आज की तेज रफ्तार जिंदगी में महिलाएं अपने स्वास्थ्य को लेकर लापरवाह होती जा रही हैं। जिसका परिणाम यह है कि आज हर दूसरी महिला मोटापे की समस्या से परेशान है। मोटापा जहां एक ओर शरीर की पूरी बनावाट बिगाड़ देता है, वहीं दूसरी ओर यह स्वास्थ्य के नजरिए से भी खतरनाक है। इस बारे में डॉ. संजय बोरुदे कहते हैं कि अक्सर महिलाएं जितना भोजन करती हैं, उस अनुपात में शारीरिक व्यायाम नहीं करती, इस असंतुलन के कारण उनके शरीर में फैट सेल्स (चर्बीयुक्त कोशिकाएं) की संख्या बढ़ जाती है। सामान्य कद-काठी की स्त्री के शरीर में लगभग 30-35 बिलियन फैट कोशिकाएं होती हैं। जब किसी स्त्री का वजन बढऩे लगता है तब पहले इन फैट कोशिकाओं का आकार बढ़ता है और फिर इनकी संख्या भी तेजी से बढऩे लगती है, जिसके कारण मोटापा तेजी से बढ़ता है।
डॉक्टर कहते हैं कि एक पौंड बॉडी फैट में लगभग 3500 कैलोरी ऊर्जा होती है। मोटापे से ग्रस्त महिलाएं आहार में नियंत्रण और व्यायाम के सहारे वजन कम करने की कोशिश करती हैं। हालांकि, एक बार वजन बढ़ जाने पर इसे कम करना काफी मुश्किल होता है। जब कोई स्त्री अपना वजन घटाना शुरू करती है तो इन कोशिकाओं का आकार तो छोटा हो जाता है, लेकिन शरीर में फैट सेल्स की संख्या जस-की-तस बनी रहती है। ऐसे में, फिर से वजन बढऩे की आशंका भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि एक बार वजन बढ़ जाने पर उसे कम करना बहुत कठिन हो जाता है।

कारण
मोटापे के कारणों में आधुनिक जीवन शैली प्रमुख है- आज की आधुनिकता भरी जिंदगी में पैदल चलकर ऑफिस जाने अथवा साइकिल चलाकर स्कूल जाने का ट्रेंड लगभग खत्म हो चुका है। लोग थोड़ी दूर जाने के लिए भी गाड़ी का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी मंजिल पर पहुंचने के लिए भी एलिवेटर का इस्तेमाल करते हैं। बच्चे दौडऩे अथवा पार्क में खेलने के बजाय वीडियो गेम खेलना पसंद करते हैं। ये सारी वजहें मिलकर मोटापे की समस्या को बढ़ाने का काम कर रही हैं।

वजन बढऩे की अवस्थाएं
फैट सेल्स की संख्या बढऩे के कारण स्त्रियों का वजन बढऩे की निम्नलिखित अवस्थाएं होती हैं।
12 से 18 महीने की उम्र के बीच।
12 से 16 वर्ष की उम्र के बीच।
व्यस्कता, जब स्त्रियों के सामान्य शारीरिक वजन में 60 प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि होती है।

गर्भावस्था।

तनाव भी एक अन्य कारक है, जिसके चलते वजन बढ़ता है। तनाव में अक्सर लोग ज्यादा खाते हैं। जब हम खाते हैं तब ब्रेन में एक प्रकार का हार्मोन बनता है, जो हमारी तनावग्रस्त नव्र्ज को आराम पहुंचाता है। यही हार्मोन एक्सरसाइज के दौरान भी बनता है और इससे भी उतना ही आराम महसूस होता है। ऐसे में तनाव के समय खाने के बजाय हमें एक्सरसाइज करने की कोशिश करनी चाहिए।

बीमारियां : मोटापा कई बीमारियों की जड़ होता  है। डॉ. संजय बोरुदे कहते है, मोटापे से संबंधित प्रमुख रोगों में डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, कोलेस्ट्राल की अधिकता, हृदयरोग, दिल का दौरा, पित्ताशय के रोग, गैस्ट्रो इसोफेगल रिफ्लेक्सडिजीज (जीईआरडी), ऑस्टियोअर्थराइटिस, निंद्रा अश्वसन (स्लीप ऐप्निआ ), सांस की समस्याएं और कैंसर जैसे रोग शामिल हैं।

1. हॉर्मोन में असंतुलन
मोटापा के कारण हॉर्मोन में असंतुलन हो जाता है,जिससे ओव्युलेशन में कठिनाई आती है और प्रजनन क्षमता दुष्प्रभावित हो सकती है। मोटापा होने से गर्भावस्था की जटिलताएं और शिशु की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढऩे का खतरा रहता है। गर्भावस्था के दौरान मोटापे के कारण होने वाले खतरों में गर्भपात, तनाव, संक्रमण, रक्त के थक्के जमना आदि शामिल हैं।

2. नवजात शिशु को खतरा
गर्भावस्था की शुरूआत में भी महिलाओं में मोटापा नुकसानदेह होता है, क्योंकि अधिक वजन और मोटापे के कारण नवजात शिशु की मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों के अनुसार गर्भावस्था के पूर्व और दौरान माता का वजन सामान्य होना शिशु के लिए अच्छा होता है।

3. जोड़ों की समस्याएं
मोटापे से स्त्रियों में घुटने, कूल्हों और कमर के जोड़ों की समस्या का जोखिम भी बढ़ जाता है। अधिक वजन से घुटनों पर भार बढ़ता है, जिससे ऊतकों को क्षति होती है। इसके अलावा, फैट सेल्स को गठिया (अर्थराइटिस) का कारण माना जाता है, जिससे घुटनों में दर्द होता है।

4. मधुमेह
मोटापा स्त्रियों में द्वितीय स्तर के मधुमेह यानी टाइप-2 डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। टाइप-2 डायबिटीज से पीडि़त अधिकांश स्त्रियां मोटापे की शिकार होती हैं। डायबिटीज के शिकार 90 प्रतिशत लोग टाइप-2 डायबिटीज से पीडि़त हैं। इस प्रकार की डायबिटीज हमेशा ही मोटापे से संबंधित होती है, जो संभवत: एडिपोज टिश्यू (बॉडी फैट) द्वारा उत्पन्न हॉर्मोन से जुड़ा होता है। टाइप-2 डायबिटीज में शरीर की कोशिकाएं इन्सुलिन का समुचित उपयोग नहीं करती हैं। मोटापा के कारण मलाशय, स्तन, एंडोमेट्रियल और पित्ताशय के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है।

5. स्लीप ऐप्निआ
निंद्रा अश्वसन (स्लीप ऐप्निआ ) स्त्रियों में होने वाली आम समस्या है। इसमें गले के आस-पास अधिक फैट जमा हो जाता है। इससे श्वासनली पतली हो जाती है और सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। ओबीसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम (ओएचएस) श्वसन संबंधी एक ऐसी समस्या है, जिससे स्त्रियों सहित कुछ मोटे लोग प्रभावित होते हैं। ओएचएस में कमजोर श्वसन के कारण रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता (हाइपोवेंटिलेशन) और ऑक्सीजन की भारी कमी (हाइपोक्सेमिआ) हो जाती है। ओएचएस से स्त्रियों में गंभीर स्वास्थ्य समस्या, यहां तक कि मृत्यु भी हो सकती है।

6. गॉलस्टोन
अधिक वजन या मोटापा वाली स्त्रियों में गॉलस्टोन होने का खतरा बढ़ जाता है। गॉलस्टोन पित्ताशय में एकत्र पत्थरनुमा पदार्थ के छोटे-छोटे कठोर टुकड़े होते हैं। वे ज्यादातर कॉलेस्ट्राल से बने होते हैं। गॉलस्टोन के कारण पेट और पीठ में दर्द होता है। अधिक वजन होने से पित्त की थैली बड़ी हो जाती है और ठीक से काम नहीं करती। पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यह बीमारी मोटी स्त्रियों में होने वाला एक और आम रोग है। इस रोग की शिकार अधिकांश स्त्रियों के अंडाशय (ओवरी) में छोटी-छोटी गांठ (सिस्ट) बन जाती हैं और इसी कारण इस रोग को पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी बहुगांठीय अंडाशय लक्षण कहा जाता है। ये गांठ नुकसानदेह नहीं होते लेकिन इससे गर्भधारण ना होने की समस्या हो सकती है। हॉर्मोन में एक प्रकार का असंतुलन हो जाता है और सामान्य जीवन चक्र पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

कैसे दूर करें मोटापा

  1. डॉ. अंशुमान कौशल का कहना है कि मोटापे को दूर करने के लिए अपनी जीवनशैली में बदलाव, खाने की आदतों में सुधार और व्यायाम को अपनी जीवन शैली का हिस्सा बनाना होगा। जैसे-  

  2. आहार नियंत्रण का यह मतलब नहीं कि आप डायटिंग करें। डायटिंग से शरीर को ऊर्जा नहीं मिल पाती है। शरीर पर अधिक चर्बी बढऩे से पेट बाहर निकल आता है और हाथ-पैर, गर्दन, कमर इत्यादि जगहों पर भी चर्बी जमा हो जाती है।

  3. खाना खाने के तुरंत बाद पानी न पीकर खाने के एक से डेढ़ घंटे के बाद ही पानी पियें और भोजन करते समय हमेशा भूख से थोड़ा कम खाएं।

  4. भोजन में तैलीय पदार्थों और मीठे की जगह साग, सब्जी और फलों को अधिक शामिल करें। खाने में चावल, आलू और घी का सेवन कम से कम करें। खाने को हमेशा धीरे-धीरे और चबा कर खाएं।

  5. सप्ताह में कम से कम एक दिन सिर्फ तरल पदार्थों का सेवन करने का नियम बना लें। गेंहू की चपाती छोड़ चने या जौ से मिले आटे की चपाती खाना शुरू करें।

  6. सुबह खाली पेट एक गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद और नींबू घोल कर पिएं। पूरें दिन में कम से कम 12-13 गिलास पानी पिएं।

  7. नींद हमें कई बीमारियों से दूर रखने में मदद करती है। पर्याप्त नींद हमारे भूख हार्मोन घेर्लिन और लेप्टिन को नियंत्रित करता है। ठीक से ना सोने वालों को अधिक भूख लगती है, जिसका सीधा असर वजन पर पड़ता है, इसलिए भरपूर नींद लें।

  8. भोजन की शुरूआत सलाद से करें। फिर सब्जियां, रोटी, चावल खाएं सीमित मात्रा से खाएं। दिन और रात के खाने का समय निर्धारित रखें।

  9. फलों के रस से वजन कम होता है। लेकिन अगर आप वजन कम करने के लिए फलों के रस का सेवन करें तो गाढ़े जूस का सेवन बिल्कुल ना करें।

  10. अपने बैग में हमेशा पानी की बोतल रखें। पानी पीने से भी शरीर की कैलोरी खर्च होती है। कोल्ड डिंक या सोडा वॉटर का सेवन कम से कम करें।

  11. च्यूइंगम भी कम खाएं। च्यूइंगम खाने की आदत है तो इस आदत को आप कैंडी को चूसने या उच्च फाइबर वाली फल और सब्जियां वाले नाश्ते या कम वसा वाले पपकॉर्न से बदल सकते हैं। 

  12. व्यायाम भी जरूरी है। वॉक एक अच्छी एक्सरसाइज है। इससे कसरत के 90 फीसदी फायदे मिल जाते हैं। साथ ही हाथों का मूवमेंट और थोड़ा स्टैच भी करना चाहिए। जिनके पास वक्त नहीं है, वे सिर्फ वॉक कर सकते हैं। 

  13. एक मील चलने से 100 कैलोरी तक बर्न होती हैं। हफ्ते में अगर तीन दिन 2-2 मील की वॉक करें तो हर तीसरे हफ्ते आधा किलो वजन कम हो सकता है।

  14. मसल्स को टोन करने के लिए स्टेबिलिटी बॉल एक्सरसाइज करें। इससे पेट की मासंपेशिया 40 फीसदी ज्यादा और साइड एबस 47 फीसदी ज्यादा एक्टिव होंगे। 

  15. इस एक्सरसाइज से पेट के भीतरी मांसपेशिया भी अच्छी तरह से पुष्ट होंगी। साथ ही टोटल बॉडी वेट टेनिंग भी अपनाएं। टोटल बॉडी रेजिस्टेंस रूटीन को कार्डियो के साथ करें तो दो गुना ज्यादा फैट कम होगा। एक्सपर्ट कहते हैं कि वेट लिफ्टिंग और एक्स्टा प्रोटीन की वजह से ज्यादा कैलोरी बर्न होता है।

 

 

 

