googlenews
कहानी

उफ-ये-मोजे – तनिष की यह आदत उसे बहुत अखरती थी, बस जूते उतारे और मोजे फेंक दिए। एक उत्तर तो दूसरा दक्षिण…
वसुधा के विवाह को चार-पांच महीने हुए थे। सुदूर ग्रामीण अंचल को छोड़कर पूना जैसे विकसित शहर की आबोहवा उसे धीरे-धीरे रास आने लगी। वैसे भी वसुधा को बाहर घंटे घर पर अकेले ही गुजारने होते थे। तनिष को दफ्तर जाने और वापस आने में इतना समय लगता ही था।
वसुधा, भले ही ग्रामीण अंचल में पली-बढ़ी, मगर थी बड़ी ही सुसंस्कृति व सलीकेदार। उसने थोड़े ही समय में घर का संचालन बड़े कायदे से करना शुरू कर दिया था। तनिष भी बहुत संतोष महसूस करता था। उसे पहले तो बड़ा ही अटपटा लगता था। इतने पुराने माहौल में गांव में रहने वाली युवती का उससे मेल हो पाएगा, मगर तनिष को वसुधा के व्यक्तित्व में ऐसी सरलता महसूस हुई कि उसने वसुधा को ही जीवनसाथी बनाने का फैसला कर लिया था।
थोड़े समय बाद तनिष का इरादा वसुधा को कोई अच्छा सा कोर्स करवा कर आत्मनिर्भर बनाने का था। वसुधा को क्राफ्ट में बड़ी रुचि थी। तनिष चाहता था कि दो-तीन साल कड़ी मेहनत करके वसुधा अपना कुछ काम निभा ले या फिर ऐसा ही कुछ सृजनात्मक काम करे। खुद वसुधा भी इसके लिए तैयार थी।
मगर पिछले एक-दो हफ्ते से वसुधा को कुछ और ही बात परेशान किए जा रही थी। हालांकि उसे इस बात पर बड़ा अचरज भी हुआ कि उसने पहले क्यों नहीं इस तरफ ध्यान दिया, भला क्यों? तनिष के नीचे गिरे हुए एक मोजे को उठाकर वह दूसरे को दरवाजे के पीछे या फिर सोफे के नीचे से ढूंढ कर वाशिंग मशीन के पेट में ठंूसती वह यही सोच रही थी।
तनिष की यह आदत उसे बहुत अखरने लगी थी, बस जूते उतारे और मोजे करीब-करीब फेंक दिए। एक उत्तर तो दूसरा न जाने दक्षिण या पश्चिम या पूरब। वसूधा को चीजें बिखेरना बहुत खलता था, उसे व्यवस्थित चीजे सलीकेदार कमरा वगैरह दाग-धब्बे का फर्श बड़ा अच्छा लगता था पर मगर ये मोजे…। उफ! भुनभुनाती हुई वसुधा अपना सेल उठाकर कोई मैसेज पढऩे लगी, जिससे उसका ध्यान बंट जाए और गुस्सा कम हो। तीन-चार मैसेज पढ़कर उसने एक पत्रिका उठा ली। तभी बाहर खिड़की से कोई फेरीवाला मराठी में मीठी-मीठी मनुहार करता चादर बेचता सुनाई दिया। उसे बस आमची और कुछ-कुछ करयांचा जैसा शब्द सुनाई दिया, मगर समझ में कुछ नहीं आया, यों लावनी सुनना तो उसे खास पसंद था। मगर ये मोजे… उफ! आज शाम फिर तनिष का यही… बस यही होगा। मोजे उतारे और बस बिखेर दिए उफ! वसुधा का ध्यान बार-बार मोजों पर ही चला जाता।
इस बीच पोस्टमैन आया। एक बार बाजू वाली ताई ने आकर पालक के सही भाव भी पूछे और उसके बाद वसुधा ने दो-तीन कॉल भी की। सहज होकर बात की, पर फिर वही मोजे, उफ!
वसुधा ने रसोईघर की तरफ रुख किया। तनिष के पसंदीदा कोफ्ते बनाने की तैयारी करने लगी। जब तक वो काम में उलझी रही तब तो वो करीब-करीब मोजे वाली आदत को भूल चुकी थी। कोफ्ते, फ्रूट रायता और भिंडी की सूखी सब्जी बनाने तक इतना वक्त निकल गया कि तनिष के आगमन की डोरबैल भी बज गई।
वसुधा ने दरवाजा खोला और मुस्कुराकर तनिष का स्वागत किया? तनिष को एक गिलास पानी देने तक वो बात हो ही गई जिसका डर था वसुधा को। मोजे फर्श पर बिखरे थे। आज वसुधा को जाने क्या हुआ। उसने एक बच्चे की तरह बायें पैर वाले मोजे को पहले तो खुद सोफे के नीचे सरकाया और फिर कुछ इस अदा से उसे ढूंढऩे लगी कि तनिष का ध्यान बरबस ही उसकी तरफ चला गया। उसने गौर से देखा कि वसुधा यह नीचे भला क्या खोज रही होगी फिर जब खुद झुक कर देखा तो कुछ हिचकिचाहट सी हुई। वसुधा ने मोजे उठाए और उसके सामने ही जाकर मशीन के भीतर मोजे डाल दिए।
उसके बाद वसुधा खुद ही सहज हो गई। दरअसल अब मोजे बिखरे नहीं थे, इसलिए उसे बेचैनी भी नहीं थी। थोड़ी देर बाद दोनों ने बालकनी में भोजन का आनंद उठाया। सुबह उठकर वसुधा ने मोजे बिखरे हुए नहीं देखे। उसे अचानक याद आया कि मोजे तो कल शाम खुद ही उसने मशीन में रख दिए थे।
खैर! सुहानी सुबह और चाय की चुस्कियों में नाश्ते का समय भी हो गया। तनिष दफ्तर के लिए निकल चुका था, पीछे से वसुधा भी व्यस्त ही रही। आज उसे राशन के लिए सुपर मार्केट जाना था अचार डालना था। वार्डरोब जमानी थी।
आज बुधवार था और तनिष को मूंग की दाल के साथ मलाई प्याज की सब्जी खानी थी। हर बुधवार तनिष मूंग की दाल ही खाना पसंद करता था। वसुधा को इसका कारण पता नहीं था और वो क्यों पूछती भला, जब खुद उसे ये दोनों चीजें बेहद पसंद थीं। मलाई प्याज तो उसने कॉलेज में होम साइंस की क्लास में सीख ली थी। पाक कला में तो वसुधा बहुत पक्की थी।
अरे! इतनी रात हो गई अचानक डोर बैल बजी तो वसुधा ने गौर किया। तनिष का स्वागत करके वो पानी का गिलास भर लाई। मगर तनिष वहां नहीं थे और साथ ही मोजे भी नदारद थे। वसुधा को आवाज सी सुनाई दी। किसी ने वाशिंग मशीन का ढक्कन खोला था। एक ही पल में तनिष वापस कमरे में आए और पूरा पानी गटागट पी गए। थके-हारे तनिष ने उस शाम जल्दी भोजन करने की इच्छा जाहिर की। वसुधा को कोई दिक्कत नहीं थी। उसने चट खाना परोस दिया। खाना खत्म करके थोड़ा चहलकदमी करके तनिष ने जो तकिये के सहारे अपना शरीर बिस्तर की तरफ किया ही था कि उन्हें खर्राटों वाली गहरी निद्रा ने आ घेरा।

यह भी पढ़ें –उधार वाले खिस्को – गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji