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निन्यानवे का चक्कर-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं असम: Moral Story
Moral Story for Kids

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Moral Story: पुराने जमाने की बात है। असम के किसी ग्रामीण इलाके में एक कुम्हार रहता था। उसकी छोटी कमाई से उसका घर-खर्च आसानी से चल जाता था। उसे अधिक कमाने की चाह नहीं थी। दोनों वक्त वह पेटभर खाता था, रात को पूरी नींद सोता था। उतने से वह संतुष्ट था।

वह दिनभर ढेरों बर्तन बनाता, अगले दिन उन्हें बाजार में बेच आता। दिन में डेढ़ या दो रुपये का नफा होता था। इतनी कमाई से ही उसका गुजारा बढ़िया से चल जाता था। रोटी-कपड़ा और छत की समस्या पूरी होने के कारण वह वह मस्त रहता था।

अपने काम से निपटकर रोज शाम को वह अपनी बाँसुरी लेकर बैठ जाता और घंटों बजाता रहता। इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे। दिन बीतने के साथ-साथ एक शांत लड़की के साथ उसका विवाह भी हो गया।

उसकी पत्नी एक अत्यंत सुंदर और सुशील लड़की थी। वह अपने पति के काम में हाथ बँटाने लगी। घर का सारा काम वह खूब मन लगाकर करती। पत्नी के आने के बाद कुम्हार की आमदनी पहले से बढ़ गई।

दोनों दंपति की मेहनत. तरक्की और खशी को देखकर उनके पडोसी जलते थे। दोनों दिन भर मिलकर काम करते, शाम को काम से निपटकर कुम्हार बाँसुरी बजाता, उसकी पत्नी उसके सुर में सुर मिलाकर घर के भीतर बैठी कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी।

एक दिन पत्नी ने कुम्हार से कहा- “तुम जितना कमाते हो, वह रोज खर्च हो जाता है। हमें अपनी कमाई से कुछ न कुछ बचाना भी जरूरी है।”

इस पर कुम्हार बोला- “हमें ज्यादा कमाई करके क्या करना है? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूँ। चाहे छोटा ही सही, हमारे पास अपना घर है, खाने की कमी नहीं है। इससे बढ़कर और हमें क्या चाहिए?”

इस पर पत्नी बोली- “मैं जानती हूँ कि ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इसमें बहुत खुश भी हूँ। परन्तु बुरे वक्त के लिए भी हमें कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए।”

कुम्हार को अपनी पत्नी की बात उचित लगी। अब दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे। पत्नी भोर में ही उठकर काम में लग जाती। कुम्हार भी देर रात तक काम करता। फिर भी दोनों अधिक बचत नहीं कर पाते। अतः दोनों ने फैसला किया कि इस तरह अधिक कमाई के चक्कर में अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है। वे फिर पहले की तरह मस्त रहने लगे।

एक दिन कुम्हार बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था। शाम ढल चुकी थी। वह थके पैरों से खेतों से गुजर रहा था कि अचानक उसकी निगाह रास्ते पर पड़ी एक लाल मखमली थैली पर पड़ी। उसने थैली को उठाकर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। थैली में चाँदी के सिक्के भरे पड़े थे।

कुम्हार ने सोचा- यह थैली जरूर किसी की गिर गई है, जिसकी हो उसे दे देनी चाहिए। उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाई। दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आया। अंत में उसने ईश्वर का दिया इनाम समझकर उसे उठाया और घर लेकर आया।

घर आकर कुम्हार ने अपनी पत्नी को सारा किस्सा कह सुनाया। पत्नी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया।

कुम्हार ने मुस्कुराते हुए कहा- “तुम कहती थीं कि हमें बुरे वक्त के लिए कुछ बचाकर रखना चाहिए। सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें उपहार दिया है।”

पत्नी बोली- “ऐसा ही लगता है। हमें गिनकर देखना चाहिए कि चाँदी की कितनी मुहरें हैं।”

दोनों जमीन पर बैठकर मुहरें गिनने लगे। पूरे निन्यानवे थे। दोनों की बाँछे खिल गई। पत्नी बोली- “इन्हें हमें बुरे वक्त के लिए रख देना चाहिए। कल को हमारा परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे।”