बेली फैट तोंद या पेट की चर्बी
अधिकतर महिलाओं के पेट पर चर्बी जिसे तोन्द या बेली फैट कहते हैं पाई जाती है। यदि बेली फैट बहुत ज्यादा हो तो यह आपके स्वास्थ्य को उतना प्रभावित कर सकती है जितनी दूसरे हिस्से की चर्बी भी नहीं कर पाती।

यदि किसी महिला की कमर का घेरा 90 सेंटीमीटर से अधिक तथा पुरुष की कमर का घेरा 80 सेंटीमीटर से अधिक हो तो बेली फेट खतरनाक हो सकता है। बॉडी मॉस इंडेक्स (बीएमआई) जोकि वजन तथा किलोग्राम/एम२ होता है। भारतीय स्वास्थ्य दिशानिर्देश के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का बीएमआई 25 से अधिक हो तो वह मोटा कहलाता है और यदि बीएमआई ३५ से अधिक हो तो यह मोटापे की बीमारी कहलाती है।

डॉ. मनीष मोटवानी कहते हैं, ‘भारतीयों तथा पश्चिमी देशों के लोगों के बीच इस अंतर का मुख्य कारण शरीर की संरचना या एडिपोस टिश्यु स्ट्रक्चर है। व्यायाम से लेकर खानपान संबंधी निर्देशों का अनुसरण कर बेली फैट कम किया जा सकता है फिर भी जिनका बीएमआई 30 से अधिक होता है उनके लिए वेट लॉस सर्जरी या बेरिएटिक सर्जरी बेली फैट घटाने का सर्वोत्तम विकल्प है। इससे टाईप-2 डायबिटीज और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों से भी छुटकारा पाया जा सकता है।

खतरनाक बेली फैट को कम करने के लिए सप्ताह में पांच दिनों तक नियमित रूप से आधा घण्टे व्यायाम करना तथा भोजन में ज्यादा फाइबर और कम कार्बोहाइडे्रट शामिल करने जैसे कुछ नियमित उपाय हैं। अच्छी नींद व कम तनाव ग्रस्त जीवन बेली फैट को कम करने में सहायक है।

सर्जरी भी है एक विकल्प
जो लोग अपने खाने-पीने पर नियंत्रण नहीं कर सकते उनके लिए सर्जरी एक आसान तरीका है, जिससे वो अपने मोटापे से निजात पा सकते हैं जैसे-
सर्जरी एक आसान तरीका तो है पर इसके साइड इफेक्ट भी होते हैं। इसीलिए सर्जरी करवाने वाले इसके साइडइफेक्ट को भी अच्छे से जान लें तभी सर्जरी के बारे में सोचें। मुख्यत: सर्जरी तीन तरह की होती है। लिपोसक्शन, टमी टकर और स्टमक सर्जरी। लिपोसक्शन में शरीर के जींस भाग में अतिरिक्त वसा जमा हो जाती है। सर्जरी की मदद से वासा को हटाया जाता है। इससे शरीर के दोनों पैरों की जांघें, पेट, कमर और अन्य भाग जहां की सर्जरी की जाती है पतली हो जाती है। टमी टकर में टमी यानी की पेट के आसपास जमे अतिरिक्त वसा को सर्जरी से हटाया जाता है।  ये सर्जरी हमेशा के लिए इंसान को पतला नहीं रख सकता है। ये सर्जरी तभी कारगर साबित हो सकती है जब खान-पान का अचे से ख्याल रखा जाये  सर्जरी की सलाह डॉक्टर शरीर की अच्छे से जांच करने के बाद ही देते हैं। ऐसा इसीलिए क्योंकि सभी का शरीर सर्जरी के लिए सही नहीं होता।  

डॉ. संजय बोरुदे, (कंसल्टिंग ओबेसिटी सर्जन, ब्रह्म कुमारीज ग्लोबल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, मुंबई), डॉ. अंषुमान कौशल, (कंसल्टेंट मिनिमली इनवेसिव बेरियाट्रिक सर्जन, कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल, गुडग़ांव), डॉ. अजय कश्यप, (एमडी ऑफ मेडस्पा, आर.के. पुरम दिल्ली), डॉ. मनीष मोटवानी , (लैप्रोस्कोपिक बैरिएट्रीक सर्जन, आस्था हेल्थ केयर एंड जसलोक हास्पिटल, मुंबई) बातचीत पर आधारित।

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