googlenews
अजनबी

सर्दी कुछ ज्यादा ही थी लेकिन ट्रेन छूटने में अभी भी थोड़ा समय बाकी था। प्लेटफार्म पर तिल धरने की जगह नहीं थी। धक्का मुक्की के इस आलम में ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर इस ‘होलीडे स्पेशल’ ट्रेन में सवार होने को उतारू था। गनीमत थी कि मेरे रिजर्वेशन वाले कंपार्टमेंट में इतनी भीड़ नहीं थी। तभी लंबी सीटी के साथ ट्रेन रेंगती हुई आगे बढऩे लगी। दिल को थोड़ा सुकून मिला लेकिन बाहर अब भी कुछ सवारियां ट्रेन में सवार होने के लिए भागमभाग कर रही थीं। मैं खिड़की से बाहर का नजारा देखकर सोचने लगा, जिंदगी कितनी सस्ती हो गई है, किसी को जान की परवाह ही नहीं? तभी एक अजीब सा वाकया हुआ।

एक अधेड़ उम्र महिला भागकर हमारे कंपार्टमेंट में दाखिल हुई और बिजली की सी फुर्ती से मेरे पास आकर बैठ गई। कुछ पल अपना सिर सीट से टिकाए, आंखें मूंदे वो अपने को संयमित करने में जुट गई। ट्रेन अब रफ्तार पकड़ चुकी थी। रात्रि के दस बज रहे थे। मेरे सामने की बर्थ वाली सभी सवारियां कम्बलों में दुबकी सो चुकी थी। मैं उस महिला को देख रहा था। थोड़ी देर बाद उसने आंखें खोलीं, आसपास के माहौल का जायजा लिया और मुझसे पूछा, ‘कहां जाओगे बाबू? ‘

मुझे यह भी अजीब लगा कि उस महिला के पास कोई सामान नहीं था, सब कुछ एबनार्मल और संदेहास्पद सा था। घबराई निगाहें बार-बार जैसे कुछ खोज रही थी। कोई जवाब न दिए जाने से वो महिला अब थोड़ा सहम गई थी। कुछ देर की खामोशी के बाद उसने फिर पूछा, ‘ये ट्रेन कहां जाएगी? ‘ उसके ऐसे अप्रत्याशित व्यवहार से मेरा शक गहराने लगा। क्या कोई बिना देखे-पूछे यों इस तरह ट्रेन में चढ़ता है? मैंने भावहीन स्वर में कहा, ‘मुंबई जाएगी… आपको कहां जाना है?’

उसके चेहरे पर तनाव बढ़ता जा रहा था। उसने मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। मैंने अपना ध्यान पत्रिका में लगाना चाहा परंतु न चाहते हुए भी मेरी नजरें बार-बार उस महिला की ओर जाने लगीं। वो अब भी उदास, परेशान, गमगीन मुद्रा में मूर्तिवत बैठी थी। तभी टीटी आ गया और टिकट चैक करने लगा। सोई हुई सवारियां भी उठ गईं। वो महिला बिना टिकट थी सो टीटी से उसकी बहस होने लगी। रुआंसी होकर वो अपनी मजबूरी बताने लगी, लेकिन टीटी उसे अपने साथ ले जाने और रेलवे पुलिस को सौंपने की धमकी देने लगा। उस महिला के पास पेनल्टी के पैसे भी नहीं थे।

तमाशबीन लोगों को ऐसे दृश्य बड़े आकर्षित करते हैं। किसी की लाचारी अन्य के लिए मुफ्त का मनोरंजन बन जाता है। उस महिला की आंखें जैसे याचना कर रही थी, लेकिन कोई भी उसकी सहायता के लिए आगे नहीं आया। अंतत: टीटी उसे अपने साथ ले जाने लगा। तभी अचानक न जाने क्या हुआ, मुझे लगा जैसे ये इंसानियत नहीं, मुझे उस मजबूर की कुछ तो हैल्प करनी ही चाहिए। मैं तपाक से आगे बढ़ा। टीटी से बात हुई। ले- देकर मामला 1600 रुपये में निपट गया। मैंने उसका टिकट बनवाया और अब वह पुन: मेरे पास सीट पर आ बैठी।निस्तब्ध शून्य को घूरती उसकी निगाहों में शायद कृतज्ञता का भाव झलकने लगा था।

रात के 12 बज रहे थे। मैंने अपना टिफिन निकाला और शिष्टाचारवश उस महिला को भी खाने के लिए कहा, लेकिन सकुचाई और सहमी सी वो शांत बैठी रही। मैंने जबरदस्ती कुछ खाना उसे दे ही दिया। उसकी आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी। मशीनी अंदाज में छोटे-छोटे कौर वह अपने मुंह में डालने लगी। मेरी नजरें अब भी उस पर टिकी थी। बोगी के नीले बल्ब की हल्की सी रोशनी इस माहौल को और भी रहस्यमय बना रही थी।

उसकी उम्र लगभग 45-46 साल होगी। सांवला रंग लेकिन नयन-नक्श बड़े आकर्षक थे। शरीर लपेटा हुआ था। पैरों में हवाई चप्पलें भीषण सर्दी में बड़ी अजीब लग रही थी। कुल मिलाकर वो बेहद सामान्य घर परिवार की सी लग रही थी। मेरी जिज्ञासा पराकाष्ठा पर थी और जैकिट, मफलर, कैप के बाद भी मेरी ठंड रुक नहीं रही थी, जबकि वो एक शॉल में घुटने मोड़े दुबकी सी बैठी थी। सर्दी से उसका कंपकपाता बदन मैं महसूस कर रहा था। मैंने अपना एक कम्बल उसकी तरफ बढ़ा दिया। कुछ पल मुझे घूरने के बाद उसने कम्बल थाम लिया।

बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। उसने पुन: पूछा, ‘कहां तक जाओगे बाबू? मैंने जवाब में मुंबई कहकर उससे प्रतिप्रश्न किया, ‘आपको मुंबई ही जाना था तो टिकट क्यों नहीं लिया? उसने जवाब दिया, ‘मुझे क्या पता मेरी किस्मत मुझे कहां ले जाए। ऐसे जवाब से मेरी बेचैनी और बढ़ गई। मैं शायद उम्र में उससे काफी छोटा था, इसलिए ही वो मुझे लकड़पन के भाव से बाबू कहकर संबोधित कर रही थी। सच तो यह था कि जिस काम से मैं मुंबई जा रहा था वो इस घटना से मैं भूल सा गया था।

विचारमंथन का केंद्र बिन्दु इस समय सिर्फ वो रहस्यमय महिला ही थी। इस यात्रा के दो दिन बाद मुझे मुंबई विश्वविद्यालय की एक सेमिनार में अपना शोधपत्र पढऩा था। समाजशास्त्र का प्रोफेसर हूं, तो मैं समाज के ऐसे विषयों को कैसे नजरअंदाज कर सकता था? अब तक मैं स्वतंत्र भारत में नारी की स्वतंत्रता, समानता और सशक्तिकरण पर लंबी-चौड़ी बहसें ही तो करता आया था। यथार्थ और कागजी योजनाओं के अंतर भी तो मुझे इसी तरह आकर्षित किया करते हैं। तभी उस महिला ने लंबी सांस खींची जैसे अपने अंदर के तूफान को बाहर निकालने का निश्चय कर लिया हो। अब वो मेरे नजदीक थी और हलका सा स्पर्श भी महसूस होने लगा था।

तभी अचानक उसने मुझसे मेरा सेलफोन मांगा। शायद कोई अर्जेंट कॉल करनी थी उसे। सेलफोन लेकर उसने कोई नंबर डायल किया और फौरन गैलरी में चली गई। उसके वार्तालाप का मुझे कोई ज्ञान नहीं हो पाया। पांच मिनट बाद वो पास आई, सेलफोन अब पुन: मेरी जेब में था। रहस्य और गहरा गया। चाहता तो मैं लास्ट कॉल चैक कर सकता था लेकिन उसके सामने मैंने ऐसा कोई उपक्रम नहीं किया। यह कार्य तो मैं कभी भी कर सकता था। नंबर तो अब दर्ज ही था।

