आम सर्वजन सुलभ और सुपाच्य भी है। यह इतना स्वादिष्ट, सुगन्धित और पौष्टिक तत्त्व युक्त होता है कि इसे फलों का राजा कहा जाता है।

सामान्य परिचय

आम तौर पर दो प्रकार का होता है-

1. जो आम बीज बो कर पैदा किया जाता है उसे देसी आम कहते हैं। यह रस वाला होता है। इसे चूस कर खाया जाता है या रस निकालकर आमरस के रूप में खाया जाता है।

2. जो आम कलम लगाकर पैदा किया जाता है उसे कलमी आम कहते हैं। इन दो भेदों के अलावा आकार, रंग, स्वाद और गुण इत्यादि के भेद से आम की और भी अनेक जातियां होती हैं जैसे-हाफुज, सफेदा, लंगड़ा, पैरी, नीलम, तोतापरी, राजभोग, मोहनभोग, फजली, दशहरी आदि। देसी आम रेशे वाला होने से रसदार होता है जबकि कलमी आम रेशे वाला नहीं होता अत: काटकर खाया जाता है। पचने की दृष्टि से रसवाला आम अच्छा होता है और चूस कर खाये जाने पर जल्दी पचता है।

गुण

  • पका हुआ आम मीठा, वीर्यवर्धक स्निग्ध, बलवर्धक, सुखदायक, भारी, वातनाशक, हृदय को बल देने वाला, वर्ण (रंग) को अच्छा करने वाला, शीतल और पित्त को न बढ़ाने वाला, कसैले रस वाला तथा अग्नि, कफ तथा वीर्य बढ़ाने वाला है।
  • आम के गुण, स्थिति के अनुसार अलग-अलग होते हैं। पेड़ पर पका आम भारी, वात का शमन करने वाला, मीठा तथा अम्ल व तनिक पित्त शामक होता है। पाल में पका हुआ आम पित्तनाशक, अम्ल रस रहित और विशेष रूप से मीठा होता है, लेकिन पाल से उतरा हुआ हो तो खराब स्वाद और दुर्गन्ध वाला होता है अत: ऐसे आम का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • कच्चे आम को कैरी या आमिया कहते हैं। कच्चा आम स्वाद में कसैला, तीनों दोषों को कुपित करने वाला तथा रक्तविकार उत्पन्न करने वाला होता है। कच्चे आम का छिलका उतार कर गूदे के टुकड़े कर धूप में सुखा लेते हैं जिसे आमचूर कहते हैं। यह दाल, शाक में डाला जाता है। यह खट्टा, कसैला, दस्तावर, धातुओं को दूषित करने वाला तथा वात व कफ को जीतने वाला होता है। आमचूर का अति सेवन नहीं करना चाहिए।
  • आम एक ऐसा अद्भुत वृक्ष है जिसके सिर्फ फल ही नहीं बल्कि इसके सभी अंग-प्रत्यंग औषधि-रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। अन्य अंगों के गुण इस प्रकार हैं।

आम का मौर- शीतल, रुचिकारी, ग्राही, वातकारक और अतिसार, कफ, पित्त, प्रमेह और रक्तप्रदर को नष्ट करने वाला होता है।

आम की जड़- कसैली, मलरोधक, शीतल, रुचिकर तथा कफ-वात का शमन करती है।

आम के पत्ते- आम के कोमल पत्ते कसैले, मलरोधक और त्रिदोष का शमन करते हैं।

आम की गुठली- मीठी, तूरी और कुछ कसैली होती है। वमन, अतिसार और हृदय प्रदेश की पीड़ा दूर करती है।

