व्यक्तिगत अहम् और वैमनस्य का परिणाम थी। उससे शिव की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 

विश्व के आदि ग्रंथ ऋग्वेद में रुद्रदेव की वन्दना है। रुद्र और शिव को एक ही समझने की बात आगे चलकर अनेक ग्रन्थों में की गयी है। यजुर्वेद में ‘शतरुद्रिय’ नाम से शिव पूजन के 66 मन्त्र हैं। शिवपुराण (वायवीय संहिता 6-14-15) में शिव की वन्दना करते हुए कहा गया- ‘सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्रदेव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं। इसकी रक्षा करते हैं और अन्त में सबका संहार कर डालते हैं।’

विभिन्न ग्रन्थों के अध्ययन से निष्कर्ष यही निकलता है कि शिव पूर्णत: आर्यों के देवता थे। वे अनेक नामों से जाने गए तथा समय व्यतीत होने के साथ-साथ उनके स्वरूप में भी कुछ परिवर्तन आते चले गए। स्वरूप परिवर्तन की इन सीढ़ियों के पीछे आर्येतर जातियों का कुछ प्रभाव हो सकता है मगर मूल रूप में ‘शिव’ आर्यों के ही हैं, किसी अन्य के नहीं।

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