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कथा

आज बैठे-बैठे यूं ही खो सी गई थी मैं, मां की बातें याद आ रही थी, मां सिर से जुएं बीनते जाती, मैं सिर हिलाती और मां डांटती फिर मेरी शरारतों को और मुझे मेरी ही जिन्दगी का हर पल आइने की तरह साफ दिखाती जाती। टन-टन-टन थाली बजी थी, हां जब मैं पैदा हुई थी, बाबूजी ने भी थाली की टनटनाहट में खुशी जाहिर की थी, पर मुझे ऐसा लगता था। मां की बातों से कि शायद बाबूजी थाली की टनटनाहट में नाच नहीं पाए थे मां तो बस खुशी से सुबक कर रह गई थी। बाबू जी ने मेरा नाम सीमा रखा था।

मैंने आंगन में पहले हाथ पैरों से घिसटना चालू किया था और बाबूजी अपनी अंगुली का सहारा देते और मैं मासूम-सी, सहसा उस अंगुली को पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ा देती, तो बाबूजी अपनी अंगुली थोड़ा ऊपर उठा लेते और मैं दोनों पैरों में संभलते-संभलते गिर पड़ती। फिर बाबूजी दोहराते में भी बार-बार गिरती उठती, शायद यही प्रेरणा बाबूजी की मुझे हारने न देती कभी, परेशान होती हूं तो मां का बताया बचपना का पूरा फिल्माकंन कर लेती हूं।

मुझे आंगन में चलते देखती मां तो बहुत खुश होती, साल बीतते गए।
माँ जुएं मारती रहती सिर के और, कभी फुरसत में लम्हों में मां से पूरी बातें सुनती अपने बचपन की।

मैं स्कूल जाने लगी थी। मां मुझे तैयार करती। शुरू में मां और बाबूजी पास ही स्कूल तक छोड़ने जाया करते । फिर वहीं मुझे बाबूजी की अंगुली के बिना स्कूल जाना पड़ता और फिर उस दिन तो मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा, जब मैं पांचवी कक्षा में प्रथम श्रेणी में पास हुई थी। बाबूजी और मां ने तो सर आंखों पर बिठा लिया था मुझे अभी भी स्मृति में धुंधलाहट के साथ वो बाबूजी का खुशी भरा चेहरा याद आ जाता है। प्यार से सर में हाथ रखना और मां की गोद में मेरा सिर छिपाकर दुबक जाना।

समय बीता और मैं कुछ सालों में सोलह साल के नाजुक से मोड़ में पहुंच गई थी। आवाज में सुरीलापन आ गया था और चेहरे पर निखार, रंग साफ हो गया था और मन पतंग होकर उड़ने लगा था, कुछ मुहांसे भी चेहरे पर आने लगे थे, वो सारे बदलाव ले चुकी थी, मैं जो यौवन अवस्था में होते थे। 12वीं क्लास में पहुंच गई थी और यहीं से मुझे अहसास होने लगा था कि मैं लड़की हूं क्योंकि मैंने देखा था, घर से जब स्कूल के लिये निकलती तो बाबूजी का मशवरा होता, बिटिया सीधी रास्ता जइयो और सीधी अइयो, आजकाल जमाना ठीक नईया, मुझे नारीत्व का पूरा-पूरा जीवन समझने में कोई तकलीफ नहीं हो रही थी, मुझे अपना दुपट्टा बहुत संभालना पड़ता था नहीं तो टोक देती, नहीं तो बाजू वाली काकी नहीं तो आस पड़ोस की काकियां-चाचियां इन्हीं सब से भरा पड़ा था पूरा माहौल और मैं मां की बचपन की सीखें याद करती तो मुझे लड़की में समानता नहीं दिखाई पड़ती और बाबू जी हमेशा यही कहते कि मेरा तो जई लड़का है, पर मुझे महसूस होता कि हम कहां समान हैं, लड़कों की आवाज में भारीपन है, उनकी निगाहें हमारी ऊपर टिकी है क्यों? क्या हम अलग हैं या फिर दूसरे लोगों में से हैं।

