अभी मैं दीपावली की बधाइयों से निपटा ही था कि घर में पौत्र जन्म हो गया। चूंकि पहले पौत्री थी, अत: पौत्री के बाद होने वाले पौत्र का महात्म्य भारतीय परम्पराओं के अनुसार कई गुना अधिक हो जाता है। मोहल्ले, सगे-संबंधी और दूर-दराज के रिश्तेदारों से बधाइयां आने लगी। ये बधाई भविष्य में दीपावली की बधाई से बहुत महंगी पडऩे वाली थीं। कुछ लोग इस आशा में बधाई दे रहे थे कि इस अवसर आयोज्य भोज में उन्हें भी बुलाना मैं कहीं भूल नहीं जाऊं।

पत्नी पहले ही कह चुकी थी कि पोता हुआ तो चार-पांच सौ मिलने-जुलने वाले तथा भाई-बांधवों की पार्टी तो करनी होगी। बहन-बेटियों को समुचित विदा का भी प्रावधान होगा। इतने लोगों का खाना चूंकि घर से संभव नहीं है, अत: एक दिन के लिए गार्डन भी लेना पड़ेगा। सर्दी का मौसम है लोगों को रहने, सोने तथा बैठने के लिए कमरों की भी व्यवस्था होनी चाहिए। भगवान की कृपा से पौत्र हो गया तो ये सारे आयोजन अपने आप जीवंत हो गये। छोटों के ओहदे के अनुसार सौ से लेकर पांच सौ रुपये तक दिये गये। इस तरह जन्म के दिन ही पांच-छह हजार रुपये खर्च हो गये।

पत्नी मुक्त मन और हाथ से पैसा लुटाने में लगी थी। उसे अपार खुशी इस बात से भी थी कि अब उसकी वंशबेल आगे चल सकेगी। मैंने उसे समझा भी दिया था कि बेटी और बेटे में कोई फर्क नहीं है, इसलिए वह पौत्री को ही बेटा मान लें, बावजूद उसके भीतर तमन्नाएं उछालें मार रही थीं कि इस बार तो पौत्र ही हो। उसने कई मंदिर व देवालयों में मन्नत भी मांग ली थी। मन्नतें पूरी हो जायें तो उनका भुगतान भी बिना पैसा खर्च किये होता नहीं है। यह खर्चा भी बकाया था।

दोनों पुत्रियों से पूछा कि वे क्या गिफ्ट लेंगी तो वे ज्यादा उत्साहित नहीं थी। उनका कहना था-पापा आप पहले ही कोई कमी नहीं रखते, इसलिए चाहो जो दे देना। मेरी मुश्किल कुछ हद तक तो हल हो गई। लेकिन भांजे-भांजी और ताऊ-चाचा का परिवार मुझे लूटने पर आमादा था। दरअसल उन्हें गुमान है कि मेरे पास पैसों की कमी नहीं है।

खुशी से पगलाया मैं भी इधर-उधर से लोन लेकर पौत्र जन्म की खुशियां में डूबा-उतरा रहा था, साथ ही इतरा सा भी रहा था। खुशियों पर लगाम लगाना कठिन था। मुझे लग रहा था सारे कार्यक्रम को अंजाम दिया तो डेढ़ से दो लाख रुपये का खर्चा होना था। डेढ़-दो लाख कहां से आयेंगे, इसकी चिंता मुझे थी, बाकी जश्न को आधुनिक बनाने में जुटे थे। गुप्ताजी मेरे मित्र हैं। वे सूद लेकर पैसा उधार दे देते हैं। उन्हें बताया तो वे बैग भर लाये। मुझे पता है उनके पास कालाधन खूब है। सभी तरह की कर चोरी ने अपने सी.ए. के माध्यम से खूब करते हैं। आयकर वाले तो उनके यहां बैठे ही रहते हैं।

इस तरह गुप्ताजी के होते हुए धन की समस्या से तो मुक्ति थी, परंतु सूद टाइम पर देने की हिदायत साथ में थी। पौत्र जन्म की पार्टी शुभ मुहूर्त में सम्पन्न हो गई। गिफ्टें भी आई, नकदी तो मात्र चार हजार आईं। इस तरह हमने इस खुशी को अंजाम दिया। हम भी तो किसी के खाने जाते हैं, उस दृष्टि से खिलाना भी आवश्यक था। आजकल मैं गुप्ताजी का ऋण चुका रहा हूं। बेटे को बुलाकर मैंने कह दिया कि बेटा, एक ही बेटा बहुत होता है। वह भी मान गया है। इस तरह पौत्र जन्म की महंगी खुशी से हम निपट गये हैं। गुप्ताजी से निपटना बाकी है।

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