मुझे कब नींद आई पता नहीं लेकिन सुबह मुंबई स्टेशन के कोलाहल से मेरी नींद टूटी। वो महिला अब भी मेरी बर्थ के नीचे की तरफ कम्बल में लिपटी सोई पड़ी थी। अचानक मैंने अपना सेलफोन चैक किया तो, घोर आश्चर्य हुआ। रात वाली काल डिलीट की जा चुकी थी। मतलब ये औरत थी बड़ी चालाक। मैंने उसे उठाया, भौचक्की सी नजरों से वह मुंबई का स्टेशन देखने लगी। मैंने अपना सामान समेटा, कम्बल उसी के पास छोड़कर झटपट नीचे उतर गया। वो अब भी उसी डिब्बे में बैठी थी।

मैंने मुंबई विश्वविद्यालय के आमंत्रण पत्र से वो एड देखा जहां मेरे रुकने की व्यवस्था की गई थी। कॉफी पीकर मैं ज्योंही स्टेशन से बाहर आया, मेरी नजर ऑटो चालकों से घिरी उस रहस्यमय महिला पर पड़ी। ना चाहते हुए भी मैं उसके पास पहुंचा। मुझे देखते ही वो रोने लगी, ‘देखो बाबू, इन लोगों ने जबरदस्ती मुझे अपनी गाड़ी में बिठाया और अब मेरा पर्स गायब है।’ मेरी स्थिति अजीब हो गई। किसी तरह समझा बुझाकर मैं उसे वहां से दूर ले गया। सामने रेस्टोरेंट पर उसे चाय पिलाई, हालांकि मुझे उस महिला के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था, लेकिन जानता था बिना पैसों के इसकी अब मुंबई में दुर्गति होना निश्चित है।

मैंने उसे अपने साथ लिया और ऑटो रिक्शा से हम उस होटल में पहुंचे जहां मैं अक्सर रुका करता था। मेरे प्रोग्राम में तो अभी दो दिन बाकी थे इसलिए मन था कि कहीं सुकून से बैठकर इसकी रामकहानी तो सुनूं ताकि उसे यूं मंझधार में अकेले ना भटकना पड़े। कारण उसके साथ कुछ न कुछ तो बेहद एबनार्मल था।

थोड़ी देर बाद हम होटल ‘सी व्यू’ पहुंच गए। मुंबई का मौसम इतना सर्द नहीं था। मैं पहले थोड़ा फ्रेश हो जाना चाहता था। उस महिला के पास तो कुछ भी सामान नहीं था इसलिए उसे तो शायद हाथ मुंह ही धोने थे। अचानक होटल के उस कमरे में ऐसा वाकया हुआ जिससे मेरी रूह कांप गई। उस महिला ने ज्योंही अपना शॉल हटाया उसकी साड़ी और ब्लाउज पर मुझे गहरे लाल खून के धब्बे नजर आए। ब्लाउज के अंदर खौंसा हुआ एक लंबे फॉल वाला चाकू भी। मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। ये माजरा क्या है, कौन है ये महिला? क्या कोई जुर्म करके भागी है? मैं कुछ पूछता उससेपहले ही वो बाथरूम में घुस गई।

अजनबी
एक और पहलू 3

 

