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grehlakshmi celebrity story

​दोनों हथेलियां कमर पर टिकाए उसने कुपित दृष्टि से सिद्धू को देखा । सिद्धू उसकी कोप दृष्टि से अनभिज्ञ दो-तीन छोकरों से घिरा कंचे का निशाना साध रहा था । खेल में उसकी इस एकाग्रता ने उसे और भन्ना दिया । दांत किटकिटाते हुए बड़बड़ाई, “अक्खा दिन मस्ती… घर की फिकिर है हलकट को!” बानी की दुकान के ओटले पर चढ़ गई । वहीं से हांक लगाई, “ये मेलया! बंद कर तेरा गोटी-बोटी… नल आया रे, पड़ लवकर… लाईन लगाके रक्खी मैं ।”

आशा के विपरीत, पहली ही पुकार में सिद्धू ने कमला की तरफ गरदन घुमाई । अंदेशा ही था । नल आने का समय हो रहा है । उसकी पुकार मचने ही वाली है; पर एकाएक दांव छोड़कर कैसे भागे? मुश्किल से तो उसका ‘चानस’ आया है । गोटियों से खीसा खाली हो गया है और उंगलियों के बीच निशाना साधती गोटी तनी हुई है । तय किया, ‘चानस’ नहीं छोड़ेगा । बगैर गरदन घुमाए हुए ही प्रत्युत्तर में उसने आलाप-सा भरा, “तू चल, बस, अब्बी जाता मैं ।”

कमला इस ढिठाई से और चिढ़ गई । लगभग चीखी, “ये…आता-बीता कुच्च नई… लगेच उट्ठ, नई तो देऊं आके एक थोबड़े पर! सिद्धा नल पे जा, कोई लंबर इद्दर-उद्दर किया तो काऊन टंटा करेगा हलकट!”

तंबाकू होंठों में दबी हुई थी । ‘पिच’ से पीक थूकी और ‘थू’, ‘थू’ करके लुगदी उगली । पीछे मुड़कर क्षणांश को बानी पर नजर डाली । ‘गिराकों’ में व्यस्त बानी उसे देख मुस्कराया-“जाएगा, जाएगा ।”

फिर एक कमाँठी की दस पैसे वाली ‘ब्रुक बॉण्ड’ की चाय की पत्ती का पैकेट थमाते हुए बोला, “हुमर से इदरीच खेलता । फिकिर नई होती तेरे को!” चेतावनी-सी दी कमला को, “संभाल हां, नई तो ये पन तेरे को रत्नू का माफक एक रोज धक्का देगा ।”

“मरने दे । किसको-किसको संभालूं बोल?” चेहरा घुमाकर सिद्धू को ताका । वह गोटी छोड़-छाड़कर नल की ओर सरपट भागा । इत्मीनान से बानी की तरफ मुड़ी, “अपनाच पेट भरने के वास्ते क्या मैं अक्खा दिन रखड़ती? हरामी नई समझते तो ।”

ओटला उतरकर अपनी गली में मुड़ने लगी तो एकाएक खयाल हो आया, माल के बारे में पूछ ले । पलटी और नीचे से ही आवाज लगाई, “गुड़ आया, बानी?”

“सब्बू नक्कीच आएगा । नौ बजे तलक सरना को भेजना, पारी भेजूं?”

“ड्रम गड़ता क्या मेरे इदर? फकत दस किल्लो भेज । अऊर सुन,” स्वर को थोड़ा तरेरा, “वजन बरोबर करना हां, बोत डांडी मारने कू लगा तू ।”

चलते-चलते यह भी बता दिया कि “सरना को वकत नई, विष्नू को भेजेगी नई तो मैं खुदिच आएगी ।”

“सरना को भेज? हुं हुं!” नाली के पसरे बोदे को टांग पसारकर लांघती हुई बड़बड़ाई-“शेंडी लगाता हरामखोर! सब समझती मैं । चानस खोजता है ।”

सरना तब फेरी के लिए नहीं जाती थी । उसके काम में मदद करती थी । चाहे सौदा-सुलफ लाना हो, चाहे ‘गिराकों’ को बाटली भरकर देना हो, चाहे बानी के यहां से ‘माल’ लाना हो । एक रोज अड़ गई, ‘मेरे को नई जाने का बानी की दुकान पर । मैं नई जाएगी गुड़ वजन करने । बापू को भेज, नई तो सिद्धू को भेज ।”

कमला को लगा, लड़की कामचोरी दिखा रही है, दस-पंद्रह किलो वजन-उठाने के डर से । अभी तक तो लाती थी । यह एकाएक क्या चढ़ गया मगज में? सिद्धू अभी बहुत छोटा है । विष्णु को भेजते डरती है । लाएगा आठ किल्लो और बोलेगा दस । कितने चक्कर लगाएगी बानी के? यह पूछने- भर के लिए कि कितना माल ले गया । उसे सुबह-सुबह ही भट्ठी सुलगानी पड़ती है । बाहर निकले तो माल बनाने का वादा । टालमटोल से पारा चढ़ गया । भौंहें माथे से जा लगीं । नथुने फूल गए । सीधा गाली निकली, “कामचोर रांड! काय को नई जाएगी? बइठ के घानी खाने कू मांगता!” “मैं एकलीच खाती?”“खाते तो सब, पन काम के वास्ते ना बोलने से चलता?” कमला थोड़ी विनम्र हुई ।

“बाकी सब करेगी, फकत बानी की दुकान पर नई जाएगी ।”

“पन काय को नई जाएगी?”

“बोला ना बस, नई जाएगी ।”

लपककर उसने फर्श पर उकडूं बैठी सरना के चेहरे को ठुड्डी से उचकाया और एक जोरदार झापड़ रसीद कर दिया, “दस किल्लो उठाने की पिच्चू ये नखरा! हां! मैं एकलीच मरूं अक्खा दिन! ऊपर से दादागिरी…नई जाने का…हां! बोल, जाती कि नई?” उसने पंजा ताने हुए आखिरी चेतावनी दी ।

“मंगता वो कर, पर मैं नई जाने की माल लाने । गंदा-गंदा बात करता वो मेरे से ।” रोते-रोते सरना चीखी ।

“हलक मेली!” कमला बाई उसके ढीठपने से एकाएक बौरा उठी, “तेरा बाप सरखा है । क्या गंदा-गंदा बात किया तेरे से? बोल? बोल न… नई तो मुंडी तोड़कर रख देगी।” सरना के सिर के बाल उसकी मुट्ठी में भिंचे हुए थे । चेहरा छत की ओर तना हुआ था । कसा ।

“बोलूं?”