आम की छाल- संकोचक, रक्त स्राव बंद करने वाली, बवासीर, वमन और अतिसार नष्ट करती है।

उपयोग

आम को खाने के अलावा चिकित्सा में भी उपयोग किया जाता है।

आम का रस एवं दूध

आम का सर्वश्रेष्ठ और अत्यन्त गुणकारी उपयोग इसके रस और दूध का एक साथ सेवन करना है। पके आम के रस में विटामिन ए और विटामिन सी भारी मात्रा में मौजूद रहते हैं। नेत्र ज्योति तथा शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने के लिए विटामिन-ए और चर्म रोग व रक्त विकार नष्ट करने के अलावा, बाल, दांत व रक्त के लिए विटामिन-सी अच्छा काम करते हैं। आम के रस में पर्याप्त मात्रा में दूध मिला दिया जाए तो इसके गुणों में भारी वृद्धि हो जाती है और यह रक्तवर्धक टॉनिक का काम करता है। कमजोर, दुबले-पतले शरीर वाले लड़के-लड़कियां एवं रक्ताल्पता, क्षय, रक्तविकार, धातु-दौर्बल्य और वीर्यक्षय के रोगियों के लिए आम के रस व दूध का सेवन अत्यन्त गुणकारी होता है। इस मिश्रण में मृदु विरेचक गुण होता है अत: कब्ज के रोगियों के लिए यह बहुत उपयोगी होता है। अम्लपित्त (हायपरएसिडिटी), आंतों की कमजोरी, संग्रहणी, अरुचि, यकृत-वृद्धि यौनशक्ति की कमी आदि व्याधियों को दूर करने के लिए आम का रस और दूध का सेवन करना उत्तम है।

घरेलू नुस्खे

  • आम के वृक्ष की छाल लगभग 30-40 ग्राम वजन में लेकर मोटा-मोटा कूट लें और पाव भर पानी में डालकर शाम को रख दें। ऊपर से ढक दें। सुबह इसे खूब मसल कर छान लें और पी जाएं। सुजाक के रोगी को आम मिलता रहे तब तक यह नुस्खा प्रयोग करें। आम की गुठली की गिरी पीसकर, सूंघने से नकसीर में लाभ मिलता है।
  • आम के पत्तों को पानी में डालकर उबालें। जब पानी एक चौथाई शेष बचे तब उतार कर ठंडा कर लें और 1-2 चम्मच शहद डालकर गरारे करने व पी जाने से गला ठीक हो जाता है।
  • स्त्रियों के रक्त प्रदर और खूनी बवासीर के रोगियों के रक्त स्राव को रोकने के लिए, उन्हें आम की गुठली की गिरी का महीन चूर्ण 2-3 ग्राम की मात्रा में, जल के साथ सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। इसके कोमल पत्तों को पानी के साथ घोंट-पीसकर-छान कर, थोड़ी शक्कर मिलाकर पीने से भी लाभ होता है।
  • कच्ची कैरी को गर्म राख में दबाकर भूनकर, इसका रस निकालकर मिश्री मिलाकर पीने से लू का असर मिटता है। 
  • आमचूर को पानी में पीसकर त्वचा पर लेप करने से मकड़ी के विष का असर खत्म होता है। आम की गुठली की गिरी पानी में पीस कर जले हुए अंग पर लेप करने से तुरन्त ठंडक मिलती है। इनमें से किसी भी नुस्खे का सेवन, संबंधित रोग के ठीक न होने तक करना चाहिए।
  • आम का अधिक सेवन हानिकारक होता है। इससे अपच, रक्त विकार, ज्वर, कब्ज आदि रोग उत्पन्न होते हैं। आम का उचित एवं अनुकूल मात्रा में ही दूध के साथ सेवन करना चाहिए। खट्टा आम नहीं खाना चाहिए। आम खाने पर यदि अपच की स्थिति बने तो आधा चम्मच सोंठ चूर्ण, ठंडे पानी के साथ लें या एक गिलास दूध में सोंठ चूर्ण डालकर थोड़ी देर उबालें और पी लें। इसके सेवन से आम खाने से हुआ अपच ठीक हो जाएगा।
  • आम में अनेक पौष्टिक तत्त्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। विटामिन ए और सी आम में ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। आम की एक जाति कजरी होती है। उसमें सेब से 3 गुना और संतरे से 30 गुणा विटामिन ‘ए’ और ‘जी’ पाया जाता है। यह जीवन तत्त्व मात्र आम के गूदे में ही नहीं, बल्कि आम के छिलके में भी पाया जाता है। स्वास्थ्य एवं सौंदर्य की दृष्टि से आम का प्रयोग अत्यधिक आवश्यक है।
  • उपलों में भुनी हुई या पानी में औटाई हुई कच्ची कैरी को पानी में मसलकर उसके रस को छान लें। उसमें शक्कर, भुना हुआ जीरा, काली मिर्च, पिसा हुआ पुदीना एवं नमक इन सबको मिलाकर स्वास्थ्यवर्धक एवं स्वादिष्ट शर्बत बनाया जाता है। इसका प्रयोग करने से लू, धूप का प्रभाव मिट जाता है। भुनी हुई कच्ची कैरी के रस का शरीर पर मर्दन करने से ऊष्णता का असर नहीं होता है।
  • आम की कच्ची कैरी को चीरकर छोटी-छोटी फाड़ों में सुखाया जाता है। सूखने के बाद उसे अमचूर कहते हैं। इसे पानी में पीसकर लगाने से जहरीले जानवरों का जहर उतर जाता है।
  • आम का शर्बत कच्ची कैरी से बनता है। यह शर्बत दिल और जिगर के लिए फायदेमंद होता है। यह हैजे के रोगी के लिए अति उपयोगी है। हैजे के रोगी को दो-दो घंटे बाद 25 मि.ली. शर्बत से 125 मि.ली. पानी मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाएं। इससे रोग की प्रारंभिक स्थिति में शीघ्र लाभ होता है।
  • आम का मुरब्बा कच्ची कैरी से बनता है। यह पौष्टिक, धातु विकृति नाशक एवं क्षुधावर्धक होता है। इसे खाकर पानी नहीं पीना चाहिए। दूध पीया जा सकता है, लेकिन दूध पीकर इसे नहीं खाना चाहिए। यह एक महारसायन है। यह व्याधि नाशक, बल, वीर्यवर्धक, नवयौवन एवं नई स्फूॢत प्रदायक है। यह दिमाग और दिल को एक दिव्य शक्ति प्रदान करता है। कंठ में तेज और वाणी में ओज भरता है।
  • कच्ची कैरी की तीन प्रकार से चटनी बनाई जाती है। यह खाने में स्वादिष्ट, क्षुधा, अग्नि एवं बुद्धिवर्धक होती है, लेकिन अम्लपित्त के रोगी के लिए यह सर्वदा वर्जनीय है।
  • आम का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए रामबाण औषधि है। यह कोष्ठबद्धता को दूर कर शौच साफ लाता है।
  • आम का यदि शहद के साथ सेवन किया जाता है तो क्षय एवं प्लीहा से पिंड छूट जाता है।
  • आमपाक शक्कर एवं सुगंधित द्रव्यों के योग से आम रस के साथ बनाया जाता है। इसमें अतिश्रम की अपेक्षा रहती है। यह वीर्य, बल, बुद्धि एवं आयुवर्धक होता है। क्षय, संग्रहणी, सांस आदि की व्याधियों में अति उपयोगी होता है।
  • आम परिवार का प्रत्येक सदस्य औषधीय गुणों से भरा है, निर्दोष है। आम की जड़ मलावरोधक, वात-कफ नाशक होती है। आम के वृक्ष की टहनी दातुन के काम आती है। इससे मुख की दुर्गन्ध दूर होती है। आम वृक्ष का तना रक्तस्राव को बन्द करता है। आम वृक्ष का बौर मलावरोधक, अग्नि दीपक, पित्त, कफ नाशक माना जाता है। इसका क्वाथ एवं चूर्ण अतिसार में उपयोगी है। मच्छरों के प्रतिकारार्थ इसकी धूनी दी जाती है। आम की कोंपल पानी में पीस छान कर उसमें थोड़ी सी शक्कर मिलाकर पीने से बवासीर का खून बन्द हो जाता है। 25 ग्राम कोमल कोंपल का रस निकालकर उसमें 25 ग्राम मिश्री मिलाकर प्रयोग करने से रक्तप्रदर में अतिशीघ्र लाभ होता है। आम का पत्ता मलावरोधक, त्रिदोषनाशक, वमनप्रद एवं रक्तातिसार में लाभप्रद है। पत्तों के रस को गरम कर कानों में डालने से कर्णशूल में फायदा होता है।
  • आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और घाव आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नींबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है।
  • आम की छोल के दो प्रकार हैं ऊपर की व अंदर की होती है। ऊपरी छाल तिक्त रस युक्त, कसैली, सुगंधित, रुचिकर, दाहनाशक, मलावरोधक होती है। यह अपने कषाय रस युक्त उक्त गुणों के द्वारा शरीर के अन्दर के स्रोतों को संकुचित कर स्रावों को रोक देती है। प्रसवकालीन रक्तस्राव में इसका उपयोग अशोक छाल के समान होता है। इसी छाल के साथ जामुन, बेर, बबूल और आंवला वृक्षों की भी छालों को मिलाकर क्वाथ तैयार कर उसमें थोड़ी-थोड़ी मिश्री मिलाकर सेवन करने से अतिशीघ्र ही रक्तस्राव बन्द हो जाता है। ऊपरी छाल को दही के साथ पीसकर नाभि एवं उसके आसपास गाढ़ा लेप करने से अतिसार में विशेष लाभ होता है।
  • आम के फूल शीतल, रक्त शोधक, कफ, पित्त प्रमेह और अतिसार नाशक हैं। फूलों का क्वाथ एवं चूर्ण, इनके साथ चतुर्थ भाग मिश्री मिलाकर प्रात:-सायं शीतल जल के साथ सेवन करने से अतिसार, प्रमेह, रक्तदोष, दाह एवं पित्त के कष्ट दूर हो जाते हैं। फूलों के रस में शक्कर मिलाकर सेवन करने से भी सारे रोग दूर भाग जाते हैं।
  • आम फल को दो प्रकार से काम मेें लिया जाता है- कच्चे और पक्के। कच्ची कैरी गुठली रहित एवं गुठली सहित दोनों को नहीं खाना चाहिए, क्योंकि ये अधिक खट्टी, वातपित्तवर्धक, रक्त विकृति कारक होती है। यदि इनको खाना हो तो शक्कर, धनिया, जीरा एवं सेंधा नमक के साथ खाएं अन्यथा स्वरभंग दंतहर्ष आदि व्याधियों का शिकार बनना पड़ता है।
  • आम की गुठली को पत्थर पर घिसकर लेप करने से विष दूर हो जाता है। आम की गुठली की गिरी, बेलगिरी और मिश्री तीनों का समभाग चूर्ण बनाकर उसे पांच ग्राम की मात्रा में जल के साथ ग्रहण करें। इससे अतिसार में लाभ होता है। भुनी हुई गुठली की गिरी का चूर्ण बनाकर उचित मात्रा में शहद के साथ बच्चों को सेवन कराएं। इससे अतिसार हवा के साथ उड़ जाता है। आम की गुठली कि गिरी को बारीक पीसकर सूंघने से नकसीर बन्द हो जाती है।
  • आम की गुठली घिसकर पागल कुत्ते, बिच्छू एवं सामान्य सांप के द्वारा काटे हुए स्थान पर लगाने से विष उतर जाता है।

