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तब मैं छह-सात साल का था। मेरी दादी प्यार से मुझे अपने पास बिठाती, खाना खिलाती। कभी-कभी मुझे कहतीं, ‘देख तेरी दुल्हनिया आएगी तो मैं उसे अपने कड़े दे दूंगी, अपनी सोने की माला दे दूंगी।’ मैं सुनता और खुश होता, फिर पूछता कि वह जो भी मांगेगी आप दे दोगी। दादी भी कहती हां-हां, वह मांगे तो मैं कुछ भी दे दूंगी। एक बार मेरे घर मेरे स्कूल के दोस्त आए। उनमें एक लड़की भी थी, जो मुझे बहुत अच्छी लगती थी। उसे मैं दादी के पास ले गया और बोला, ‘दादी, इसे अपने कड़े, अपनी सोने की चेन दे दो। यही है मेरी दुल्हनिया।’ यह सुन वह लड़की बेचारी रोने लगी और घर के बाकी लोग हंसने लगे। आज भी इतने साल बाद मैं यह बात याद करके हंस लेता हूं।

यही है मेरी दुल्हनिया 3

टूटा दिल जोड़ना है
बात तब की है, जब मैं छोटी बच्ची थी। बचपन की पढ़ाई के दौरान किसी विषय में परीक्षा में मेरे काफी कम मार्क्स आए थे। मुझे तब इतनी समझ नहीं थी कि नंबर ज्यादा या कम आने से क्या होता है।
मेरी मम्मी मुझे बहुत प्यार करती थी। उन्होंने जब मेेरे नंबर कम देखे तो उन्हें बहुत दु:ख हुआ। इसी वेदना के चलते उनके मुंह से निकला, ‘दीपू, तूने तो मेरा दिल ही तोड़ दिया।’
मां की बात ने मेरे दिल पर गहरा असर डाला तो मैंने अपनी गुल्लक तोड़कर उसमें जमा किए सिक्के निकाले। उन पैसों को पापा को देते हुए बोली, ‘पापा इन पैसों से आप फेविकोल लेकर आना। मम्मी के टूटे दिल को जोड़ना है।’
तोतली भाषा में कही मेरी बात सुन जहां पापा हंसने लगे, वहीं पास खड़ी मेरी मम्मी भी मंद-मंद मुस्काने लगी और मुझे गोद में भींच लिया।
बचपन अनूठा होता है बिल्कुल भोला और निश्छल।

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