“बोल न!” उसने मुट्ठी समेत बालों को झटका ।

सरना झटके के साथ ही ‘अइया’ करके चीखी । कमला ने खींच थोड़ी ढीली की तो सरना बोली, “बोलता…”

उसके अटकते ही कमला फिर खौखियाई, “नाटक करती?”​​

“बोलता…बोलता, मेरे पिशाब कू हाथ में पकड़..अठन्नी देगा तेरे को ।” झिझकते हुए सरना ने वाक्य पूरा किया ।

वह सनाका खा गई । बाल हाथ से छूट गए ।

“गिराक पन नई होते सुबू…” सरना ने गिरफ्त से छूटे हुए अपने सुबकते चेहरे को घुटनों में छिपा लिया ।

आंखों में खून उतर आया, जैसे पूरी बाटली एकबारगी हलक में उतार ली हो । घुटनों में मुंह दिए बैठी सरना पर बगैर नजर डाले खोली से बाहर हो गई । रास्ते में भुनभुनाती रही, “देखती भड़ुवे को । बेटी सरखी छोकरी के संग ऐसी गलीज हरकत! थूह “पिच से उसने अपने दाहिने तरफ पड़ रही बिना प्लास्टर वाली रामरती की चाल पर थूका । पांडे की बाकड़ेनुमा पान की दुकान को लक्ष्य कर थूका । गोबर पुते वागले मोची के झोंपड़े पर थूका । मन ही मन तय कर लिया कि ठीक ऐसे ही वह बानी की गल्ले ठुंसी दुकान पर झुकेगी और बानी के सामने पहुंचकर उसके पपीते जैसे लंबोतरे चेहरे पर थूकेगी ।

तनतनाती हुई दुकान का ओटला चढ़ रही थी कि बानी की दृष्टि उस पर पड़ गई।

“आओ-आओ कमला सेठानी! माल बरोबर था न कल का? मेरठ का गुड़ है ।” लहकदार? स्वर में स्वागत किया उसने ।

स्वागत-भरे स्वर को झटककर वह शुरुआत में ही चुनी हुई बिस्किट, चॉकलेट की भरनियों पर थूकने की तैयारी में झुकी ।

“चॉकलेट मंगता क्या सिद्धू के वास्ते?” बानी के पूछते ही यकबयक चेहरा सीधा हो उठा । गले से रिरियाती-सी आवाज फूटी, “दस पैसे की पढ़रपुरी दे ।” थूक गले में ही घुटक गया ।

“बास्स!” बानी तंबाकू की पुड़िया गठियाते हुए कनपटियों तक फैलकर मुस्कराया, “अऊर कुछ?”

“नई ।” अपने स्वर का उतरापन खुद पर कटाक्ष करता लगा । क्या हो गया तेरे को? सहसा भीतर जकड़ दी गई असहाय कमला ने सिर उठाया । फिस्सू पड़ गई, सामने होते ही । बास्स!..अरे, अभी भी मौका है । गिराकों की गरदी भी दुकान पर है । कर दे नंगा इस भड़ुवे को । थूक दे थोबड़े पर । मां-बहन को पकड़ाए न साआलाऽऽ…

पर कुछ नहीं हो पाया । भीतर जकड़ दी गई कमला को अनसुना ही रहने दिया उसने । चेतना ही जैसे जड़ हो गई । मात्र हाथों ने हरकत की । तंबाकू की पुड़िया आगे बढ़कर ले ली बानी से । ओटला उतरने की भी ताकत चुक गई थी। शरीर को लगभग घसीटते हुए घर की तरफ मोड़ा ।

किसके बूते पर लड़े? अपने? एकली अपने? ताकत है लड़ने की? मजाल थी कि बानी की छीछालेदर किए बैगर ही लौट पड़ती? पर लौटती कैसे न! बानी के एहसान जो छाती पर लदे बैठे हैं । कैसे कुलबुलाने लगे थे वे जैसे ही थूकने को तत्पर हुई!

जरूरत पड़ने पर दौड़ती तो उसी के पास है । खूब जानता है उसका कच्चा चिट्ठा । कहलाने को सेठानी है । टेंट हमेशा ही बिसूरती रहती है । कच्चे माल के लिए कभी रोकड़ा कम है, तो कभी हफ्ता पूरा नहीं हो पाता कि उगाही करने खीसें निपोरते हुए हवलदार आ टपकता है । पिछली बरसात की घटना ताजा हो गई । खोली के कवले बदलवाने थे । तीन-चार सौ की मोटी रकम ढीली किए बैगर छत की टपकन को रोकना संभव नहीं था । फल्लियां भी लटक आई थीं । हर वक्त अंदेशा बना रहता कि कहीं एकाध फल्ली टूटी तो केवल दो-चार ‘गिराकों’ को सोनापुर पहुंचा देंगे । बानी ने सुना तो फौरन तसल्ली दी कि काम शुरू कर ले । दो-एक दिन में कुछ और वसूली साध लेगा तो काम पूरा करा देगा…

खोली में घुसी तो पाया कि सरना आंखें मूंदे लादी पर चित पड़ी है । आंखें जरूर मुंदी हुई थीं, पर सोई कतई नहीं थी। पुतलियों की हरकत से आभास हुआ । कमला को लगा, बंद पलकों को चीरकर एकाएक सरना की पुतलियां उछलेंगी और ‘पिच’ से उसके मुंह पर थूक देंगी । वहां से हट ली । ‘गिराकों’ वाली खोली में आकर बैठ गई ।