कुम्हार बोला- “पर निन्यानवे की गिनती अच्छी नहीं लगती। हमें पहले सौ पूरे करने होंगे। फिर हम इन्हें बचाकर रखेंगे।”

पत्नी को पति की बात अँची। दोनों जानते थे कि चाँदी के निन्यानवे मुहरों को सौ करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। फिर भी दोनों ने दृढ़ निश्चय किया कि वे इसे पूरा करके ही दम लेंगे।

अब दोनों ने चौगुनी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया। कुम्हार बड़े सवेरे उठकर बर्तन बेचने निकल जाता। देर से घर लौटता और देर रात तक बर्तन बनाता रहता।

पत्नी दिनभर घर का कामकाज करती। एक पल भी मुफ्त में नहीं गँवाती। बचे समय को बर्तन बनाने में लगाती। शाम होते-होते दोनों थककर चूर हो जाते। काम के बोझ के कारण कुम्हार ने बाँसुरी बजाना छोड़ दिया। पत्नी गुनगुनाना भुल गई। उसने अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में कहीं जाना छोड़ दिया, बस चौबीसों घंटे काम में जुती रहती।

दोनों दिन-रात एक करके पाई-पाई जोड़ रहे थे। अब दो जून के बदले एक जून के भोजन पर दिन गुजारना शुरू कर दिया।

यूँ ही तीन महीने बीत गए। कुम्हार के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके यहाँ जरूर कोई परेशानी है, जिसकी वजह से ये दिन-रात काम में जुते रहते हैं।

छः महीने बीतते-बीतते उन्होंने सौ मोहरें पूरे कर लिए। अब तक दोनों को पैसा जोड़ने की लालच लग चुकी थी। दोनों सोचने लगे- सौ मोहरों से क्या होगा? हमें सौ और जोड़ने चाहिए। अगर सौ और जुड़ गए तो कोई बड़ा व्यापार शुरू कर देंगे और मजे से दिन काटेंगे।

दोनों ने अपनी अथक मेहनत जारी रखी। इधर, पड़ोसियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। एक दिन पड़ोस की रूपाली दोपहर को कुम्हार के घर जा पहुँची। कुम्हार की पत्नी बर्तन बनाने में व्यस्त थी।

रूपाली ने इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् कुम्हार की पत्नी से पूछा- “बहन! पहले तुम रोज शाम को मधुर गीत गुनगुनाया करती थीं, हम भी मजे ले लेते थे। आजकल तुम्हारा गीत सुनाई नहीं देता। तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?”

कुम्हार की पत्नी ने ‘यूँ ही’ कहकर बात टालने की कोशिश की और अपने काम में लगी रही। परंतु रूपाली कब मानने वाली थी। वह बात को घुमाकर बोली- “आजकल बहुत थक जाती हो न? तुम्हारी हालत देखकर मेरा कलेजा छलनी हो जाता है। कहो तो मैं तुम्हारी मदद कर दूं।”

रूपाली के प्यार भरे शब्दों को सुनकर कुम्हार की पत्नी पिघल गई और बोली- “हाँ बहन, मैं सचमुच बहुत थक जाती हूँ, पर क्या करूँ? हमें सौ पूरे करने थे। इसलिए दिन-रात मेहनत करने के चक्कर जैसे सब कुछ भूल गए। हम बड़ी मुश्किल से सौ पूरे कर पाए हैं।”

“क्या मतलब?”- रूपाली बोली।

कुम्हार की पत्नी ने रूपाली को निन्यानवे मोहरों का पूरा किस्सा कह सुनाया।

ध्यान से सुनने के बाद रूपाली बोली- “बहन, तुम दोनों तो गजब के चक्कर में पड़ गए हो। तुम्हें इस चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए था। यह चक्कर आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता। आदमी को इन्सान से मशीन बनाकर रख देता है।”

कुम्हार की पत्नी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा- “तुम किस चक्कर की बात कर रही हो? मैं कुछ समझी नहीं।”

“अरी बहन, निन्यानवे का चक्कर।” रूपाली का जवाब था।

कुम्हार की पत्नी अवाक् होकर रूपाली का मुँह ताकती रह गई।

शिक्षा : अधिक बटोरने की चाहत इंसान के सुख-चैन को नष्ट कर देती है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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