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चाबी

 

प्रेम-प्याला – दरवाज़े के तीन-चार बार खटखटाने पर भी जब कोई बाहर नहीं आया तो वह अंदर आ गई। वह हर रोज सुबह-शाम राज बाबू का खाना बनाने आती थी। तीन साल पहले उनकी पत्नी बहू की जचगी के लिए अमेरिका गई थी तो वापिस लौट कर नहीं आई और सुनने में तो यहां तक आ रहा था कि वो कभी वापिस नहीं आएगी। मुहल्ले वाले जानते थे कि राज बाबू और उनकी पत्नी में बनती नहीं थी। राज बाबू बहुत ही शांत और मितभाषी थे और बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। किसी से भी फालतू बात करना उनकी आदत में शुमार नहीं था लेकिन कुछ न बोलने पर भी हावभावों से बहुत कुछ प्रगट हो जाता है। कमला ने आकर अपना काम शुरू कर दिया था लेकिन साहब को देख कर उसकी हैरानी की सीमा नहीं थी क्योंकि सदा धीमी आवाज में बात करने वाला और पुराने दर्द भरे गाने सुनने वाला आदमी आज जूतों समेत बिस्तर पर लेटकर ऊंची आवाज में कुछ नया सा गाना सुन रहा था। ‘मैं प्रेम प्याला पी आया, ईक पल में सदियां जी आया’ राज बाबू अब भी अपने में गुम और मस्त आंखें बंद करके लेटे थे। लगता था कि वो कोई सपना देख रहे हैं और आंखें खोलने से भी डर रहे हों कि कहीं आंख खुलते ही सपना टूट न जाए और फिर साठ साल की उम्र में ऐसी बात हमारे देश में तो शायद गुनाह ही मानी जाएगी। ‘इश्क पर जोर नहीं गालिब, ये वो …आतश है, जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे’ लेकिन राजबाबू को कोई परवाह नहीं थी। राज बाबू की शादी को भले ही कितने साल बीत गए थे लेकिन जिस प्यार की भावना का उन्हें आजकल अहसास हो रहा था वैसा तो कभी हुआ ही नहीं। अब वो समझे कि दिल में कुछ-कुछ कैसे होता है और हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल क्यूं दीवाने हुए फिरते थे। दुनिया की सब रस्में निभाते हुए भी राजबाबू को अपनी पत्नी के पास रह कर भी वो अहसास, नहीं हुआ जो उन्हें प्रीति को दूर से देखकर ही हुआ ‘प्रीति यही नाम तो है उसका, नाम से ही कितना प्यार छलकता है।

वो दिन उन्हें आज भी याद है, नवंबर का महीना जब वो पार्क में अपने मनपसंद बैंच पर बैठ कर कुछ पढ़ रहे थे तो अचानक एक खुशबू का झोंका उनके पास से गुजरा। वो एक अति सुंदर महिला थी और कुछ घबराई हुई सी वहीं आसपास कुछ ढूंढ़ रही थी। शायद उसका कुछ खो गया था। ऊपर से शाम भी गहरा गई थी। पार्क में गिने चुने लोग ही बचे थे। कुछ देर तो वो देखते रहे, आखिर उन्होंने पूछ लिया तो पता चला कि उसकी चाबी शायद यहीं कहीं गिर गई थी। वो भी मदद के लिए यहां-वहां ढूंढऩे लगे लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा। महिला परेशान, लेकिन क्या किया जाए। ज्योंही उन्होंने घर जाने के लिए अपनी किताब और गरम शाल उठाई तो छन्न से कुछ नीचे गिरा, जो कि चाबी थी। हंसी और खुशी का जो फव्वारा छूटा तो मुश्किल से ही थमा।

रात भर प्रीति का सुंदर सलोना चेहरा उनकी आंखों के आगे घूरता रहा। चाबी के छल्ले पर लिखा नाम उन्होंने पढ़ लिया था। यकीन करना मुश्किल था इस उम्र में भी किसी में इतना आकर्षण हो सकता है, क्योंकि वो पचास के बीच में रही होगी। कैसी खनकती हुई आवाज, जैसे कई स्वरलहरियां एक साथ बज उठी हो। जीवन में उनका बहुत सी लड़कियों से औरतों से वास्ता रहा, लेकिन कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ। शायद वो इस टाइप के आदमी ही नहीं थे। अब तो लगभग रोज ही शाम को वो उन्हें पार्क में दिखती। सादगी में इतना आकर्षण। अभिवादन के साथ थोड़ी सी बातचीत भी शुरू हो चुकी थी। बहुत समय पहले उसके पति की रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। एक बेटी है जिसकी शादी इसी शहर में हुई है और वो भी हाल ही में लैक्चरार के पद से रिटायर हुई है। उस दिन की खुशी का कारण एक ऐसा इत्तफाक था जो कि शायद उनकी जिंदगी का सरमाया बन चुका था। हुआ यूं कि बारिश के कारण प्रीति उनके घर आ गई थी और उन दोनों ने मिलकर चाय पी थी जो कि प्रीति ने बनाई थी।
वो दिन और आज का दिन, उन्हें प्रीति की इतनी सी दोस्ती में सब कुछ मिल गया था। दो बातें करके ही वो धन्य हो जाते थे। इसके आगे उनकी कोई इच्छा नहीं थी। प्रीत राग क्या होता है, वो समझ गए थे। जो हुआ है, वो भी प्रभु इच्छा, जो आगे होगा वो भी रब की मर्जी।