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बात मेरी दीदी की शादी की है। विवाह की रस्में पूरी होते-होते सुबह हो गई। दीदी का चेहरा तो घूंघट में था लेकिन जीजाजी के चेहरे पर थकावट साफ झलक रही थी। मां ने मुझ से कहा, ‘दामादजी को मंडप से बुला कर कमरे में ले जाओ। थोड़ा आराम कर लेंगे। बाकी रस्में बाद में होती रहेंगी। चूंकि मैं भी काम में व्यस्त थी इसलिए हड़बड़ी में मंडप में पहुंचते ही झट से बोली, ‘चलिए जीजाजी कमरे में। जीजाजी मेरा मुंह देखने लगे तो मैंने फिर कहा, ‘चलिए न कमरे में। इस बार जीजाजी ने मज़ाकिया अंदाज में कहा, ‘अरे-अरे, धीरे बोलिए। आपने तो सबके सामने ही कह दिया। अपनी और उनकी बात का मतलब समझ में आते ही मेरा शर्म के मारे बुरा हाल हो गया था।

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