मैंने देखा था, जब कॉलेज जाने की शुरूआत हुई और मैं जब कॉलेज पहले दिन डरी सहमी सी पहुंची थी, रैगिंग का डर, और फिर सब धीरे-धीरे सामान्य सा हो गया। बहुत सी सहेलियों का साथ, बहुत अच्छे थे वे दिन हां इन दिनों में एक हादसा भी हो गया था। मेरे दिल की धड़कन बढ़ सी गई थी, जब एक लड़का जो हमारी क्लास से एक क्लास ऊपर था मेरे मन को छू गया, बहुत शांत और सुन्दर था, वह कुछ ना पाई और ऐसे ही सोचते -सोचते और मन में उत्पन्न प्रेम को समेटते-समेटते दो तीन साल गुजर गए, एक साल तो सेकेण्ड ईयर में मैं फेल भी हो गई थी और एक दिन मैंने बहुत सोच विचार कर बहुत हिम्मत बांधकर उसे कुछ लिखना चाहा था, आज भी वह दिन याद करके दिल सहम जाता है।

मैं अपनी कापी लेकर बैठी थी और उसके बारे में ही लिख रही थी कि मां ने आवाज लगाई थी। और कहा था बिटिया जरा चूल्हा तो देख ले, मैं कापी वहीं रखकर चूल्हे की लकड़ियां फूंकने लगी थी, धुआं उठता जा रहा था, लकड़ी थोड़ी गीली थी।

बाबूजी कुर्ता डालते हुए वहीं आ बैठे थे और मेरी कापी उठाकर मां को आवाज दी थी कि बताओ क्या किराना में लाना है, लिस्ट बना लूं और कापी खोलते ही बाबूजी ने कापी में छुपा मेरा मन पढ़ लिया था और लकड़ी के साथ धुंआ भी तेज हो गया था। वहीं से तो मेरी पढ़ाई का अंतिम वर्ष खत्म हो गया था।

सीमा की सीमा प्रारंभ हो गई थी। मुझे घर में ही रहना पड़ता था और सारे कॉलेज की स्मृतियों को भुलाने की कोशिश करना पड़ता था। बाबूजी की चिंता…मेरी शादी…ये सब मुझे घर में ही रहना पड़ता था और सारे कॉलेज की स्मृतियों को भुलाने की कोशिश करना पड़ता था। 

बाबूजी की चिंता…मेरी शादी….ये सब मुझे लड़की होने की सजा सी लगती, फिर वो दिन आ गया जब मेरी शादी बाबूजी ने एक सरकारी नौकरी वाले अच्छे लड़के से तय कर दी, अच्छा खानदान था बाबूजी गुण गाते। मां और बेटा बस, बिटिया राज करेगी। मुझे याद है जब ये मुझे देखने आए थे, मैं शरमाई और झुझंलाई सी सामने आई थी।

फिर वह दिन भी आ गया, जिसका मुझे इंतजार कॉलेज के जमाने में था। शहनाई, मेंहदी, सहेलियां, अतिशबाजी, सब कुछ था पर घोड़े के उपर बैठा हुआ दूल्हा बस बदला था। मैंने मन को काबू में किया था। और पहली बार जब मैंने ससुराल में कदम रखा था, सब अजनबी सा फिर पहली रात इनका मर्मस्पर्श और सभी कुछ जो इस रिवाज और समाज में नारी के लिए बना है।

मैं एडजेस्ट हो सी रही थी और फिर सब कुछ धीरे-धीरे संभाल लिया था, अब तो गुजारा वक्त सपना सा लगता है। मेरी सासूजी बहुत अच्छी है हमेशा मुझसे यही कहती, बेटी तू ही तो है मेरी प्यारी बिटिया, तू मेरे सामने रहा कर, तुझमें और मेरी बिटिया में कोई फर्क थोड़ी है।

मेरी ननद जो बीते वर्ष गुजर गई थी, सो भांजी हमेशा मुझे ही उसकी अनुकृति दे देती और मैं वह जाती ममता के बहाव में, मुझे लगता कि हां मैं खुशनसीब हूं, जो ऐसे परिवार, खानदान और ससुराल पाया है।

