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बंद घड़ी का सही टाइम—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Band Ghadi ka Sahi Time-Grehlakshmi Story

अपनी परेशानियों में गुम संध्या, सड़क के किनारे फुटपाथ पर चली जा रही थी. तिलंगाना के एक छोटे से गाँव से दिल्ली में पढ़ने आई, संध्या की ज़िंदगी की गाड़ी, बड़ी जद्दो जहद के बाद, मुश्किल से पटरी पर आई थी. एक टूटी हुई शादी और जन्म के साथ मिले गरीबी के अभिशाप से उबरने का एक ही तरीका संध्या को समझ आया था, और वह था ‘शिक्षा’.
अपनी ज़िंदगी को अगर अपने बलबूते पर संवारना है, तो शिक्षा से बड़ा कोई साधन नहीं है. इसीलिए अपने सारे सामर्थ्य को समेंट कर, उसने किसी तरह अपने लिए, दिल्ली की एक ट्रेन का टिकट और अपने कॉलेज की पहले सेमिस्टर की फीस जुटाई थी. माता-पिता ने भी अपनी उम्मीदों की गठरी उसके नाजुक कंधों पर रखकर, एक बार फिर उसे बिदा कर दिया था.
आज से कुछ साल पहले जब संध्या अठारह साल की छोटी सी उम्र में, ससुराल वालों के अत्याचारों से तंग आकर मैके लौट आई थी, तो उसे माँ–बाप से ज्यादा सहारा उसकी पुरानी स्कूल टीचर अमृत मैडम ने दिया था. पढ़ाई-लिखाई में हमेशा से अव्वल रहने वाली संध्या को उसकी मैडम ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की सलाह दी थी।
शादी के बाद, पढ़ाई बीच में छूट जाने के कारण वह अपनी कक्षा के बाकी स्टूडेंट्स से कुछ साल बड़ी थी, लेकिन इस वजह ने उसकी पढ़ाई के प्रति गंभीरता में इजाफा ही किया था. उसका गरीबी से निकलने का जज्बा यूँ भी उसे हर वक़्त पढ़ने को प्रोत्साहित करता था.
बारहवीं कक्षा में जब संध्या ने टॉप किया, तो अमृत मैडम ने ही सुझाया था कि, उसे एक साल जी जान से आई.आई.टी. के एन्ट्रेंस एग्जाम्स की तैयारी करनी चाहिए और अगले साल कॉम्पीटीशन में बैठना चाहिए. एक बार आई.आई.टी. में एडमिशन हो गया तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ेगा. जब हाथ में आई.आई.टी. की डिग्री होगी, तो जॉब तो झक मारकर पीछे-पीछे आऐंगी.
अपनी टीचर के दिखाए सपनों की छाँव में संध्या अपने भविष्य को तराशने निकल पड़ी थी. उसकी दिन रात की मेहनत रंग लाई और उसे आई. आई. टी. एन्ट्रेंस में इतना अच्छा रैंक मिला कि बड़ी आसानी से उसे आई.आई.टी. दिल्ली में एडमिशन और साथ ही स्कालर्शिप भी मिल गई थी. स्कालर्शिप को कन्टिन्यू रखने के लिए, संध्या को हर सैमिस्टर में बैस्ट ग्रैडस लाने थे और उसका एक ही तरीका था, मेहनत और सिर्फ मेहनत. क्यूँकी सवाल सरवाईवल का था इसलिए ये स्कालर्शिप उसका जुनून नहीं जरूरत थी, सो ये मेहनत उसकी ज़िंदगी की कुंजी बन गई.
सब कुछ ठीक ही चल रहा था. वह अपना सारा खर्च छोटी- मोटी ट्यूशन और स्कालर्शिप में निकाल लेती थी. हालाँकि घर जाने का टिकट वह पिछले तीन सालों में, एक बार भी नहीं जुटा पाई थी. दिल्ली जैसे महेंगे शहर में खाने रहने का भी खासा खर्च आता था। अब तो बस आखिरी साल बचा था. समझो के हाथी तो निकल गया, पूंछ ही बची थी। एक बार पूंछ निकल जाए बस, फिर वह इंजीनियर बनकर ही अपने घर जाने वाली थी.
