तरबूज ग्रीष्म ऋतु का रसयुक्त फल है। इसकी गणना ग्रीष्म ऋतु में शीतलता प्रदान करने वाले फलों में की जाती है। गर्मियों के आगमन के साथ ही तरबूज की बहार आ जाती है। यह ऊपर से हरा, भीतर से लाल व काले बीजों वाला स्वादिष्ट फल होता है, जिसे देखकर ही हमारा मन मचल जाता है। गुणों तथा जायकेदार होने के वजह से इसे अद्वितीय फल माना गया है। तरबूज आयरन, गंधक, तांबा, कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ए, थायमिन, राइबोफ्लेविन व एस्कार्बिक एसिड का बेहतर स्रोत है। तरबूज के 100 ग्राम गूदे में 16 कैलोरी ऊर्जा होती है। मौसमी फलों का इस्तेमाल मौसम में होने वाले प्रकोपों से बचाव करता है। भीषण गर्मी में जब बड़े-बड़े तालाब, पोखर सूख जाते हैं। ऐसे में आदमी के तन में जलीयांश की मात्रा में कमी स्वाभाविक है। लेकिन तरबूज में वह प्रभाव है, जो तन में जलीयांश की मात्रा में संतुलन बनाए रखता है। यह चिकित्सकीय गुणों से भी परिपूर्ण है। इसमें बदन की कोशिकाओं को निरोगी रखने के चमत्कारी गुण पाये जाते है। तरबूज के बीजों की गिरी से तमाम औषधियां बनती हैं। शोधकर्ताओं के  मुताबिक तरबूज के गूदों में पैक्टिन की मात्रा अधिक होती है। इसलिए इससे लज्जादार तथा ताकतवर जैम, जैली आदि तैयार किए जाते हैं। तरबूज का मोटा छिलका भी बेकार नहीं होता यह गाय, भैंस आदि पशुओं के आहार केरूप में प्रयोग में लाया जाता है।

तरबूज के विभिन्न नाम

तरावट देने वाले तरबूज को अनेक भाषाओं एवं जगहों पर तमाम नामों से जाना जाता है यथा- तरबूज, हिंदवाना, इलींदा (हिंदी), कलिंट्र, मांस फल, चित्रफलका (संस्कृत), कलिंगड (मराठी), कालिगडूं (गुजराती), मतीरा, हिंदवाना (पंजाब), तरबूजा, तरमूज (बंगला), पुच्चकोया (फारसी), तरबूज (उर्दू), वाटर मेलन (अंग्रेजी), सिट्रयुलस वलगेरिस (लैटिन) आदि।

तरबूज की फसल

तरबूज की प्रसिद्धि सदियों पुरानी है। भारत में तरबूज कब और कहां से आया, इस तथ्य की कोई सही जानकारी नहीं है। लेकिन खबरों से कुछ ऐसे प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जिनसे यह जानकारी मिलती है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के समय में भी तरबूज का विशेष स्थान था। इसका जन्म स्थान अफ्रीका की गर्म धरती है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में भी तरबूज का उल्लेख मिलता है। आज तरबूज की फसल अमूमन समस्त देश में की जाती है। हमारे देश में जिस इलाके में बलुई मिटटी  मौजूद है, वहां इसकी फसल भरपूर मात्रा में पैदा होती है। किंतु इसकी ज्यादातर फसल उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों, नदियों के रेतीले भागों एवं राजस्थान के आसपास के क्षेत्रों में की जाती है। फिर भी तरबूज की पैदावार करने वाले मुल्कों में भारत की गणना नहीं की जाती।

तरबूज की किस्में

तरबूज की तमाम क्षेत्रीय व अधिक मात्रा में पैदा होने वाली प्रजातियां प्रसिद्ध हैं। शुगर बेनबी, अशायी यमातो, न्यू हेम्पशायर मिडगट, पूसा बेदाना, अर्काज्योति, अनारकली, फर्रुखाबादी, फैजाबादी, भागलपुरी, दुर्गापुर, केसर आदि तरबूज की विविध प्रजातियां हैं। उत्तर प्रदेश में अधिक्तर शाहजहांपुरी,  जैनपुरी, लाल, फर्रुखाबादी, फैजाबादी, भागलपुरी, इलाहाबादी एवं बरेली कला प्रजातियां बड़ी तरबूजों वाली हैं। ज्यादातर दस-बारह किलोग्राम के तरबूज पाए जाते हैं, लेकिन 40 किलोग्राम तक के तरबूज भी पाए गए हैं। बड़े तरबूज व्यावसायिक आधार से अच्छे होते हैं, लेकिन छोटे परिवार के लिए ज्यादा महंगे पड़ते हैं। इस वजह से छोटे परिवार ज्यादातर इस कम लागत एवं पोस्टिक फल से वंचित रह जाते हैं। इस उलझन को निपटाने के लिए नई दिल्ली के भारतीय संकाय ने शुगर बेबी नामक प्रजाति विकसित की है। इस गाढ़े हरे रंग की जाति के फलों का भार लगभग दो किलो से तीन किलोग्राम होता है। इसका गूदा लाल तथा बहुत अधिक मीठा होता है। इस प्रजाति को शीघ्र ही खेतों के मध्य लोकप्रिय करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों ने तरबूज को फलों के नहीं, अपितु सब्जियों के मध्य स्थान दिया है, जिसकी वजह कुकरबिटेसी नामक इसका परिवार है, जिसमें सब्जियां आती हैं। कद्दू , घिया, लौकी, परवल, तोरई आदि इसी समुदाय से वास्ता रखती हैं। ये सब्जियां भी गुणों से परिपूर्ण होती हैं।