इनका स्वभाव भी निर्मल था शांत थे और मुझे प्रेम भी बहुत करते थे और मैं हमेशा इनके लिए अधिक समय निकालती थी।

हमने शादी के बाद कभी एक दूसरे के बिना खाना न खाया था। सब कुछ साथ-साथ और मैं सोचती थी कभी कि मैं कितनी बदल सी ई पहले बचपन, क्या नाक बहती, फ्राक के पीछे के हुक टूटे और उछलती कुदती लड़कों के साथ कंचे बंटे खेलना वो गुल्ली डंडा का खेल, तितली पकड़ना और लूका छिपी।

फिर चुनरी का जब साथ मिला तो खुद को संभालना कभी दौड़ते-दौड़ते मां के पास आकर झूम जाना और सारी मर्यादा हां चुनरी को कहती थी, अस्त व्यस्त कर देना, मां डांटती और मैं लड़के से लड़की की वास्तविकता में आ जाती। बार-बार लड़कों के तरह रहने की इच्छा, वो अल्हड़पन अस्सू और अन्नू के साथ खेलना कभी-कभी तो बाबूजी को लुंगी ओर कुर्ता पहनकर शाम को बाबूजी की तरह हाथ पीछे करके टहलना, याद आता पर फिर ये सब खत्म होता गया और मैं उम्र की सीढ़ी चढ़ती गई।

आज याद आता है बाबूजी की शेर छाप बीड़ी मार कर चुपके-चुपके धकाधक धूकना और ठसके लगना, ये सब ना जाने कैसे और कब मुझसे दूर हो गया समझ नहीं आता, वक्त कितनी जल्दी कट जाता है।

मैंने देखा था नारी के जीवन चरणों को, कभी एक सा नहीं था और न ही यह एक सा होता है, हर साल उम्र के साथ बदलते जाता है। और वो वक्त सिर्फ सपना सा होता है, मैं एहसास करती थी कि यह सब सही कहते हैं कि गुजरा वक्त लौट कर नहीं आता मुझे यकीन हो गया था। नारी जीवन का तो कभी नहीं।

मैंने कॉलेज के दिनों में कविताएं लिखना भी चालू किया था और वह सब भी कॉलेज की जिंदगी के साथ आज पीछे छूट गया था, अब तो घर के काम निबटाने के बाद इतना समय ही नहीं बचता कि कविता कहानी लिख लूं, फिर उनका औचित्य भी अब न समझ आता, बस यादों में सोचना, खो जाना ही भाता। और मैं खोते जाती…खोते जाती, रसोई में सुबह से चाय नाश्ता खाना फिर समेटना।

कभी-कभी दूध में उबाल आ जाना और मेरा पास खड़े-खड़े पिछले सालों की सैर में जाना मुझे डांट भी पड़वा देता, इनसे। बहुत लापरवाही हो गई कहीं जल गई या कुछ हो गया, तुम्हें तो, चूल्हे के पास लापरवाही मत रखा करो। और मेरा अपनेमन की अनुभूतियों के साथ मुस्काना।

हमारी एक लड़की भी हुई थी और मैंने उसके पैदा होने के पहले ही इनसे कहा था। कि चाहे लड़का हो या लड़की तुम थालियों की टनटनाहट में नाचना जरूर और ये नीचे भी थे, गुड़िया के पैदा होते ही मेरी तो आंखे नम हो गई थी। खुशी से आज एक ओर अध्याय पढ़ लिया था मैंने नारी जीवन का मातृत्व का।

गुड़िया के होते ही भांजी के शब्दों को अपने मन और मस्तिष्क से विचारा तो पाया मुझे खुशी बराबर थी और मां शायद खुद निराश हुई थी, अन्दर से। और मैंने जो सोचा था कि उसे इन सीमाओं से थोड़ा परे रखूंगी, थोड़ा सा मन डगमगा सा गया था।