शक्तिवर्धक नुस्खे

  • यदि भोजन करना बन्द करके कम से कम 40 दिन तक केवल आम का रस और दूध का सेवन किया जाए तो बहुत लाभ होता है। इसके दो तरीके हैं। एक तो पेट भर कर आम चूस कर ऊपर से उबाल कर ठंडा किया हुआ मीठा दूध पीना चाहिए या आम का रस निकाल कर उसमें आधी मात्रा में दूध मिलाकर थोड़ा सा सौंठ चूर्ण और 1-2 चम्मच शुद्ध घी मिलाकर सुबह और शाम पीना चाहिए। पहले दूध पीकर बाद में आम का रस पीया जा सकता है। यदि एक से दो माह तक यह प्रयोग कर लिया जाए तो शरीर में नया जोश, भारी बल और रक्त की वृद्धि होती है तथा चेहरा कांतिमय हो जाता है। 
  • गर्भवती स्त्रियों के लिए आम का रस और दूध का सेवन फायदेमंद होता है। यौन शक्ति में कमी का अनुभव करने वालों के लिए यह प्रयोग बेजोड़ है। 

यह भी पढ़ें –जायकेदार व तरावट युक्त तरबूज

स्वास्थ्य संबंधी यह लेख आपको कैसा लगा? अपनी प्रतिक्रियाएं जरूर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही स्वास्थ्य से जुड़े सुझाव व लेख भी हमें ई-मेल करें-editor@grehlakshmi.com