लेकिन अचानक कोरोना के आतंक ने सबको दहला दिया. सारा विश्व इसकी चपेट में ऐसा आया कि, बड़े-बड़े देश, बड़ी-बड़ी सरकारें तक हिल गईं. ऐसे में भला मामूली सी संध्या की क्या बिसात. वह तो वैसे भी अपनी कश्ती को जैसे-तैसे ठेल रही थी.

अब सरकार ने अचानक 21 दिन का लॉक डाउन लगा दिया था. सभी स्टूडेंट्स आनन-फानन में अपने घर लौट गए. हॉस्टल खाली हो गए. पढ़ाई का नुकसान ना हो इसलिये क्लाससेज भी ऑन लाइन कर दी गईं.
संध्या पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा.
हॉस्टल खाली करे तो रहे कहाँ?
घर वापस जाए तो जाने का किराया कहाँ से लाए?
अगर किसी से पैसे उधार लेकर किराया जुटा भी ले, तो घर जाकर अपनी ऑन लाइन क्लासेज तो वह बिल्कुल नहीं कर पायेगी. उसके माता-पिता की उस झुग्गी में इंटरनेट का कनैक्शन लेना और लैपटॉप खरीदना, यह सब तो उसके लिए हाथी का पाँव उठाने के बराबर था.
यहाँ तो किसी तरह लाइब्रेरी में बैठकर नोट्स बना लेती थी और फिर जरूरी कामों के लिए अपनी रूममेट का लैपटॉप इस्तेमाल कर लेती थी.
लेकिन अब कहाँ जाए? क्या करे?
इसी उधेड़ बुन में संध्या अपने कॉलेज से निकलकर, सामने वाली सड़क के किनारे फुटपाथ पर चली जा रही थी, कि, तभी उसकी नज़र एक छोटे से बच्चे पर पड़ी, जो सड़क के बीचों-बीच चल रहा था. संध्या ने इधर-उधर देखा, लेकिन उसे बच्चे के आस-पास कोई भी दिखाई नहीं पड़ा. ये बच्चा कहाँ से आया? किसका बच्चा है? वह सोच ही रही थी कि, सामने से स्पीड से आती एक कार को देखकर संध्या घबरा गई और उसने दौड़कर उस बच्चे को गोद में उठा लिया और फुटपाथ पर आ गई.
फुटपाथ पर आकर वह आते-जाते लोगों से पूछने लगी –
“अरे भई ये बच्चा किसका है?”- फिर उसने सड़क के दूसरी ओर बने घरों की तरफ देखते हुए अपना सवाल और जोर से दोहराया, लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया.
अब उसने बच्चे की ओर देखा. गोल मटोल सा कोई डेढ़ दो साल का बच्चा होगा. काले घुंगराले बाल, बड़ी-बड़ी आँखें, जो संध्या की ओर उतनी ही हैरत से देख रहीं थीं जितनी हैरत से संध्या उसकी ओर, जैसे वह भी यही सवाल पूछ रहा हो –
“अरे भई ये आँटी किसकी है? मैंने अभी इसे फुटपाथ से बचाया है.”
‘इसी से पूछती हूँ.’ संध्या ने सोचा.
“बेटा, तुम्हारा घर कहाँ है?”- उसने सामने की ओर उंगली से इशारा किया और बोला-
“दिददी.”- ‘मुझे दीदी बुला रहा है शायद.’- संध्या ने सोचा और खुशी से उसे एक प्यारी सी किस्सी कर दी.
अब संध्या उस बच्चे को गोद में उठाए, सड़क के दूसरी ओर लाइन से बने मकानों की ओर चल पड़ी.
उसने फिर बच्चे से ही पूछा-
“बेटा तुम्हारा घर कौन सा है?”-उसने फिर एक ओर उंगली करके कहा-
“दिददी.”
‘अब ये दिददी क्या है यार.’ संध्या ने अपना सिर खुजलाया.
फिर उसने उसकी उठी हुई उंगली की तरफ देखा, तो पाया कि वहाँ एक घर का दरवाजा खुला था. वह उसी ओर बढ़ गई। वहाँ पहुंचकर उसने खुले दरवाजे को धीरे से नॉक किया, और कहा-
हैलो कोई है?- लेकिन कोई नहीं आया. अब वह धीरे-धीरे घर के अंदर आ गई और फिर आवाज लगाई-
हैलो, कोई है? ये बच्चा आपका है क्या?- कोई जवाब नहीं, अब उसने उस कमरे पर नजर डाली।
उसने देखा कि, यह कीमती सामान से भरा एक विशाल ड्रॉइंग रूम था, जो बुरी तरह फैला हुआ और बेतरतीब हालत में था.
तभी उसकी नज़र कमरे के एक कोने में अपने खिलौने फैला कर बैठी, एक क़रीब चार-पाँच साल की बच्ची पर पड़ी. उस बच्ची को देखते ही ये बच्चा संध्या की गोद से उतर कर दिददी-दिददी बोलता हुआ उसकी ओर दौड़ पड़ा.
‘ओह; तो ये है इसकी दीदी.’- संध्या ने कहा, फिर वह उस बच्ची से बोली-
“बेटा तुम्हारी मम्मी कहाँ है? उनको बुला दो ज़रा.”
“नहीं हैं.”- उसने अपने खेल से ध्यान हटाए बगैर लापरवाही से कहा.
“कहाँ गई हैं.”- कोई जवाब नहीं आया.
“ हैलो, घर में कोई है?”- संध्या ने खुद ही आवाज लगाई, लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं मिला.
“ हें हें हें;” बच्ची ताली बजाकर हँसती हुई बोली-
“ मैंने कहा था ना, नहीं है. देखा तुम्हारी कच्ची हो गई”- अब वह बच्चा भी ताली बजाने लगा.
“तो फिर कहाँ गईं है तुम्हारी मम्मी?”- संध्या ने प्यार से पूछा.
“भगवान जी के पास गईं हैं.”- बच्ची ने बिना अपनी डॉल से नज़र उठाए, बड़ी सहजता से कहा.
“क्या;”- सुनते ही संध्या की आँखें फटी की फटी रह गईं. वह बोली-
“ये क्या कह रही हो बेटा? ऐसे नहीं बोलते. गलत बात.”
तभी बच्ची के पास पड़ा सेल फ़ोन बज उठा और बच्ची ने फ़ोन उठाकर-
“हैलो पापा.”
“हैलो बेटा, कैसा है मेरा बच्चा? गोलू कहाँ है”- फ़ोन का वॉल्यूम काफ़ी तेज था इसलिये संध्या उनकी बातें आराम से सुन पा रही थी.
“यहीं है पापा, आँटी के साथ अभी आया है.”- बच्ची ने बड़ी सहजता से कहा।
“आँटी, कौन आँटी? गोलू उसके पास कैसे पहुँच गया? कहाँ है वो आँटी?- उसके पापा की चिंता फोन में से टपकी पड़ रही थी।
“यहीं है पापा.”- बच्ची ने अपनी गुड़िया से ध्यान हटाकर संध्या की ओर देखा।
“उसको फ़ोन दो.”- बच्ची के पापा का पारा काफी हाई हो चुका था।
“ठीक है पापा.” – कहकर बच्ची ने फ़ोन संध्या की ओर बढ़ाया. संध्या ने कहा-
“हैलो.”
“कौन हो तुम? और मेरे घर में क्या कर रही हो? मेरे बेटे को कहाँ ले गई थी तुम? मैं तुम्हें छोडूँगा नहीं. निकलो, निकलो वहाँ से.”- वह शख्स एक साँस में बोलता जा रहा था. उसकी परेशानी की ऊंचाई उसकी आवाज बता रही थी.
“शांत, शांत हो जाइए आप.- उसकी धारा प्रवाह सवालों को बांध लगाते हुए संध्या ने कहा –
“देखिए, पहले तो आपके दोनों बच्चे सही सलामत हैं, दूसरे मैं कोई चोर या उठाईगीरी नहीं हूँ.”- कह कर सन्ध्या ने सारी कहानी ज्यों की त्यों उसे बता दी. लेकिन वह शख्स अभी भी संतुष्ट नहीं था, सो वह तुरंत बोला-
“मैं अभी आ रहा हूँ. मेरी फैक्ट्री पास में ही है. तुम रुको वहीं, मैं आकर देखता हूँ.”- वह शख्स गुस्से से उबलते हुए बोला.
“हाँ, हाँ, आप आ जाइए. मैं यहीं हूँ.”- कहकर संध्या ने फ़ोन रख दिया। ‘क्या मुसीबत है यार. मैं तो नमाज़ बक्शवाने चली थी, यहाँ तो रोज़े गले पड़ गए.- संध्या बड़बड़ाई.
उधर अपनी फैक्ट्री में बच्चों का पापा जिसका नाम रवि था, उसने जल्दी से कार की चाबी उठाई और अपने मैनेजर के केबिन में जाकर बोला –
“ अजय मैं घर जा रहा हूँ. जल्दी आ जाऊंगा.”- फिर तेजी से अपनी कार की ओर बढ़ा.
कार स्टार्ट करके वह खुद पर ही झल्लाकर बड़बड़ाता जा रहा था –
“क्या प्रॉबलम है यार, ये औरत घर में कैसे आ गई. एक तो ये गोलू ने भी ना, जब से नया-नया दरवाजा खोलना सीखा है, तब से डर ही लगा रहता है. कितना समझाकर आया था कि, दरवाजा नहीं खोलना. मेरे पास तो चाबी होती है, तो मैं खुद दरवाजा खोल लेता हूँ और फिर वक़्त जरूरत के लिए एक चाबी पड़ोस वाली आँटी को भी दे रखी है. लेकिन ये कौन सी आँटी घर मैं घुस आई यार.
क़रीब दस मिनट में रवि घर पहुँचा और घर के खुले हुए दरवाजे पर खड़ा, ये देखकर हैरान रह गया कि, वह लड़की ना तो डरी और ना ही अब तक भागी थी. बल्कि बड़े आराम से बच्चों के साथ खेलते हुए उन्हे खाना खिला रही थी. छोटा गोलू उसकी पीठ पर लटका हुआ था और पिंकी सामने बैठी थी. वे सब खाना खाते-खाते लूडो खेल रहे थे.
यह देखकर वह ठिठक गया. उसका गुस्सा भी थोड़ा शांत हुआ और उसके माथे की चढ़ी हुई त्योरीयाँ भी थोड़ी नीचे खिसक गईं. लेकिन वह समझ नहीं पा रहा था कि, ये हो क्या रहा है? ये लड़की कौन है? क्यूँ है? उसके बच्चों से इसका क्या लेना देना है?
फिर एक लंबी साँस लेकर वह घर में दाखिल हुआ और सीधा अटैक करते हुए बोला-
“ऐ लड़की—-.”
“संध्या, संध्या नाम है मेरा.”- रवि की बात बीच में ही काटते हुए संध्या बोली.
“हाँ हाँ वही, सा संध्या. कौन हो तुम? और यहाँ किस इरादे से आई हो?- इससे पहले कि वह कुछ कहती, पिंकी चहक उठी-
“पापा, आँटी बहुत अच्छी हैं. इन्होंने कितना अच्छा परांठा भी बनाया हमारे लिये. प्लीज पापा इनको यहीं रहने दो ना.”
“बेटा तुम अंदर जाओ, गोलू को भी ले जाओ. पापा अभी आते हैं.”- रवि ने पिंकी से कहा.
“ओ.के. पापा.”
“हाँ तो अब तुम बताओ कि, तुम यहाँ क्या कर रही हो?”- रवि ने संध्या से पूछा.
“जी, जैसा कि मैंने आपको फ़ोन पर बताया था, मैंने आपके बेटे को अकेले सड़क के बीचों- बीच पाया था, जो एक कार के नीचे क़रीब-क़रीब आ ही चुका था. उसी का घर ढूंढते-ढूंढते मैं यहाँ तक पहुँच गई थी. अब अगर किसी की जान बचाना आपकी नज़र में गुनाह है, तो होगा, लेकिन मेरी नज़र में नहीं है.
“अब क्या मैं, आपसे एक सवाल पूछ सकती हूँ, यदि आप को आपत्ति ना हो तो?”- संध्या तमतमा कर बोली-
“पूछिए.”- रवि लापरवाही से बोला.
“अगर आप अपने बच्चों को इतना ही प्यार करते हैं, तो इन्हे यूँ, यहाँ राम भरोसे छोड़कर कहाँ चले गए थे आप?. यदि आज गोलू को कुछ हो जाता, तो कौन जिम्मेदार होता.?”- संध्या की आवाज तेज होती गई और ना चाहते हुए भी गुस्सा उसकी आवाज में छलक ही पड़ा.
“इनकी मम्मी भी यहाँ नहीं थी. है कहाँ इनकी मम्मी?”- संध्या ने चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए पूछा.
इस सवाल ने रवि के मजबूती से बंधे भावुकता के बांध पर जैसे सीधा वार किया और वह आँखों के रास्ते बह निकला.
यह देखकर संध्या थोड़ी विचलित हो गई. उसने रवि को हाथ पकड़ कर सोफ़े पर बिठाया और उसे पानी का गिलास पकड़ाते हुए संजीदगी से बोली –
“ देखिए, मेरा कोई हक तो नहीं बनता आपसे कुछ पूछने का, लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि, दिल का बोझ हल्का करना हो, तो एक अजनबी से बेहतर कोई नहीं होता.”
पानी का एक घूंट पीकर रवि सोफ़े पर धम्म से बैठ गया. तभी गोलू आकर संध्या की गोद में बैठ गया और पिंकी भी रवि की गीली आँखें देखकर उसकी गोद में सहमी सी चुप चाप लेट गई. पिंकी के बालों में उंगली घूमाते हुए रवि जैसे कहीं गहरे सपने से बोला-
“कैसे बताऊँ तुम्हें कि, कहाँ है, इनकी मम्मी? और क्यूँ हैं ये दोनों यहाँ अकेले?”- एक गहरी साँस लेकर वह फिर बोला-
“इस नामुराद कोरोना ने हमारे हँसते-खेलते घर से उसकी धूरी ही छीन ली. मेरी पत्नी श्वेता, जिसके बेहिसाब प्यार और अथक प्रयास का नतीजा था, ये हमारा घर. उसके जाते ही सब कुछ बिखर गया.”- एक लंबी साँस लेकर रवि ज़रा रुककर फिर बोला-
“ अगर नौकरी होती तो छुट्टियाँ ले लेता लेकिन अपने बिजनेस में ज्यादा दिन फैक्ट्री से दूर भी नहीं रह सकता. कुछ दिन बच्चों को उनकी बुआ के घर पर भी छोड़ा था, लेकिन उनके घर भी जब कोरोना ने दस्तक दी, तो अपना बचा-कुचा सरमाया समेंटकर मैं वापस अपने घर चला आया.
इस वक़्त किसी को इनकी देखभाल के लिए रखूँ भी तो, किसे? और कैसे? दूध से जला हूँ, छाछ तो क्या, पानी भी फूँक फूंककर पीता हूँ. इसलिए बस हर दस मिनट में घर पर फ़ोन करता रहता हूँ और दो-तीन बार घर का चक्कर लगा लेता हूँ.”
“लेकिन इस तरह बच्चों को घर पर अकेला छोड़ना भी तो सुरक्षित नहीं है.”- संध्या ने चिंता जताते हुए कहा.
“अब तुम ही बताओ, मैं क्या करूँ? किसी को भी घर में बुलाते हुए डर लगता है. क्या पता वह अपने साथ क्या ले आए.”- रवि ने अपनी सबसे बड़ी चिंता बताते हुए कहा.
“मेरे पास एक सोल्यूशन है, अगर आपको ठीक लगे तो.”- संध्या ने कहा.
“ और वो क्या.”- रवि का आश्चर्य फिर झलका.
“मैं आपके बच्चों का ध्यान रख सकती हूँ, मुझे कोरोना भी नहीं है. कल ही टेस्ट करवाया है.”
“और उसके बदले मुझे तुम्हारे लिए क्या करना होगा?”
“मुझे अपने घर में एक कमरा देना होगा और ऑन लाइन क्लास अटेंड करने के लिए, एक लैपटॉप की व्यवस्था करनी होगी.”- कहकर संध्या ने अपनी सारी कहानी रवि को बता दी.
“लेकिन, तुम अपनी पढ़ाई, घर और बच्चे सब एक साथ कैसे संभालोगी?”
“उसकी चिंता आप मत करिए. गरीब की बेटी हूँ. मेहनत करने की आदत है मुझे. विश्वास कीजिए आपका घर और बच्चे मेरी निगरानी में सुरक्षित रहेंगे. आप चाहें तो मेरा आई.कार्ड. गारंटी के तौर पर अपने पास रख सकते हैं.”- संध्या ने अपना बैग खोलते हुए कहा.
“नहीं संध्या, उसकी जरूरत नहीं है. अगर तुम्हारे इरादे गलत होते तो, आज तुम कुछ भी कर सकतीं थीं. अब तुम पर इतना विश्वास तो हो गया है मुझे.”- रवि ने झिझकते हुए कहा।
इस तरह रवि और संध्या की अंधे-लंगड़े जैसी जोड़ी एक दूसरे का सहारा बन गई. जैसे किसी फ़रिश्ते ने ही उन दोनों को मिलवाया था.
अगली शाम रवि जब फैक्ट्री से घर वापस आया तो संध्या बच्चों के लिए दूध बना रही थी. दूध के गिलास उन्हे पकड़ाकर उसने पिंकी के कान में जाने क्या कहा कि, दूध पीने में हमेशा नाक मुँह बनाने वाली पिंकी, पूरा गिलास दूध गटागट पी गई. उधर दीदी को हराने के चक्कर में गोलू मियां भी जल्दी-जल्दी अपना गिलास खाली कर रहे थे.
रवि मुसकुराते हुए अपने कमरे में चला गया और जब नहा धोकर बाहर निकला तो, चाय नाश्ता टेबल पर लगा हुआ देखकर उसकी बाँछें खिल गईं. श्वेता हमेशा उसके फैक्ट्री से आने पर, चाय नाश्ता तैयार रखती थी. लेकिन अब तो ये सब सपने की बातें हो चुकी थीं.
रवि की चाय के साथ ही अपनी चाय लेकर संध्या भी रवि के पास आ बैठी और बच्चों की दिन भर की भोली-भाली बातें रस ले लेकर सुनाने लगी.
धीरे-धीरे रवि का बिखरा घर, फिर से सँवरने लगा था. सामान से भरी चार दीवारी, फिर से घर लगने लगी थी. रवि की नॉर्थ इंडियन किचन से जीरे की बजाए राई और करी पत्ते की महक उड़ने लगी और नारियल ने अपनी जगह हर सब्जी में बना ली थी. बच्चों के खेलने और सोने का रूटीन संध्या ने अपनी क्लासेज के हिसाब से बिठा लिया था.
शाम का वक़्त फैमिली टाइम होता था. सब साथ-साथ लॉन में कभी फुटबॉल खेलते तो कभी ब्लाइन्ड फोल्ड. सब शाम का नाश्ता साथ में करते और फिर लॉन में धमाल मचाते.
संध्या की मौजूदगी कहीं रवि के घर के साथ-साथ उसके दिल में भी जगह बनाती जा रही थी. उसका आस-पास होना रवि को अच्छा लगने लगा था. जब संध्या अपने लंबे घुंगराले बालों को खुला छोड़ देती तो रवि का कितना मन करता कि, एक गुलाब की कली गमले से निकाल कर, उसके बालों में टाँक दे. परंतु वह खुद को रोक लेता. संध्या के मन में क्या है, ये भी तो वह नहीं जानता था. हालाँकि रवि ने उसकी आँखों में भी अपने ख्वाबों का अक्स कई बार देखा था पर फिर रवि सोचता ये मेरे ही अरमानों का अक्स है या सचमुच उधर भी कोई अरमान जागे हैं, कैसे पता चले ? ‘फिर वह तो इतनी यंग है भला दो बच्चों के बाप को क्यूँ पसंद करेगी’ रवि का दिमाग फिर अपनी चलाने लगता.
लेकिन ये तो सच था कि अब कहीं से भी ये परिवार रवि को अधूरा नहीं लगता था.
लेकिन कब तक?
लॉक डाउन तो आज नहीं, तो कल, खत्म हो ही जाएगा. फिर क्या होगा, जब संध्या वापस चली जाएगी?
यही सोच-सोचकर रवि कभी-कभी उदास हो जाता और अपने परिवार के अधूरेपन को भरने का ये टेंपोरेरी तरीका उसे कहीं गहरे सताने लगता.
एक दिन रवि के चेहरे की उदासी देखकर संध्या पूछ ही बैठी-
“क्या हुआ रवि साहब, आप इतने उदास क्यूँ हैं?”
“कुछ नहीं, बस सोच रहा था कि, लॉक डाउन खत्म हो जाएगा, तो तुम चली जाओगी और हमारी ज़िंदगी फिर से तिनका-तिनका हो जाएगी.”
“ हूँ, तो ये बात है.- संध्या ने एक लंबी साँस ली और फिर कुछ सोचते हुए बोली-
“लेकिन लॉक डाउन खुल जाएगा तब तो पिंकी, गोलू का स्कूल और डे केयर भी खुल जाएगे ना.”
“हाँ, खुल तो जाएगे, लेकिन वो तो दोपहर तक ही होगा. उसके बाद का क्या?”- रवि का सवाल अपना जवाब ढूंढ रहा था।
“ हाँ ये तो है.”- फिर संध्या थोड़ा रुककर बोली-
“क्यूँ ना हम एक काम करें?”
“वो क्या.”
“देखो, सुबह पिंकी, गोलू स्कूल जायेगे, मैँ कॉलेज और आप फैक्ट्री.”
“ फिर?”
“फिर ये कि, मेरी ज़्यादातर क्लाससेज तो दोपहर तक खत्म हो जाती हैं. क्लास करके मैं घर आ जाऊँगी और गोलू, पिंकी को खिला- पिलाकर सुला दूँगी. फिर बैठकर अपने असाइनमेंट कर लूँगी. फिर शाम को तो आप आ ही जायेंगे. मुझे लाइब्रेरी जाना भी पड़ा तो शाम को चली जाऊँगी.
“और तुम्हारा हॉस्टल?”
“वो तो छोड़ना ही पड़ेगा.”- संध्या निश्चिंतता से बोली.
“लेकिन हमारे लिए तुम इतना कुछ तो पहले से ही कर रही हो, वो भी बिना किसी स्वार्थ के. अब मैं तुम से और मदद ऐसे ही नहीं ले सकता.”
“ ऐसे ही मतलब?”
“ ऐसे ही मतलब ये कि, इसके बदले में, मैं तुम्हें जो भी देना चाहूँ, उसके लिए तुम ना नुकर नहीं करोगी.- रवि ने एक-एक शब्द पर जोर डालते हुऐ कहा.
“क्या देना चाहते हैं, आप मुझे?”- संध्या ने अदा से अपनी घनी-घनी पलकें उठाकर पूछा।
“तुम ही बताओ ना, तुम्हें क्या चाहिए?”- संध्या की आँखों में झाँकते हुए रवि बोला.
“कुछ देना ही चाहते हैं, तो पिंकी और गोलू को अपना कहने का हक दे दीजिए.”- संध्या नजरें झुकाकर धीरे से बोली.
“संध्या.”- रवि ने खुशी से भरी आंखे छलकाते हुए, झूमकर संध्या को अपने अंक में भर लिया और उसके कान में हल्के से बुदबुदाया-
“तुमने तो मुझे दोनों जहां दे दिए.”
कोरोना तो किसी का भला करने के लिए इस दुनियाँ में आया नहीं है फिर भी इस क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरूप ही सही, कहीं कुछ ठीक हो ही गया। संध्या की जो नैया शांत समुद्र में भी हिचकोले खा रही थी, किसे पता था कि उसे तूफान ही किनारे लगायेगा। बंद घड़ी भी दिन में एक बार सही टाइम बताती है और ये संध्या और रवि का सही टाइम था।

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