क्या सोच रखा है मैंने गुड़िया के बारे में कि उसे उन्मुकतता से जीना सिखाऊंगी, उसे बांधूगी नहीं, कभी। लड़कों की तरह तो नहीं पर लड़कों से अलग ही बनाऊंगी, क्योंकि मैंने इस समाज को देखा था, सोचा था और समझा भी था, जहां पर कभी लड़के-लडकियां समान नहीं हो सकते थे, क्योंकि फर्क यही था, कि लड़की का जीवन पहले चुनरी, फिर घूंघट आंचल।

पर लड़कों में क्या वही रोबदार सीना और होठों के ऊपर मूंछे, मर्दों की शान, फिर हम कहां भौतिक रूप से समान हो पास थे, उनकी आवाज में भारीपन और हमारी आवाज का सुरीला होना सब कुछ अलग।

और भी अलग था सिर के ऊपर जहां लड़की को मर्यादा रखना पड़ता, वहीं सिर पर दो तीन गुंडी या मटके रखकर पानी भरना, कभी नहीं देखा मैंने, लड़कों को ऐसे, वही सब कुछ सहन कर लेना, सहनशीलता और लड़कों में उत्तेजना।

हमेशा पहले पति का नाम फिर पत्नी, मैं समझ गई कि यहां समानता नहीं है, नहीं हो सकती ना काम में ना हालात में और ना भौतिकता में…..

लड़कों के कांधों को देखा था मजबूत होते और उनका लोगों से जिक्र, लेकिन हमेशा सिर की किसी को परवाह नहीं थी, मैं तो भली ही थी औरों से जिन्हें अपनी आंखों के सामने एक पतला परदा सा रखना होता है घूंघट का पर्दा भी ऐसा कि ढक गया, हमारे समाज की मर्यादा, परिवार की लाज और आन के कितने सीमित दायरे में कैद हैं नारी अलग सबसे अलग।

मैंने सोचा था गुड़िया को इन सबसे अलग, लड़की से भी बनाने की, पर मुझे लग रहा था क्या मैं ये सब कर पाउंगी। भांजी ने मुझसे कहा था कि अब लड़की हो गई है चिंता होनी चाहिये, बहू पैसा जोड़ना पड़ेगा बहुत।

खैर पढ़ाई तो हो जाएगी पर बेटी ब्याह तो पैसों के बिना नहीं सकता और मैं भांजी की बातों को सुनकर डर सी गई थी, और इस कटु सत्य को भी स्वीकार कर लिया था कि सोचना भी इन्हीं दायरों में कैद है हमारे लिये, मैंने खुद को कम ही सीमा में बंधे पाया था बस दरवाजे पर खड़ी ना हो सकती थी मां के यहां भी और भांजी के यहां भी अकेले जाना न होता था कहीं और नौकरी की मुझे जरूरत ही नहीं लगती थी सबको, पर उन लड़कियों को न बचा सकी थी संकुचित थी दायरों में।

दायरों के लिए एक जीवन होता है नारी का, मैंने मान लिया था। भांजी ने मुझे आज ही कहा था बेटी जरा अपने सिर को अच्छे से ढका कर पूरा  मस्तक दिखाई देता है, बहुत दिन से कहना चाह रही थी पर कह ना पाई कहीं तू कुछ और समझे…

और मैंने अपने सिर को आज अपनी सीमा से ज्यादा ढक लिया था घूंघट बढ़ा लिया था शायद भांजी की सीमा तक बिल्कुल आंखों के सामने तक आज मुझे लग रहा था कि मैं बेटी न बन सकी भांजी की बहू ही रही क्योंकि उन्होंने मुझे बेटी माना है पर शायद स्वीकार नहीं कर पाई तो मुझे मां के सामने घूघंट की जरूरत थी क्या?

मैं आज दायरे में कैद हो गई थी, फिर सीमा की सीमा ही होती थी सो हो ही गई मैंने मान लिया था कि आज भी इस समाज में लड़कियां सीमा ही बन सकती हैं ज्यादा से ज्यादा बस।

सीमा , बस……सीमा मेरे जैसी।