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कथा

हफ्ते भर की मेहनत के बाद पूरा घर सेट हुआ था, बिजेन्द्र के आॅफिस जाते ही मैंने सोचा आज अदरक वाली गरमागरम चाय पीते हुए अपनी मनपसंद पत्रिकाएं पढूंगी, जो पिछले कई दिनों से नहीं पढ़ पा रही थी। तभी डोरबेल की आवाज सुनकर दरवाजा खोला तो सामने 4-5 महिलाएं खड़ी थी। इनमें से एक महिला बोली, हम सब इसी काॅलोनी में रहते हैं आप यहां अभी शिफ्ट हुए हैं तो सोचा आपसे परिचय कर लें”।

‘‘जी हां, क्यों नही? कहते हुए मैं उन सभी को अंदर ले आयी।
‘‘आपका नाम क्या है? हसबैंड क्या करते हैं? कहां से आये हैं? एक महिला ने इतने सारे सवाल उछाल दिये ।
‘‘जो मेरा नाम पायल मल्होत्रा है मेरे पति बिजेन्द्र लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता है। अलीगढ़ से ट्रांसफर होकर आये हैं”

‘‘ओह, तुम्हारे हसबैंड पी डब्लू डी में असिसटेंट इंजीनियर हैं यानि पांचों उंगलियों घी में, ” एक महिला ने जब यह कहा तो मैं थोड़ी नाखुश हो गयी, लेकिन बोली कुछ नहीं।

उनमें से अधेड़ उम्र की एक महिला बोली, ‘‘मिसेज मल्होत्रा, हमने अपनी काॅलोनी में ‘नारी शक्ति’ नाम की एक संस्था बनाई हुई है। इस संस्था के माध्यम से हम जरूरतमंद औरतों की मदद करते हैं। उन्हें घर बैठे रोजगार और रचनात्मक कर्मों के लिए प्रोत्याहित करते हैं, साथ ही उनकी समस्याओं का समाधान करने का प्रयास भी करते हैं। इसी संबंध में हम माह के प्रथम शनिवार की दोपहर को बारी-बारी से हर एक सदस्या के घर पर मीटिंग रखते हैं।

‘‘यह तो बहुत नेक काम है बताइये इसमें मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूं”

‘‘हम सभी सोच रहे हैं अगले महीने के शनिवार को आपके यहां मीटिंग रखी जाये इस बहाने आपका सभी से परिचय भी हो जायेगा।

मैंने खुशी-खुशी हामी भर दी। जब वह जाने लगीं उनमें से एक हंसते हुए बोली, ‘‘मिसेज मल्होत्रा, उस दिन खाने-पीने का भी प्रबंध करके रखियेगा।”

माह के प्रथम शनिवार को अपने यहां नेककाम की मीटिंग को लेकर मैं अति उत्साहित थी क्योंकि मैं हमेशा से यही चाहती थी कि मैं कुछ करूं जो समाज के लिये हितकारी हो। उस दिन मैंने अपना ड्रांइग रूम व्यवस्थित कर लिया चाय, काॅफी और कोल्डड्रिंकक्स के साथ खाने में छोले-भटूरे का भी प्रबंध कर लिया, साधारण किन्तु आकर्षक साड़ी पहनकर मैं उनकी प्रतीक्षा करने लगी।

दोपहर एक बजे तक सभी महिलाएं आ गयीं। भारी भरकम साड़ियों में कीमती आभूषणों से लदी और गहरे मेकअप में रंगी-पुती महिलाओं को देखकर मुझे लगा जैसे यह सब किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने आयी हैं।

‘‘मिसेज मल्होत्रा, यह है मिसेज गुप्ता, मिसेज श्रीवास्तव, मिसेज शर्मा, मिसेज खान… एक महिला ने सभी का परिचय करवा दिया…

परिचय सम्मेलन समाप्त होने के बाद मैं कोल्ड ड्रिंक लेकर आयी तो मिसेज श्रीवास्तव हो हो करके हंसते हुए बोली, ‘‘भई कोल्ड ड्रिंक तो हम पीते नहीं”
‘‘तो फिर मैं शरबत और लस्सी लेकर आती हूं, कहते हुए मैं जाने लगीं तभी वह मेरे कंधे पर हाथ रखकर धीरे से मुस्करा कर बोली,” आप तो बड़ी नादान हैं मिसेज मल्होत्रा शरबत लस्सी के बजाय बीयर शीयर…

‘‘माफी चाहूंगी, यह शौक मेरे यहां किसी को नहीं है इसलिये मेरे यहां उपलब्ध भी नहीं है,” मैं थोड़े रोष भरे स्वर में बोली…

तभी मिसेज गुप्ता पसीना पौंछते हुए बोली, ‘‘बाप रे कितनी गर्मी है? प्लीज ऐसी तो आॅन कर दीजिये, इन कूलरों से भला कोई गर्मी दूर होती है।”

‘‘जी, हमारे यहां ऐसी नहीं है हमारा काम कूलर से चल जाता है,” मैंने सपाट स्वर में कहा तो वह सब मुझे ऐसे देखने लगी जैसे मैंने कोई आश्चर्यजनक बात कह दी हो।
मिसेज शर्मा बोली, चलो, इंट्रोडक्शन, और चाय पानी तो हो गया तो अब काम की बात कर ली जाये”

यह सुनकर मिसेज श्रीवास्तव अपने होठों पर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए बोली, ‘‘मैं तुम सभी को ऐसे काम की बात बता रही हूं सुनोगी तो मज़ा आ जायेगा,” यह सुनकर ‘अरे जल्दी सुनाओ, कंट्रोल नहीं हो रहा है’ का सामूहिक स्वर ड्रांइग रूम में गुंजायमान हो उठा।

‘‘अरे बी ब्लाॅक के मिस्टर सिंह है ना उनका सैकेट्री से चक्कर चल रहा है इसी को लेकर मियां बीबी में आये दिन झगड़ा होता रहता है।”

‘‘अरे बी ब्लाॅक के मिस्टर सिंह हैं ना उनका सैकेट्री से चक्कर चल रह है इसी को लेकर मियां बीबी में आये दिन झगड़ा होता रहता है”

‘‘अरे हटो भी यह भी कोई नई खबर है, इसे तो काॅलोनी का बच्चा-बच्चा जानता है मैं सुनाती हूं तुम्हें धमाका खबर ‘डी ब्लाॅक के मिस्टर लाल के बेटी अपने ड्राइवर के साथ चली गयी है। और यह भी सुनने में आया है कि उसने कोर्ट मैरिज भी कर ली है। ”

सभी महिलाएं ठहाका लगा कर हंस पड़ी ‘‘यह तो बहुत ही अच्छा हुआ मिसेज लाल बहुत घमण्डी है कम से कम उनका घमंड तो टूटा”

यह सुनकर मुझे कोफ्त होने लगी क्या नेक मीटिंग का उद्देश्य यह है दूसरों की बखिया उधेड़ी जाये इसलिये मैंने विनम्रता से कह ही दिया, ‘‘प्लीज छोड़िये इन सब बातों को, जिस उद्देश्य के लिये हमने यह मीटिंग रखी है अगर उस पर चर्चा कर ली जाए तो बेहतर होगा”

‘‘हां हां, आप शायद ठीक कहती हैं मिसेज मल्होत्रा, पहले अगर मनोरंजन कर लें तो मूड थोड़ा हल्क हो जायेगा, मिसेज खान ने सुझाव दिया।

‘‘दिस इज गुड आइडिया,” कहते हुये मिसेज रावत मेरी तरफ मुखातिब होकर बोली, ‘‘प्लीज, आप ताश लेकर तो आईये, इस बार तो मैं ही जीत कर जाउंगी पिछली बार तो बुरी तरह हार गयी थी”