उस रोज से तय कर लिया कि न सरना को बानी की दुकान पर भेजेगी, न धंधे पर ही मदद लेगी। वैसे भी दारू का धंधा उसे पसंद नहीं था । कुछ दिनों से कह भी रही थी कि पड़ोस की रुकमनी ताई की तरह वह भी पालक, मेथी, सोवा की फेरी करना चाहती है । अगर वह उसे मंजूरी दे दे तो वह लोकल का पास निकाल लेगी और रुकमनी ताई के साथ रोज सुबह पांच बजे वाली लोकल पकड़कर भायखला मार्केट खरीदारी के लिए निकल जाया करेगी । यह भी कहा सरना ने कि रुकमनी ताई ने बिक्री के प्रति उसे बेफिक्र रहने को कहा है । अपने से बगल वाली कॉलोनी उसे पकड़वा देगी । बंधेले ‘गिराक’ मिल जाएंगे । बिल्डिंग वाले हरी साग-सब्जी खरीदते भी खूब हैं । ताजा सब्जी के नाम पर बस पालक, मेथी की जुडियों से ही मन को संतुष्टि देते हैं । उसे आश्वस्त भी किया कि चार घंटे की मेहनत के पिच्छू तीन-चार रुपयों का मुनाफा कम थोड़े ही है। शाम को मैं टेशन रोड पर पाटी लगाएगी । कुछ न कुछ तो उदरपन मिलेगा ।

दूसरे रोज ही उसने सरना का लोकल पास निकलवा दिया था । और माल खरीदने के लिए पंद्रह रुपये टिका दिए । सरना गले से झूल गई । अच्छा लगा था उसे । चलो, छोकरी तो अच्छे काम से लगी ।

सरना की मेहनत ने उसे दंग कर दिया । दिन-भर खटती । सुबह फेरी, शाम को टेशन रोड पर पाटी । न उससे एक पैसा अपने खर्च के लिए लेती है, न कमला कभी उसे फिजूल खर्च करता हुआ ही पाती । उलटा उससे पूछ और लेती कि अगर उसे जरूरत पड़े तो उसकी गुल्लक से पैसा निकाल ले । वह नहीं लेती, यह अलग बात है । जरूरत तो हमेशा ही मुंह बाए खड़ी रहती है ।

कुछ हफ्तों पहले की घटना स्मरण हो आई । तब यह नहीं पता था कि कल्पू से उसका इतना चल रहा है । अब सारी बातों का तालमेल बैठाती है । जरूर उसके साथ ही दादर गई होगी । अकेले दुकान पर जाकर कुछ खरीदना उसके बस का रोग नहीं था । जब भी कुछ लेना होता, उसके जी को पड़ जाती । अंदर पहनने वाली बाजार की लेनी थी तो उसे टेशन रोड साथ ले गई थी । दुकान वाले ने पूछा था कि कितने ‘लंबर’ की चाहिए तो सिर नहीं उठाया गया था उससे । कमला ने अंदाजा बताया था । फेरी से लौटी थी तो पाटी उतारते न उतारते किलकी थी । एक बड़ा-सा डिब्बा उसे पकड़ा दिया था-“खोल के देख ।”

उसने विस्मय से देखा था, “पन है क्या?”

“बोला न, खोल के देख ।” उसके हैरान होने पर सरना हंसी से दोहरी होने लगी, “बिच्छू नई डिब्बे में ।”

पैकेट खोलते ही अवाक् रह गई थी । डिब्बे में उसके मनपसंद रंग की नौ वारी (नौ गज) साड़ी थी सुनहले पाड़ की । साथ में था कत्थई रंग का खन् का कपड़ा, चोली के लिए । स्तब्ध दृष्टि सहसा धुंधला आई थी । शरद-पूनो का ज्वार उमड़ आया और तहाई हुई साड़ी पर कई जगह धब्बों में अंकित हो गया ।

सरना की हंसी जड़ हो गई । उसे महसूस हुआ कि उसके उपहार ने सहसा आई को किन्हीं पूर्व स्मृतियों से जोड़ दिया है, किसी नासूर को कुरेद दिया है । तभी तो वह खुश होने की बजाय एकाएक अकुलाकर विचलित हो उठी है…

“चाय बनाती मैं ।” कहकर वह निकट से उठ दी थी ।

कमला मिनटों तक वैसे ही बैठी रही । सरना को क्या अंदाजा कि कहां ले जाकर पटक दिया था उसने!

…नंदू ने ऐसे ही तो एक शाम उसे डिब्बा थमाकर खोली की सिटकनी चढ़ा दी थी। ‘खोल के देख कमला!’ ठीक इसी तरह आग्रह करता रहा था । इसी तरह वह अचरज से भरी-भरी उससे पूछती रही थी कि आखिर डिब्बे में क्या है?

डिब्बे में बैंजनी फूलों वाली वायल की छह गज की साड़ी थी । पहनती वह नौ वारी थी । पर नंदू उस शाम कहां माना था? साड़ी अपने सामने ही पहनवाई थी । और ठीक उसी तरीके से पहनवाई थी जैसे उसके मुल्क वाली औरतें पहनती थीं, सीधे पल्ले की ।

सरना तब से बानी की दुकान पर नहीं फटकती । वह जरूर मौक-बेमौके उसकी पूछताछ कर लेता है ।

खोली पर पहुंची तो पाया, दो गिराक खड़े उसका रास्ता देख रहे हैं । पीना नहीं था, साथ ले जाना था । एक को पाव सेर दिया । दूसरे को अक्खी बाटली चाहिए थी । गिराक गए तो ओटले पर खड़े होकर नल की तरफ देखा । धुंधलका झम-झम करता बढ़ रहा था ।

गिराकों की भीड़ आजकल रात में खास नहीं होती । बीच का महीना है । सात और दस तारीख के आसपास तो संभलना मुश्किल हो जाता है । ‘लेबरस’ के ये पगार उठाने के दिन होते हैं । बीच के दिनों में धंधा मंदा रहता । फिर गरमी चढ़ती है बीस तारीख के बाद । मजदूर खर्ची उठाते । उधार उसके यहां चलता नहीं । इसलिए उधारियों का रुख उसकी खोली की तरफ होता नहीं । पहले उधार बहुत चलता था; पर वसूली के लिए बड़ी मगजपच्ची करनी पड़ती थी । पगार के दिन या खर्ची के रोज उन्हें घेरना पड़ता । मजबूरन उसने उधार देना ही बंद कर दिया । हालांकि इस निश्चय को अमल करने के साथ ही बिक्री कम हो गई । पर अकेले वह क्या-क्या संभाले । विष्नू के भरोसे तो कुछ भी नहीं छोड़ सकती ।

तेरह साल हो गए विष्नू को घर पर बैठे । ‘लिंक चेन’ फैक्टरी में काम करता था । गृहस्थी जिंदा रह सके, इतनी रकम वह दस को पगार उठाकर और बीस को खर्ची निकाल थमा देता था । दारू तो पहले भी पीता था, पर गृहस्थी का खयाल ताक पर रखकर नहीं । बाद में लत घर फूंक तमाशा वाली हो गई । खाड़े पर खाड़ा होने लगा । ‘चार्ज शीट’ मिल गई । एक दिन घर में बैठ गया। कमला से बोला कि अब नौकरी नहीं, धंधा करेगा । बहुत कोशिश की कमला ने कि वह कहीं काम से लग जाए, मगर बात बनी नहीं । बाद में पता लगा कि नौकरी तो पहले भी नहीं करता था । शादी के लिए नौकरी लगवाई थी । संबंधियों में उसे कोई छोकरी देने के लिए तैयार नहीं था । बदनाम बहुत था । मटका खेलना, चोरी-चपाड़ी करना, यही धंधे थे विष्नू के ।

चार बच्चों की जिम्मेदारी वह चार घर के भांडी-कटके से नहीं पूरी कर पा रही थी । देह से ताकत ही निचुड़ गई थी । जब से नंदू नहीं रहा, चैन भटक गया था । सेठानियों से तकरीबन रोज ही तकरार होती कि बरतनों में जूठन लगा रह गया है, कि कपड़ों के कॉलर नहीं छूटते, कि अलमारियों के नीचे ढेरों कचरा छूट जाता है, कि मोरी में काई की परत गहरा रही है । तीस रुपए महीना फोकट के देते हैं!

तिमैया की अम्मा ने ऐसे में घर में ही भट्ठी लगा देने की बात सुझाई थी । बड़े अंतर्द्वंद्व में फंसी रही । दारू से ही घर की ईंटों में भसकन पैदा हुई थी । यही बतौर धंधा अपना ले? तिमैया की अम्मा ने उसकी हिचक सुनी तो खिल्ली उड़ाई । सब उसकी तरह ऊंच-नीच सोचने लगें तो दुनिया में कोई धंधा जिंदा ही नहीं बचेगा । खटिया चलाने के लिए तो कह नहीं रही । सोच ले । इज्जत से करो तो सभी काम ऊंचे हैं ।

सोच लिया और खोली में ही भट्ठी लगा ली ।

ओटले से हटते ही बत्ती जलाने का ध्यान हो आया । पिछली बातों के उमड़ते सिलसिले को दिमाग से झटका । पहले ‘गिराकों’ वाली खोली की बत्ती जलाई, फिर भीतर वाली खोली में उजाला किया । देखा, चटाई से खिसककर विष्नू लादी के ऊपर मुरदे की तरह अंधा पड़ा है । इस स्थिति में उसे पड़ा पा पारा चढ़ गया । हिकारत से थूक देने को मन किया । आदमी है मुरदार? पीना, पीना, सिर्फ पीना । घर को फूंक डाला । उसकी जिंदगी तबाह कर दी । उसकी की तो की, पर बच्चों का भी सत्यानास किया हरामखोर ने । वह पेट के लिए जुगाड़ करने को हाथ-पांव मारती रही और यह रत्नू को लेकर सत्तार की चाल में सुबह-शाम जुआ खेलता रहा । उसे पता तब लगा जब ताश खेल रहे मवालियों में किसी बात पर झगड़ा हो गया और उसी झगड़े में किसी ने भीग रही मसों वाले रत्नू के पेट में छुरा घोंप दिया ।

…गोविंदा! गोविंदा को किसी बात पर बुनकी में इतना पीटा, इतना पीटा कि शाम को जो वह पर से भागा, आज तक लौटकर नहीं आया । कितना खोजा उसे । सबने कहा कि अखबार में फोटो निकलवा दो । पर फोटो कहां था उसके पास! बाद में उसने सरना और सिद्धू के तीन-चार फोटो निकलवाकर रखवा लिए थे…

सिद्धू और सरना को तो हाथ भी नहीं लगाने देती । मार-पीट पर आमादा हो उठती है । आज तक नहीं समझ पाई कि कैसा बाप है । न मरे को याद करता है, न भागे को झींकता है । औलाद के लिए इतना पत्थर कलेजा! ‘पिच’ से थूक ही दिया औंधी देह पर । घृणा के उबाल पर संयम टूट गया । लात दी हुमककर कूल्हे पर । स्वर ऊंचा नहीं था, चीख भरा था, “उट्ठ भड़ुवे ।! उठ…गिराक आने का बकत है अऊर…”

विष्नू पर लात का कोई असर नहीं हुआ । चियाया पड़ा रहा ।

मुट्ठी में सिर के बाल दबोच लिए, कसकर झकझोरा तब कहीं जाकर वह कुनमुनाया । सूजी, सुर्ख आंखें खोलीं । गुर्राया-“मगज तो नई फिर गया तेरा? साआ… ली, बोलने कू देता तो खोपड़ी पर चढ़ती!”

“गिराक को कौन निबटाएगा, तेरा बाप! हेय? अजुन तलब गिलास-बिलास पन बिगर घोएला पड़ा है। पांऊ का पत्ता नईं । सिद्धू को नल पर भेजा…मैं इच करूं सब?”

“ये…जास्ती बड़बड़ नईं…गप्प बस ।” विष्नू ने घुड़का और उठकर खड़ा हो गया । जमुहाई भरते हुए शरीर को ऐंठन देकर तोड़ा, फिर मोरी पर जाकर, टंकी की टोंटी खोलकर चेहरा छपछपाने लगा ।

सिद्धू सिर पर दोनों डंडे उठाए बीच के दरवाजे पर पड़े छींट के चीकट परदे को एक ओर सरकाते हुए तनिक झुककर भीतर दाखिल हुआ । खुश हो गई । थाली में चावल चुनने के लिए निकाल लिया था । एक ओर सरकाकर लपकी । ‘हलु-हलु ।’ टंकी का ढक्कन आधा सरकाकर ऊपर वाला हंडा उलीचा । फिर दूसरा भी खाली किया । टोंटी टपकने लगी । ठीक से कसा उसको । पानी कितनी दिक्कत से मिलता है ।

सिद्धू खाली डंडे उठाकर उछालता हुआ वापस नल की ओर भागा । विष्नू ने अंगोछे से मुंह रगड़ा और जांघें खुजलाता हुआ परली खोली में चला गया ।