सामने टेबल पर आज का अखबार पड़ा था। मेरी नजर ज्योंही फ्रंट पेज पर पड़ी तो सन्न रह गया। एक खबर छपी थी ‘जमुना नाम की एक औरत तीन लोगों का कत्ल करके फरार।’ मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई। अखबार में छपी फोटो हूबहू उसी महिला से मेल खा रही थी। पुलिस उसकी तलाश में सरगर्मी से जुटी थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? पुलिस को सूचना दूं? कल को पुलिस जांच में फंसना निश्चित था। तभी वो महिला बाथरूम से बाहर आई। मैंने देखा अपने कपड़े धोकर उसने गीले ही पहन लिए थे। पेटीकोट के साथ शॉल ओढा हुआ था। बाकी कपड़े सुखाने की कोशिश में थी। मुझे गहन टेंशन में देख तो थोड़ा सकपकाई। अखबार अभी भी मेरे हाथों में था। मैं अपना धैर्य और संतुलन खो बैठा और आवेश से चीखा, ‘कौन हो तुम और मुझे बेवकूफ क्यों बना रही हो?’

वो मेरे नजदीक आकर बैठ गई, शांत-धीर गंभीर मुद्रा में सिर्फ इतना कहा, ‘तुमने मुझे बहुत सहारा दिया है बाबू, मैं अब चलती हूं यहां से, तुम्हें ज्यादा खतरे में डालना नहीं चाहती।’ ‘कौन हो तुम? मैं तुम्हारी असलियत जानना चाहता हूं। ‘मैंने आवेश से पूछा। अब वो बैड पर मेरे नजदीक बैठी थी और पुन: शांत स्वर में बोली, ‘मुझे तुम कुछ भी समझ लो, बदनाम, वैश्या, डायन जो मन करे लेकिन ये सच है कुछ बदकिस्मत औरतों की और कोई पहचान हो भी नहीं सकती।’

‘तुम पहेलियां बुझाना छोड़ो, मुझे ये बताओ क्या किया है तुमने? खून-चाकू आखिर क्या माजरा है ये?’ मैंने खीझकर कहा। ‘क्या करोगे बाबू ये सब जानकर? बस इतना याद रखो, मैं भी औरत हूं और मैंने कभी गलत नहीं किया।’ उसने भावहीन मुद्रा में जवाब दिया। ‘मैं जो देख रहा हूं, वो भले घर की औरतों के तो काम नहीं।’ मैंने जैसे अपना निष्कर्ष सुनाया।

‘सही कहते हो बाबू! तुमने मेरे ऊपर काफी पैसा खर्च किया है लेकिन अभी मेरे पास कोई जरिया नहीं तुम्हारे अहसान चुकाने का। और फिर दुबारा कभी मिलें भी या नहीं ये भी पता नहीं। दोष हमेशा गरीब औरत का ही होता है… और हां अगर चाहो तो मेरे बदन से वसूल कर लो, आखिर ये दुनिया वाले ऐसा ही तो चाहते हैं, हम जैसी मजबूर औरतों से?’

मैं सकते में था, कुछ सोचता उससे पूर्व ही उसने एक झटके से अपना शॉल बदन से छिटक दिया। मांसल देह नुमाया हो गई। इस कृत्य का मेरे ऊपर उलटा असर हुआ। मेरा गुस्सा भड़क गया। उसे झिड़कते हुए कहा, ‘ये क्या बदतमीजी है… मुझे ऐसा आदमी समझा है क्या?’

‘इसके आगे तो सब मरद एक जैसे होते हैं बाबू! आदमजात में आखिर यही तो एक समानता है।’ उसने बड़े शांत स्वर में जवाब दिया। मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। ये समझती क्या है अपने आपको? लेकिन उसके अतीत को जानकर मेरा सिर शर्म से झुक गया। ज्यों-ज्यों अतीत के रहस्य से पर्दा हटा, मेरी धारणा बदलती गई।

गांव के रसूखदार सफेदपोश लोगों ने क्या कुछ नहीं किया था उसके परिवार के साथ। पहले उसके पति की हत्या करवाई और फिर जमीन के वो टुकड़े, जिनसे दो वक्त का निवाला नसीब होता था, वो भी छीन लिए गए। पिछले साल उसकी बड़ी लड़की गायब हुई और सुनने में आया कि उसे मुंबई में ही कहीं बेच दिया गया था। और अब दो दिन पहले गांव के उन वहशियों ने सरेआम उसकी छोटी बेटी की इज्जत भी तार-तार कर डाली, जिससे दु:खी होकर उसने कुएं में कूदकर जान दे दी। इतना सब होने पर उसकी सहनशक्ति जवाब दे गई और वो खुलेआम घूम रहे उन वहशियों के खून से अपने हाथ रंग बैठी। उसकी जानकारी में एक शख्स अभी भी मुंबई में रह रहा था, जिसने उसकी बेटी को अगवा कर बेचा था। उसका मुंबई आने का मकसद साफ था। उसे उसके किए की सजा देकर वो अपने घृणित जीवन से मुक्ति पा लेना चाहती थी।

ऐसे शोषण अत्याचारों के खिलाफ कहां-कहां नहीं गई वो। इंसाफ तो दूर की बात है, उसकी तो रपट तक दर्ज नहीं हुई। हर जगह दुत्कार, गालियां और आरोपों से उल्टा उसी को अपराधी ठहराया जाने लगा। कुल्टा, वैश्या, डायन और आदमखोर जैसे जुमले उसकी पहचान बन गए थे। उसकी अस्मिता तो खूब लूटी लेकिन किसी ने एक औरत की मजबूरी, संघर्ष और संवेदनाओं को नहीं समझा। पुलिस, कोर्ट, कचहरी सब जगह उसी को फंसा दिया गया। सही भी है साधन संपन्न लोगों के पास ही तो शक्ति होती है। मातृऋण से मुक्त होने का उसका नजरिया इस घटनाक्रम की परिणति का सबब था।

जमुना की दुखद दास्तान से मैं स्तब्ध था। आजाद भारत में महिलाओं की ये कैसी दशा? आजादी और समानता की ये कैसी व्याख्या हो सकती है? इतने अन्याय और शोषण से रक्षण की कोई सहज व्यवस्था नहीं? उसके द्वारा कानून को हाथ में लेना सरासर गलत था, लेकिन मेरे पास इन प्रश्नों के भी जवाब नहीं थे। मुझे ये समझ नहीं आ रहा था कि इतने आसान से समाजशास्त्र को समझने में हमें इतना वक्त क्यों लग रहा है?

जमुना को मैंने तुरंत सैरंडर करने को कहा लेकिन वो अपनी जिद पर अड़ी थी। उसकी एक ही रट थी ‘नहीं बाबू जब तक एक ‘जानवर’ का और शिकार न कर लूं, तब तक मैं मातृऋण से मुक्त नहीं हो पाऊंगी।’ मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किसे दोष दूं? फिलहाल तो मैं स्वयं अपने आपको ही दोषी मान रहा था जो बेवजह इस पचड़े में फंसता जा रहा था। शायद इस समस्या की मुख्य वजह हमारी यही सोच है। जिम्मेदारी से बचने में ही समझदारी मानी जाती है।

खैर काफी जद्दोजहद के बाद मैं जमुना को समझाने में सफल हो गया। जो हुआ वो गलत था लेकिन आगे और गलत मत करो। कानून तुम्हारे साथ अवश्य सहानुभूति दिखाएगा। उसे मैंने निशुल्क विधिक सहायता के प्रावधानों के बारे में बताया। लेकिन उसे अब अपने अंजाम की शायद चिंता ही नहीं थी। वो तो जेल की सजा से बेहतर फांसी चाहती थी। जीते जी ही इतनी सजा भुगत ली थी कि अब और भुगतने की क्षमता नहीं बची थी उसमें।

दूसरे दिन समाचार पत्र की हैड लाइन पढ़ी- ‘फरार कातिल जमुना ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया।’ शोधपत्र पढऩे का अब मेरा मूड नहीं था। दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल था, सिर्फ बनावटी बातों अथवा तथाकथित आदर्शवाद का ढिंढोरा पीट-पीट कर हम कब तक ऐसी कहानियों को छुपाते रहेंगे?

यह भी पढ़ें –मुखौटे वाले नहीं नहीं – गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji