मैं तब लगभग तीन वर्ष की थी और शब्दों को स्पष्ट नहीं बोल पाती थी। मुझे बर्फ का गोला बहुत पसंद था। एक दिन मैं पापा से बोली, ‘मुझे ‘गोटा (बर्फ का गोला) चाहिए। बहुत जिद करने पर पापा मेरे लिए गोटा (हनुमान जी वाला गोटे का खिलौना) ले आए। उसे देखकर मैं और ज्यादा रोने लगी। घर में कोई भी समझ नहीं पा रहा था कि गोटा मिल जाने पर भी मैं क्यों रो रही हूं। फिर जैसे-तैसे कर घरवालों ने मुझे चुप कराया। फिर एक दिन मम्मी पापा के साथ मैं बाजार गई, वहां पर बर्फ के गोले की दुकान देखकर मैंने उसकी तरफ इशारा करके फिर गोटे की मांग शुरू कर दी। तब जाकर उन्हें समझ आया कि उस दिन मैं गोटे की नहीं गोले की मांग कर रही थी। घर जाकर जब मम्मी-पापा ने सभी को यह बात बताई तो सभी खूब हंसे।