वह पाटा खींचकर स्टोव के करीब बैठ गई ।

फटाफट चावल धोकर चढ़ाया । सोचा, सालन भी लगे हाथों बनाकर रख दे । गिराक आने पर भले विष्नू उनसे निबटता रहे, पर उसका उनके बीच मौजूद होना बहुत जरूरी होता है । कई दफे विष्नू खुद भी उनके बीच गिलास लेकर बैठ जाता है । कई दफा अपने कुछ दोस्त बन गए । गिराकों को उधार भी पिला देता है। वह सामने रहती है तो थोड़ा दबा रहता है । नकचढ़ा तो इस हद तक है कि कब बात-बेबात पर गरमा-गरमी कर बैठे, डरती रहती है । इतना जरूर है, अपना रोब-दाब उसने कुछ इस तरह कायम कर रखा है कि लाख ‘गिराक’ टुन्न हो रहा हो, उसका कहा नहीं टालते । झींगा बहुत पसंद है सरना को; गोविंदा को भी बहुत पसंद था । जब कभी झींगा लाती थी, वह उसके साथ बैठकर साफ करवाने लगता था ।

पांच बजे के करीब ‘मच्छी मारकेट’ गई थी । कोलबी (सूखी मछली) तो पड़ी है घर पर; पर किसी को मन से नहीं भाती । सोचकर तो गई थी कि बहुत दिन हो गए हैं, सिपियां लाएगी; पर झींगा काफी बड़ी-बड़ी व ताजा दिख गईं । सरना का खयाल हो आया । हालांकि आजकल सरना दस-साढ़े दस बजे से पहले नहीं लौटती । ग्यारह भी बज जाता है । कभी-कभी न खाने के लिए पेट दर्द का बहाना भी बनने लगा है । कहां तो नौ-साढ़े नौ के दरमियान खोली पर पाटी उतारते न उतारते बोमा-बोम करने लगती कि भूख लगी है…

रुकमनी ताई ने ही उसे सबसे पहले खबर दी थी कि तेरी सरना का एक भइए के साथ गुपचुप चल रहा है । ‘टेशन’ रोड पर ठीक उसकी बगल में वह भी बटाटे-कांदे की ढेरी लगाता है ।

सुनकर आग लग गई । पर चुपचाप मामला गुटके रही । मौके की ताक में थी । या तो सरना को रंगे हाथों पकड़े या सरना खुद ही उससे आकर बताए । देर से आने के तो वह कई बहाने बना सकती है । बनाने लगी भी थी ।

अब चोटी नहीं, जुड़ा बनने लगा था । सेवंती की वेणी या मोगरे का गजरा हर रोज टंकने लगा । सुबह फेरी से लौटती तो गंजरे की दो लड़े पत्ते में बंधी होतीं । बड़े सलीके से उन्हें भीगे कपड़े के टुकड़े में लपेटकर टंकी के ढक्कन पर रख देती, ताकि शाम तक कलियां ताजा बनी रहें…

एक दिन खुद ही बोली थी, ‘मैं देर से आती तो तू घबड़ाती तो नई न?’

कमला चौकन्नी हुई-‘दस-ग्यारह बजे घर लौटने का टेम हैय?’ स्वर को भरसक संयमित रखा । सयानी लड़की से गरमा-गरमी करना ठीक नहीं । उसे तो जाने क्या हो गया है? तुरंत माथा फिर जाता है । फिर आजू-बाजू की छोकरियों के लच्छन देखते हुए सरना उसे कभी बेरास्ता नहीं लगी । यह भी अच्छी तरह जानती है कि लड़की उसकी है, खूब जिद्दी और मानिनी । बात निकलेगी तो झूठ नहीं बोलेगी ।

“ढेरी तो नौ बजेच उठने को लगती । पन…”

‘कल्पू पला टिंबी पाड़ा को जाता । उदर उसका खोली हैय । मैं पन साथ जाती । थोड़ा उसका खाना-पीना करती…पिच्छे वो मेरे को सोढ़ने को आता ।’

‘देवा, देवा !…’ उसकी त्योरियां चढ़ गईं ।

‘विष्नू को पता लगेगा तो मेरे को साबुत सोड़ेगा?’

बात काटी-‘ मंगता वो करने दे ।’

ढिठाई की भी हद होती है । इतनी हिम्मत?…नंदू से जब वह मिलती थी, न किसी को कानों-कान खबर होती, न पूछताछ होने पर सच्चाई ही उगलती । कनपटियों में आग चढ़ गई । दादागिरी तो देखो, लाज-बीज कुछ नई! तभी तो हरामखोर रात को खाना भी ढंग से नहीं खाती । दिखाने के लिए मुश्किल से एक चपाती निगलती है । उसकी भी गुंजाइश न हो तो खोली में घुसते ही पेट में दर्द उठने लगता है ।

‘हलकट!’ दांत किटकिटाते हुए बालों का जुड़ा दबोच लिया और दूसरा हाथ ‘तड़’, ‘तड़’ चलने लगा ।

“खोली पर जाती…क्या-क्या नई करती होएगी तू! हां…मूं काला किया न मेरा… बोत तन के चलती न मैं…मिट्टी किया न आबरू…खलास करके सोड़ेगी उस साआले भइए के बच्चे को… ”

विष्नू आ गया था बीच में । उसको बाहर कर दिया, ‘तू जा, तेरा मतलब नई ।’ अपने बाप की याद आ गई थी एकाएक ।

उसमें थी यह दृढ़ता? नंदू कितना पीछे पड़ा था । कहा करता-बस, तू हां बोल दे कमला, बाकी मामला मैं संभाल लूंगा । तेरे बाप की दादागिरी धरी रह जाएगी । बहुत फौजदारी की है अपने गांव-जवार में, पर उसकी हिम्मत नहीं पड़ी । न उसने कभी नंदू को बाप से मिलने ही दिया ।

पता नहीं कैसे बाप को भनक लग गई थी कि वह नंदू के तबेले पर जाती है, उसकी खोली पर मिलती है । एक रात शिब्बू दादा को उसने बाप के साथ बाटली खोलते देखा तो सनकी । शिब्बू दादा से एकाएक जोड़-गांठ! उसकी आशंका सही थी । कई बार उनकी बातचीत में नंदू का नाम आया । मामी भी आई थी । उसके साथ ही बैठकर पी रही थी । उसके मुंह से भी नंदू का नाम साफ सुना । अनिष्ट की आशंका से कलेजा कांप गया ।

बाप के लिए ही फूफी के मुंह से सुना था । आई को घासलेट डालकर जलाने की कोशिश की थी । उस दिन तो वह बच गई, मगर गुड़ी पाड़वा के दिन अपनी प्राणरक्षा न कर पाई । दरिया में डूब नहीं गई थी, डुबो दी गई थी…’तेरे बाप ने डुबोया था ।’

सुबह मामी के सामने ही बाप के कहे अनुसार कसम उठा ली कि आइंदा वह नंदू से नहीं मिलेगी । मिली भी नहीं । नंदू इधर-उधर उसके बारे में पूछताछ करता रहा। हफ्ते-भर के अंदर ही बाप ने मामी के भाई विष्नू से ब्याह दिया । विष्नू उम्र में उससे बारह साल बड़ा था । फूफी ने ही यह भी बताया कि यह रिश्ता मामी को खुश रखने और वश में करने के लिए तय किया गया था । बाप मामी के पीछे बरसों से है । उसे तसल्ली हुई तो इस बात की कि नंदू उसके बाप की गिद्ध-दृष्टि से सुरक्षित हो गया था । शादी के बाद वह फिर उससे मिलने लगी थी…किसी को पता नहीं कि सरना तो उसी की है…

एक दिन मुलुक से नंदू को बुलाने का तार आया । तुरंत लौटने का ढाढ़स देकर वह गांव चला गया । महीना-भर भी नहीं बीता था कि रामसेवक, जो नंदू का चचेरा भाई था रिश्ते में, ने खबर दी कि नंदू का सिर फट गया है । जमीन को लेकर पटियइतों से फौजदारी हो गई थी । जिला अस्पताल में दाखिल है। मन बौरा उठा । विष्नू ने वैसे ही तंग कर रखा था । नौकरी छोड़ दी थी । नंदू से मन को बड़ा सहारा मिलता था । झेलने की ताकत पैदा हो जाती । वह भी…

रामसेवक ने यह भी बताया कि चिट्ठी आई है । बचने की उम्मीद कम है । कोई तबेले की जिम्मेदारी उठाने वाला मिल गया तो आजकल में वह भी गांव रवाना हो जाएगा ।

वह कभी मंदिर नहीं जाती थी, मारुति के मंदिर पर जाकर तेल चढ़ाने लगी । एक मंगलवार की सुबह प्रभा देवी-सिद्धि-विनायक के मंदिर भी हो आई । विष्नू ने ताना भी दिया कि एकाएक वह पुजारिन कैसे बन गई! इतना पूजा-पाठ सूझने लगा! हफ्ता- भर भी पूरा नहीं हुआ, तार आ गया…नंदू नहीं रहा…

रामसेवक गांव जाने लगा तो उसका मन हुआ कि वह भी साथ हो ले सब छोड़-छाड़कर ।

तबेला अधिक दिनों तक किसी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता था । धंधा चौपट हो जाने का भय था । कहे अनुसार रामसेवक ठीक बीसवें दिन ही लौट आया । खोली पर मिलने गई, नंदू के आखिरी समय का हाल सुनने की कातरता समेटे, तो पाया, नाक तक घूंघट खींचे तीन बच्चों समेत एक औरत भी खोली में मौजूद है ।’ मेहरारू है नंदू भैया की । ये तीनों उनके लड़िका हैं । हवा-पानी बदल जाई, यहि खयाल से भौजी का मुंबई लइ आया । लोग तो आने नहीं दे रहे थे… हुआ तो हाल-बेहाल हुई जा रही थीं…कुआं म कहि पड़ि रही थीं।’

औरत ने न उसकी तरफ देखा, न उससे बोली । बच्चे सहमे-से खटिया पर दुबके रहे । जैसे ही रामसेवक ने नंदू के आखिरी समय का बयान करना शुरू किया, औरत आलाप भर-भरकर रोने लगी…

दिल दहल उठा । लगा कि अधिक देर तक अगर उस खोली में बैठी रही तो दम घुट जाएगा । उसी खोली में…जहां उसे राहत की सांसें नसीब हुई थीं । ‘आऊंगी ।’ कहकर उठ गई थी ।

…कितना फरेबी था नंदू। उसकी कसम खा-खाकर कहता, तू मिली है तो घर-गृहस्थी करने का जी करता है । तू ‘हां’ भर कर दे । फिर देखना कमला, तेरे को मुलुक भी ले जाऊंगा…गंगा मैया में गांठ जोड़कर स्नान करेंगे हम…घर देखेगी तो डर जाएगी, ‘वो लाइंस क्लब’ वाला बगीचा है न… अरे, उतना बड़ा तो आंगन है घर का… और सुन, इदर का माफक मुंह खोल के नई चलेगा । घूंघट निकालकर रहना पड़ेगा…चोली भी नहीं चलेगी, जफर पहनना पड़ेगा…चोली जैसी तो हमारे यहां मेहरारू वॉडी पहनती हैं… “पानी बस क्या?” सिद्धू पूछ रहा था ।

चौंक गई । वह हंडे भर-भरकर कब आया, खाली करके कब गया, कैसे गया, सोच में उलझे हुए उसे पता ही नहीं चला ।

“मटका भरा कि नईं?”

“हऊ।”

“हऊ”

“ठीक ।”

“क्या हुआ तेरे को?” सिद्धू उसके भीगे चेहरे और रुधे गले पर विस्मित हुआ ।

“कुछ नईं!… आंख आता दिखता ।”

गले पर आंसुओं के धब्बे चिपचिपा रहे थे । चोली का ऊपरी हिस्सा तर हो गया था । पाटा नीचे खिसकाकर उठी, मोरी पर जाकर रगड़-रगड़कर मुंह-हाथ धोया । बड़ी राहत मिली । पल्ले से चेहरा पोंछते हुए अचानक खयाल आया, पानी भरते समय सिद्धू ने उससे खाना मांगा था और उसने उसे डपटा था, ‘सबुर कर ।’ तब शायद सालन उतारकर गिराकों के लिए भीगे हुए चने उबाल रही थी । विष्नू जल्दी मचा रहा था । सिद्धू के लिए एकाएक मन पछतावे से भर आया । बिला वजह वह उसे डांटती-डपटती रहती है । सारे बच्चों में सबसे अधिक उपेक्षित रहा है सिद्धू । सबके बड़े लाड़ लड़ियाए थे उसने । सिद्धू तक आते-आते हर तरफ से टूट-टाटकर चूर हो गई थी ।

थाली उठाकर आंचल से थाली को पोंछते हुए पूछा, “खाना देऊं?”

सहमे-से बैठे सिद्धू के चेहरे पर आब आ गई-“दे न! बोत भूख लगा। भात मेच सालन डाल के दे दे । झींगा किया ना?”

उसने परोसा तो वह और बेसब्र हो आया, “जरा ठंडा करके दे न ।”

भाप छोड़ रहे भात पर वह ढक्कन से हवा करने लगी । सिद्धू की हवस कहीं तुष्ट कर गई । ऐसी ही हड़बड़ी गोविंदा भी तो मचाया करता था…

कल्पू मिलने आया! समझ गई, कल्पू की इस पहल के पीछे दुस्साहस किसका है । कल्पू की हिम्मत का अंदाजा उसे नहीं है, किंतु सरना के दबंगपन से बखूबी परिचित है । यह भी अनुमान लगाया कि हो न हो, यह मिलने-मिलाने की योजना के पीछे उस दिन की मारपीट खास कारण हो । जो भी हो, कल्पू सरना को घर तक पहुंचाने आया तो वह उसे दरवाजे तक ले आई-“कल्पू तेरे से बात करने कू बोलता ।”

उसने कोई जवाब नहीं दिया । न दरवाजे पर खड़े कल्पू को भीतर आने के लिए ही कहा । सरना ने ही लादी पर शतरंजी बिछा दी और कल्पू से बैठने का आग्रह किया । कनखियों से उसने कल्पू को देखा-भर । लड़का सरना के मुकाबले कम नहीं लगा । किसी तरह की गरमा-गरमी भी उस वक्त नहीं चाहती थी । विष्नू ‘गिराकों’ के बीच गिलास भरे बैठा था ।

कल्पू ने बिना किसी भूमिका के अपनी बात रखी, “सेठानी! हम सरना के संग बियाव करना चाहते हैं ।”

“बियाव करना है!” उसने कल्पू के शब्दों को कटाक्षपूर्ण ढंग से उमेठा । फिर तड़पकर मुंह चिढ़ाती हुई बोली, “जात नई, बिरादरी नई । हम घाटी, तुम भैया… रिजाल-रीत अलहदा, कैइसा शादी बनाने को देगी?…सरना अब्बी बोत सोटी है । अऊर… “कहते-कहते एकाएक उसका गला भर्राया- “भैया लोगों पर अपना तो ईस्वास नहीं… एक जोरू मुलुक में रखते, एक औरत इदर फंसाते । तू सरना का चक्कर सोड़ दे… होने का नई ।”

कल्पू ने प्रतिवाद करने की कोशिश की । पर उसने उसे बोलने का मौका नहीं दिया, “तेरा ईरादा पूरा नई पड़ने का । होशियारी पन नई दिखाना, नई तो हड्डी-विड्डी साबुत नई मिलेगी । समझा! बाप इसका बात पिच्छे करता, छुरा पेले निकालता ।”

“आखिन किरिया, सेठानी!” धमकी के बावजूद कल्पू ने अपनी बात को वजन देने का प्रयास किया, “झूठ नहीं बोलेंगे । सरना हमारी पहली जोरू होवेगी । बोलो तो पट्टा लिख दे…फिन तकलीफ जो उसे हम दें तो जो चाहो सो कर लेना ।…”

बाद में कोई क्या कर लेता है? उसने एक न सुनी । अड़ी रही । यह संबंध किसी तरह नहीं हो सकता ।

कल्पू के जाते ही सरना की चुप्पी ढही ।

“मैं भौंडी-कटका नईं करेगी…तेरे सरखा भट्ठी नई सुलगाएगी…तेरे सरखा नौरा (दूल्हा) नई मंगता । मेरे को…”

आग लग गई । इस आखिरी जुमले ने छलनी कर दिया । झपटकर उसे लादी पर गिरा दिया । हाथ में जो भी आया, दनादन पटकने लगी उस पर । अपने पर जैसे काबू ही नहीं रहा । बुरी तरह थरथरा रही थी । मुंह से फेचकुर बजबजाने लगा-

“हरामखोर, कुत्ती!…मेरे कोच बोल मारती कि तेरे सरखा नीरा नई मंगता! आई कोच? आंख का पानी मर गया न हलकट? उस भैए के पिच्छे…!”

“हां-हां, बोलेगी…उस भैए के पिच ही बोलेगी…जितना मंगता उतना मार, पन मेरे को घर में बैइठने का…औरत सरखा घर में रैने का… भैया लोगों में औरत को घर पे रखते, धंधा-पानी नई करवाते…उसका कमाई नई खाते… ।”

हाथ निर्जीव हो झूल गए। कितना मारे? मार-पीटकर सरना के भीतर दुबकी बैठी घर की कल्पना को ध्वस्त कर सकती है? सरना उसकी बेटी जरूर है, मगर ‘वह’ नहीं है ।

चीख-चिल्लाहट सुनकर कई गिराकों समेत विष्नू भीतर आ गया । उसका रौद्र रूप देखा तो ताव खा गया-“छोकरी को अब तूने हाथ लगाया तो देख…अभी इदरीच खलास करेगा ।” हलकट पीकर टुन्न होता है तो एकाएक बाप बन जाता है । वरना मरते-सड़ते पड़े रहें, उसकी बला से ।

फफक रही औंधी पड़ी सरना के सिर पर विष्नू ने हाथ रखा तो वह तड़पकर दहाड़ी “हाथ नई लगाना मेरे को! काम कर जाके अपना ।”

पिछली सुबह उसके और सरना के बीच कोई बातचीत नहीं हुई । बहुत मारा था उसने रात में । सरना तो रोते-रोते थककर सो गई, पर उसे आधी रात तक नींद नहीं आई । कलपती रही कि इतनी कुटाई के बाद लड़की उठ पाएगी? इस कदर खूंखार उसे नहीं हो जाना चाहिए । इस तरह के बरताव से तो बात बिगड़ेगी ही । मान लो, लड़की अपने और कल्पू के बारे में कुछ भी न कबूलती तो? मान लो, बिना बताए ही भाग जाती तो? क्या कर लेती वह?

रोज की तरह उसने चाय बनाई और साड़ी लपेट रही सरना के करीब पाटा सरकाकर कप बसी में रख दी । सरना ने चाय की तरफ देखा जरूर, पर हाथ नहीं लगाया । आहिस्ता से पाटी सिर पर रख खोली से बाहर हो गई । झगड़ा-झांटी के कुछ ही घंटों के बाद वह सब भूल- भालकर सहज हो जाती है, सरना यह अच्छी तरह जानती है; किंतु सरना को सामान्य होने में दिन लग जाते हैं । कई दिनों तक मुंह फुलाए रहती है ।

दोपहर में भी वही हुआ । फेरी पर से लौटी तो खाना लगा दिया । भट्ठी के पास बैठे हुए तिरछी दृष्टि से देखा तो पाया, थाली ज्यों की त्यों लगी पड़ी है । लादी पर बिना शतरंजी बिछाए लेटी सरना सोने का बहाना कर रही है । बोले बिना रहा न गया-“अन्न पे गुस्सा काय को निकालने का?”

मगर सरना निश्चल पड़ी रही । न आंखें खोलीं, न उसकी ओर देखा, न जवाब ही दिया । इतनी जिद? अपमान से मन रुआंसा हो आया । इन्हीं के लिए तो खटती-मरती है । पैदा होते ही तो नहीं कमाने लगी थी ।

रात ग्यारह के करीब लौटी थी । कल्पू जरूर छोड़ने आया होगा । मन में आया कि सारे झगड़े की जड़ तो यह कल्पू ही है । क्यों न उसे दरवाजे से बाहर धर दबोचे । इतनी कुटम्मस करे, इतनी कि सरना तिलमिलाकर बोमा-बोम कर दे । उसकी चुप्पी तो टूटे । सह नहीं पा रही थी उसकी ऐंठन । लेकिन…बस इतना किया, न खाने को पूछा, न खाना ही लगाया । अंदाजा था, नाटक कर रही है। कल्पू की खोली पर जरूर खाया-पिया होगा । उसे दिखाने को ऐंठ दिखा रही है…

लेकिन आज दोपहर से ही जी उसे धिक्कार रहा है । जिद्दी तो है । मान लो, कल्पू की खोली पर भी न खाया हो तो? आज तीसरा दिन है झगड़ा हुए । चेहरा कैसा निचुडा-निचुड़ा हो रहा है । चाय ढकोसती होगी कप पर कप ।

विष्नू ने आकर प्याज और नमक मांगा । उसके उड़े हुए चेहरे को देखकर टोका, “तबीयत बरोबर नई तेरी?”

बसी में प्याज के टुकड़े और नमक रखते हुए संजीदा स्वर में इतना-भर कहा, “सिर दर्द भौत है ।’

“गोली मंगा के दूं?”

“बाम है ।”

विष्नू चला गया । वह उद्विग्न मन से सरना के लौटने की प्रतीक्षा करने लगी । एकाध चक्कर गिराकों की खोली का भी मार आई; पर बैठ नहीं पाई । कई लोगों ने उसकी अनमनाहट ताड़ी । कारण जानना चाहा तो उसने सिर के दर्द का ही सहारा लिया । कुछ नहीं सूझा तो बाम की शीशी लिए माथा मलने बैठ गई । अपनी उंगलियों की सहलाहट से काफी राहत महसूस कर रही थी कि तभी कुंडी खड़की । दरवाजा खोला । देखा, सरना के आठ-दस हाथ पीछे कल्पू खड़ा हुआ है । शायद इसी प्रतीक्षा में कि दरवाजा खुले, सरना भीतर हो तो वह मुड़ ले ।

सहसा दरवाजे को दोनों हाथों से घेरकर उसने सरना को आदेश दिया, “अंदर बुला उसको ।”

सरना ने ढिठाई से सीधा उसकी आंखों में ताका । पूछा, “काय के वास्ते?” स्वर की ऐंठन से लगा कि जैसे यह न पूछ रही हो कि किसलिए बुलाऊं, चेतावनी दे रही हो कि अगर कल्पू के साथ कोई बदतमीजी की तो देख लूंगी ।

“जरूरी बात करने का ।”

सरना ने निर्भीकता से कल्पू को अंदर आ जाने के लिए पुकारा । कमला दरवाजे से हट गई । उसने पाटी उतारकर सिर पर गुंडरी बनाकर रखा हुआ अंगोछा फटककर कपड़े से लदी रस्सी पर उछाल दिया । देख लिया था कि कल्पू के अंदर दाखिल होते ही आई ने फुरती से दरवाजे की सिटकनी चढ़ा दी है । बीच वाला दरवाजा भी भेड़ दिया । माथा ठनका । दाल में कुछ काला है । बीच वाला दरवाजा भेड़ते हुए सिद्धू से कहते हुए भी सुना, “कुछ मंगता होएगा तो विष्नू को बोलना जरा ठेरना…” सरना सतर्क हो गई । कल्पू के चेहरे पर ढेर-सा असमंजस पसर गया । सारा माहौल अनबूझ-सा हो रहा था ।

“भोत फिरता ना तू इसके साथ?”

जवाब सरना ने दिया, “मैं फिरती इसके साथ । इसको कुछ मत बोल ।”

“तेरे से पूछा?”

“नई ।”

“तो उसको जबान नई?”

सरना कल्पू की ओर देखने लगी ।

“तेरे को शादी बनाने का सरना के साथ?”

“मैं तो आपसे कब का कहा था ।” कहते हुए कनखियों से कल्पू ने सरना को देखा ।

​अचानक कल्पू की कमीज को उसने सीने से दबोच लिया । पूरी ताकत से उसे झकझोरती हुई चीखी, “कब से क्या मतलब? बनाना है तो जल्दी बना । ठेरा काय को? हां, पेइसा नई होएगा तो मेरे से ले; पर जल्दी कर शादी…देर नई मंगता… भरोसा नई तेरा…कभी मुलुक को चला गया तो? वापस नई आएगा तू… भैया लोगों का एतबार नई 

मेरे को ।…”

पंजा ढीला पड़ा । कमीज छूट गई । जमीन पर पसरकर घुटनों में मुंह छिपा लिया और फफक-फफककर हिचकियां तोड़ने लगी । कल्पू हतप्रभ रह गया । सरना की आंखों में अभी भी अविश्वास के डोरे तने हुए थे । पिएली तो नहीं है, फिर?

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