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आशा सिंह

एक छोटे से कस्बे में रहने वाले रामनारायण की रमा से नई-नई शादी हुई थी। नव-विवाहिता ने बड़े प्रेम और मनोयोग से पति के लिए भोजन तैयार किया था। पति की मनपसंद मेवों वाली खीर भी बनाई थी। पति के काम से लौटने में कुछ समय बाकी था इसलिए बगल के घर वाली पड़ोसन से बातें करनी लगी। इतने में ना जाने कब एक कुत्ता घर में घुस आया और रसोईघर में रखी खीर खाने लगा। उठा-पटक की आवाज सुन कर रमा दौड़ी आई तो कुत्ते को खीर जूठी करते देखकर क्रोध से पागल हो गई। आव देखा न ताव आंगन में रखा मोटा डंडा कुत्ते की पीठ पर दे मारा, न जाने क्रोध में कितना आवेग था कि कुत्ता उस वार से वहीं ढेर हो गया। पति प्रेम में दीवानी रमा इस अंजाने में हुए अपराध से बहुत दुखी हुई पर क्या हो सकता था।

कुछ समय बाद रामनारायण के घर में एक पुत्र ने जन्म लिया। समय बीतते पता न लगा और पुत्र राजेश, बालक से युवा हो गया। दोनों पति-पत्नी सर्वगुण संपन्न पुत्र को देख कर मन ही मन खुश होते और पुत्र को दीर्घायु होने का आशीर्वाद देते।

बरसात के मौसम में एक दिन अचानक राजेश को बुखार हो गया। कई दिन तक भी जब बुखार न उतरा और उसकी हालत बिगड़ने लगी तो पुत्र को बचाने के लिए रामनारायण ने अपनी सारी शक्ति और पूंजी लगा दी। परंतु कुछ भी लाभ न हुआ और डाक्टरों ने जवाब दे दिया। पति-पत्नी दुखी मन से ईश्वर से कहते कि उन्हें किस बात का बदला मिल रहा है, उन्होंने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया। जब राजेश के प्राण निकलने लगे तो वह बोला, ‘मां, याद करो आपने एक बार एक कुत्ते को खीर खाने पर कमर तोड़ कर मार डाला था। मैं वही हूं, अब आपको छोड़ कर इस उम्र में आपकी कमर तोड़ कर जा रहा हूं और उसके प्राण निकल गए।

 

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