यह सुनकर तो मेरे मन में आया, इन सभी को यहां से फौरन जाने के लिये कह दूं लेकिन ऐसा करने के लिये मेरे संस्कार इजाजत नहीं देते, अतएव खाने का प्रबंध करने के बहाने मैं रसोई में चली गयी।

ड्राइंग रूम में एक-दूसरे की बुराइयों -भलाईयों का दौर चलने के साथ-साथ साड़ियों, गहनों की कीमत बताने और शेखी बधारने की होड़ सी मच गयी।

अचानक छायी शांति से मैं चैंक गयी मुझे लगा हो ना हो कोई गम्भीर बात जरूर है, मैं चुपचाप लाॅबी में खड़े होकर सुनने लगी।

गम्भीर और दुखी स्वर में मिसेज श्रीवास्तव बोली, ‘‘इस तरह तम सभी के साथ हंसने-बोलने से गम हल्का हो जाता है वरना घर में तन्हाई में घुटते रहो।”

‘‘क्या मिस्टर श्रीवास्तव देर से घर आते हैं”
एक आवाज आयी
‘‘देर से क्या आते ही नहीं है, महीने हो महीने में एक-दो चक्कर लगा जाते हैं”

‘‘आप उनमें कुछ कहती क्यों नहीं,”

‘‘पहले से ही मुंह पर नोटों की गड्डियों मारकर कहते हैं, अपनी जरूरतें पूरी करो इनसे मेरे से कोई संबंध नहीं है तुम्हारा।”

‘‘कमाल है, आप यह कैसे सह रही हैं? उनपर अपना हक जमाइये आखिर आपके पति हैं वह,” एक उत्तेजित स्वर उभरा।

यह हक मैंने अपनी गलती से ही खो दिया है। पैसे की चाह ने मुझे उनसे बहुत दूर कर दिया है पास आने की अब कोई गुंजायश नहीं है।”

मिसेज खान भावुक हो उठी,” कम से कम आपको पैसा तो मिल रहा है लेकिन यहां तो मेरे शौहर ने एक-एक पैसे के लिये मोहताज कर दिया है कहते हैं अल्लाह ने हाथ-पैर दिये हैं कमाओ और खाओ, वह तो खुदा का शुक्र है मेरे मरहम अब्बू मेरे नाम एक फ्लैट कर गये उसी के किराये से गुजर हो रही है”

‘‘अरे वाह, यह भी कोई बात हुयी? आप उनकी बीबी हैं, अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये उनसे पैसा मांगना आपका हक है और आप चुप बैठी हैं? भरपूर गुस्से से एक उत्तेजित स्वर उछला।

‘‘तुम सब तो मेरी अपनी हो अब तुमसे क्या छिपाना? यह सब मेरे गुनाहों की सजा है जो भुगत रही हूं, मुझे शुरू से ही ‘मेल कंपनी’ पसंद रही। इसी वजह से मेरे सैंकड़ों पुरूष मित्र थे इन्हें मेरी यह दोस्ती ना पसंद थी। इन्होंने मुझे बहुत समझाया, लेकिन मैंने इनकी एक ना सुनी बल्कि उल्टा चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘मेरी निजी जिंदगी में आपको दखलअंदाजी करने का कोई हक नहीं है, रहा सवाल मेरी जरूरतें पूरी करने के लिए पैसे का तो इसके लिये मेरे अजीज दोस्तों की कमी नहीं हैं। यह सुनकर उन्होंने मेरे से सभी रिश्ते खत्म कर लिये और साथ ही पैसा देने से इंकार करते हुये कहा हम दुनिया की नजर में ही बस मियां बीबी है।
‘‘अब आपके दोस्त कुछ मदद करते हैं”? गमगीन माहौल से एक बुझी सी आवाज आयी।
दर्द भरी आवाज में मिसेज खान बोली, ‘‘जैसे राजा-महाराजाओं की रियासतें लुट जाती हैं उसी तरह जब मेरे भी रूप और जवानी की रियासत का वजूद जब धीरे-धीरे खत्म होने लगा तब वह सभी दोस्त कन्नी काटने लगे जो कभी मेरे सच्चे हमदर्द हुआ करते थे। जिन्हें मैं अपना सच्चा दोस्त और हमदर्द समझती थी आज वह झांकने भी नहीं आते कि मैं किस हाल में हूं।”

यह सुनकर माहौल में नमी छा गयी तभी मिसेज गुप्ता अपने घुंघराले बालों में उंगलियां फिराते हुये बोली, ‘‘मेरे पास तो पति और पैसा दोनों ही हैं फिर भी मैं खुश और संतुष्ट नहीं हूं।”

‘‘क्या मिस्टर गुप्ता आपको दिल से प्यार नहीं करते?” किसी ने चुटकी ली।

‘‘करते हैं बहुत प्यार करते हैं नोटों की बारिश करते हैं मेरे उपर लेकिन ऐसा प्यार और पैसा किस काम का जो नारी को मां का दर्जा ना दिला सके?”

‘‘अरे आप उन्हें किसी अच्छे और कुशल डाॅक्टर को दिखाइये ना मां बनना तो हर औरत का एक खूबसूरत सपना होता है, सांत्वना भरा स्वर उभरा।

गर्दन नीची करते हुये मिसेज गुप्ता ” भरी आवाज में बोली, ‘‘इस खूबसूरत सपने को मैंने खुद अपने हाथों से मसल दिया”।

‘‘आखिर आपने ऐसा किया क्या?”
‘‘सोचती थी किसीको कुछ नहीं बताउंगी लेकिन तुम सबका अपनापन देखकर मन सब कुछ बताने के लिये मजबूर हो गया। मिस्टर गुप्ता से मैंने अपनी मरजी से दूसरा विवाह किया था। मैं शुरू से ही भरपूर ऐशोआराम से जिंदगी गुजारने के सपने थे मेरे लेकिन गरीब पिता ने अपनी हैसियत के अनुसार मेरी शादी एक मामूली क्र्लक से कर ही वह मुझे बहुत प्यार करता था लेकिन उसके साथ साधारण और अभावों से भरा जीवन बिताना। मेरे लिये संभव ना था।

एक दिन उसके बाॅस मिस्टर गुप्ता के यहां पार्टी में गयी तो उनकी सम्पन्नता देखकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गयी। भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह में मैंने अपने सीधे-सादे पति को तलाक देकर अपने पिता की उम्र के बराबर मि0 गुप्ता से विवाह कर लिया। आज मेरे पास किसी भी चीज की कमी नहीं है लेकिन तब भी मैं असीम दुःख झेल रही हूं, पार्टियों में कोई मुझे मि. गुप्ता की बेटी बताता है तो कोई बहू।

इसके साथ ही एक -एक महिला अपनी दुःख भरी कहानी सुनाकर माहौल को गमगीन कर गयी उन्हें देखकर मुझे लगा उपर से कितनी संपन्न दिखने हंसने-बोलने वाली यह महिलायें वास्तव में अंदर से कितनी खोखली टूटी, पराजित, असहाय लाचार, बेबश और मजबूर हैं जिंदगी का अकेलापन और अपने सूने मन को बहलाने कर लिये सामाजिकता से जोड़कर एक संस्था का नाम दे दिया है नारी शक्ति लेकिन यहां सब कुछ विपरीत है।

लंच करने के बाद मेरा ड्राइंग रूम, हा हा ही ही हो हो’ से फिर गुंजायमान हो उठा। दिखावा ढोंग और बनावटी पन का आवरण ओढ़े खोखली हंसी बिखेरती हुई उन महिलाओं के जाने के बाद ही मैंने चैन की सांस ली। और अगले महीने कली मीटिंग में ना आने की अपनी असर्मथता भी जता दी।

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