जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क में थोड़ी विक्षिप्तता, पागलपन, उन्माद, चिड़चिड़ापन अस्थिरता, अनिश्चितता, अत्यधिक क्रोध, अकर्मण्यता और अत्यधिक आलस्य की स्थिति पैदा हो गई है, यदि वह ज्ञान मुद्रा रूपी परम औषधि का प्रयोग करें तो निश्चित ही उनके मस्तिष्क संबंधि स्वास्थ्य में स्वाभाविकता आ जाएगी। प्राचीन काल में एक राजा को मस्तिष्क संबंधी विकार, मानसिक विकृतियां, पागलपन आरंभ हो गया, फलत: राज्य कार्य अस्त-व्यस्त होने लगा। महारानी और मंत्री परिषद के अलग से विचार विमर्श के अन्तर राजा के उपचारार्थ तत्कालीन वैद्यों को बुलाया, किन्तु राजा किसी भी औषधि को लेने को तैयार नहीं थे, साथ ही वैद्यों आदि को देखकर कहने लगे कि मुझे किसी प्रकार का रोग नहीं है, आप लोग क्यों आए हैं।

मैं कोई औषधि नहीं लूंगा। बार-बार वैद्यों के देखने से राजा विक्षिप्त की तरह बड़बड़ाने और चिल्लाने लगे, अंतत: राजा का वैद्यों द्वारा उपचार असंभव हो गया। एक दिन राजा रानी अपने कुछ अनुचर-अनुचरियों के साथ वन विचरण के लिए गए। वन में घूमते-घूमते राजा कहीं दूर निकल गए और रानी अपने दास-दासियों के साथ समीपस्थ उद्दालक ऋषि के आश्रम में चली गई। बुन्देलखंड में स्थित वर्तमान उरईनगर ही महर्षि उद्दालक ऋषि की तपोभूमि थी,अत: महर्षि के नाम पर ही उस नगर का नाम पड़ा। शांत अरण्य में स्थित यह आश्रम परम मनोहर था, पहले रानी आश्रम में पहुंची। रानी ने प्रणाम करके आसन ग्रहण किया।

महर्षि ने आशीर्वाद देने के उपरांत प्रश्नात्मक ढंग से रानी की ओर देखा। रानी ने महर्षि को राजा की मस्तिष्क संबंधी बीमारी के बारे में विस्तारपूर्वक बताया तथा उपचार हेतु प्रार्थना की। महर्षि उद्दालक ने रानी को सांत्वना देते हुए कहा कि ‘योग मुद्राओं के द्वारा ही बिना किसी औषधि के राजा के मस्तिष्क का संपूर्ण विकार मुद्राविज्ञान की अलौकिक शक्ति द्वारा स्वल्प समय में अवश्य ही दूर हो जाएगा।Ó इतने में राजा भी वहां पर उपस्थित हो गए और महर्षि को प्रणाम करके उपदेश हेतु प्रार्थना की, महर्षि उद्दालक के आशीर्वाद के अनन्तर राजा को मस्तिष्क संबंधी स्वास्थ्य प्रदान हेतु योगमार्ग की उपासनाओं के संबंध में सविस्तार बताते हुए दैनिक जीवन में मन मस्तिष्क की एकाग्रता के साथ ही समस्त स्नायुमंडल को शक्तिशाली बनाने के लिए संध्या, पूजन आदि में नित्य प्रयुक्त ज्ञान मुद्रा को करने का विशेष रूप से उपदेश दिया और कहा राजन! यदि अपने संध्या वंदन आदि के अनन्तर भी अधिक से अधिक इस ज्ञान मुद्रा में रहने का प्रयत्न किया तो आपके जीवन में अलौकिक चमत्कार उपस्थित हो जाएगा।

फलत: आपका मन सभी ओर से सर्वप्रकार से पूर्ण रूपेण शांत हो जाएगा, स्मरण शक्ति अभूतपूर्व विकास को प्राप्त होगी, आपका मन और मस्तिष्क इस महत्त्वपूर्ण मुद्रा के प्रयोग से सूक्ष्मावस्था को प्राप्त होकर और ब्रह्मïा से संबंधित उलझे हुए प्रश्नों को परा और अपराप्रकृति के गुह्र रहस्य को समझने योग्य अद्भुत रूप से समर्थ हो सकेगा। सांसारिक एवं राज्य संबंधी कार्यों का  संचालन तो ज्ञान मुद्रा के प्रयोग से प्राप्त हुआ। उस बौद्धिक और मेधावी शक्ति की समझ बहुत साधारण सी बात है, सांसारिक जनों के लिए ज्ञान मुद्रा का निरन्तर अभ्यास चाहे वह व्यक्ति राजनीतिज्ञ, सामाजिक, व्यापारिक या अन्य किसी भी प्रकार का कार्य करने वाले ही क्यों न हो यह सभी के लिए परम उपयोगी और हर क्षेत्र के साधक को एक नवीन प्रकाश, प्रतिभा और शांति प्रदान करेगा।

राजा ने महर्षि उद्दालक से प्रभावित होकर ज्ञान मुद्रा का निरन्तर अभ्यास आरंभ कर दिया। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे राजा की बुद्धि में आया विकार, जो वैद्यों के लिए प्रश्न चिह्नï था, यह योग की इस छोटी सी क्रिया, विशेष ज्ञान मुद्रा के द्वारा ही हल हो गया। राजा का उन्माद, वह चिड़चिड़ापन, विचित्र पागलपन बिना औषधि के कुछ ही काल में समूल नष्ट हो गया। इसलिए सभी साधकों और रोगियों को अपने मस्तिष्क को शक्तिशाली बनाने के लिए ज्ञान मुद्रा से ये लाभ मिलता है, किसी रोगी या साधक को ये मुद्रा कराई जाए तो शीघ्र ही अत्यधिक लाभ दृष्टिगोचर हो सकेगा। इसके अभ्यास द्वारा मस्तिष्क के ज्ञान तन्तुओं में मानसिक तनाव होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने की क्षमता आ जाती है, और इसके मुद्रा के सतत् अभ्यास से सर्वप्रकार की अन्मयस्कता भी दूर होती देखी गई है। आज अनिद्रा रोग बुद्धिजीवियों एवं अत्यधिक व्यस्त लोगों के लिए एक ज्वलंत समस्या बना हुआ है, जिसका निदान आधुनिक चिकित्सकों और चिकित्सा पद्धतियों के पास नाममात्र को ही है।

बलात् निद्रा लाने वाली औषधियों एक ओर लोगों के स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट उपस्थित कर रही हैं। और कितने ही रोगियों पर नितान्त असफल होती जा रही हैं। भारतीय योग तत्त्व मुद्रा विज्ञान में ऐसे रोगों के लिए अत्यधिक चमत्कारिक और प्रभावशाली सरल प्रक्रियाएं विद्यमान हैं, अनिद्रा रोग के निवारणार्थ ज्ञान मुद्रा को साधारण स्थिति में किसी भी प्रकार अपने व्यस्त कार्यक्रम में भी एक हाथ या दोनों हाथों से करते रहने पर वह, अपना स्थायी प्रभाव निद्रा औषधि की तरह डालेगी। यदि दोनों हाथों से निरन्तर अभ्यास चलतेफिरते, सोते-जागते हुए भी किया जाए तो और अधिक लाभदायक सिद्ध होगा। बहुत सी चिन्ताओं, मानसिक कार्यों, निरन्तर घबराहट, व्याकुलता एवं भय के परिणामस्वरूप जब स्नायुमंडल प्रताड़ित होता रहता है तो अनिद्रा रोग की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। बहुत से रोगियों पर, जिन्हें कई वर्षों से स्वाभाविक निद्रा नहीं आती थी, कई-कई बार कितनी ही प्रकार की नींद की गोलियां का निरन्तर सेवन करना पड़ रहा था।

ज्ञान मुद्रा का अभ्यास कराने पर तीसरे दिन ही चमत्कार हुआ। उन्हें स्वभाविक नींद आने लगी, स्लीपिंग डोज छूट गई। वास्तव में यदि ज्ञान मुद्रा को योगिक ट्रेन्कुलाइजर कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

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