इन बातों का रखें ध्यान

तरबूजों में प्रचुर मात्रा में मीठापन होता है। वैसे मीठा तरबूज खरीदते समय तीन बातों का ख्याल रखना चाहिए। प्रथम- फल का डंठल शुष्क हो, द्वितीय-जहां तरबूज पृथ्वी का स्पर्श करता है, वहां श्वेत या हल्के रंग का दाग होता है जो पकने पर हल्का पीला पड़ जाता है एवं तृतीय-फलों पर हाथ से थपकी मारने से पके फल से भारी ध्वनि निकलती है। तरबूज खरीदते समय यह ध्यान रखें कि कटा हुआ या बासी फल कदापि न लें। तरबूज को शीतल जल में एक-दो घंटे रखने के पश्चात ही खाना चाहिए। तरबूज निराहारमुख नहीं इस्तेमाल करना चाहिए। आहार के बाद थोड़ीथोड़ी मात्रा में काला नमक एवं कालीमिर्च बुरककर उसका सेवन करना चाहिए। इधर-उधर ले जाने पर फल टूटने न पाए, इसके लिए यह परामर्श है कि फलों को खेतों से दोपहर के पश्चात ही तोड़ा जाए।

तरबूज के फायदे- आयुर्वेद के अनुसार तरबूज का रस मस्तिष्क और हृदय को ताजगी प्रदान करता है। यह प्रकृति की तरफ से प्राप्त अनमोल पदार्थ है। यह गर्मी के मौसम में उत्पन्न भीषण गर्मी तथा धूप के प्रभाव से उत्पन्न खुश्की मिटाता है। इससे बेचैनी एवं घबराहट का शमन होता है। यह मलशोधक है। यह बुखार, तृषा, सूजाक, ल्यूकोरिया, कामला (पीलिया), मसाने की पथरी, प्यास, थकान, दाह, निबंध, रक्तचाप, जोड़ों की पीड़ा, अर्श तथा बदन में जल की न्यून्ता इत्यादि को समाप्त करता है, लेकिन दमा के मरीजों को तरबूज का रस प्रयोग नहीं करना चाहिए। गैस से पीड़ित लोग बिना रोक-टोक का इस्तेमाल कर सकते हैं। तरबूज के बीज- तरबूज से अधिक पोषक तत्त्वों से युक्त इसकी बीज की गिरी होती है। इसके बीजों में तमाम गुण पाए जाते हैं, इसलिए संसार के कुछ भागों में बड़े बीजों वाली प्रजातियां केवल बीज पाने के लिए उत्पन्न की जाती हैं। इसकी गिरी मिष्टान , खीर व बेहतरीन तरह की नमकीन आदि बनाने में प्रयोग की जाती है। इन गिरियों में प्रोटीन व तेल प्रचुर मात्रा में मिलता है। बीजों के सेवन से शारीरिक मानसिक शीतलता मिलती है। अत: इन्हें पेय पदार्थ शर्बत एवं ठंडाई आदि में इस्तेमाल किया जाता है।

भ्रांति

कुछ व्यक्तियों का कहना है कि तरबूज का सेवन करने के बाद जल पीने से हैजा हो जाता है। यह अफवाह निराधार और असत्य है। हैजा होने की मूल वजह गंदगी है। मक्खियों के किसी भी भोज्य वस्तुओं के ऊपर बैठने और उसके बाद उस वस्तु को खाने से हैजा का संक्रमण होता है। अत: तरबूज से परहेज करने की तनिक भी जरूरत नहीं है। हां, ज्यादा समय से काटकर रखे हुए तरबूज का हरगिज इस्तेमाल न करें, यह निश्चित ही रोगों की जड़ है।

तरबूज के औषधीय प्रयोग

● गर्मी से त्वचा, विशेषकर पैर बहुत गर्म हो जाते हैं। तरबूज के टुकड़ों को पैर पर लगाने से गर्मी दूर होती है।

● तरबूज के छिलकों को सारे बदन पर मलने से त्वचा लावण्यम तथा कांतिमय होती है।

● ग्रीष्म ऋतु में इस फल को खाने से विकराल लू से बचाव होता है।

● यदि किसी को गर्मी के वजह से सिर की पीड़ा हो रही हो तो तरबूज का गूदा मलमल के महीन एवं साफ कपड़े से निचोड़ कर कांच के गिलास में जरा-सी मिश्री या चीनी डालकर सेवन करना चाहिए।

● विबंध से राहत पाने के लिए तरबूज को लगातार कुछ दिनों तक खाते रहना चाहिए। क्योंकि तरबूज का सेवन करने से जहां पेशाब का प्रवाह बना रहता है, वहीं दस्त भी साफ होता है।

● तरबूज के 175 ग्राम गूदे के रस में आधा चम्मच अदरक और दो चम्मच नारंगी का रस मिला दें। इसमें ठंडा जल मिलाकर शर्बत तैयार कर लें। यह शर्बत विटामिनों, पोषक पदार्थों से भरपूर होता है। रोजाना 40 दिन तक यह शर्बत पीने से मुख पर लावण्य आता है और शरीर सुगठित होता है।

● मीठे घिया व तरबूज को पानी में घोंटकर पतला लेप तैयार करें। इस लेप को फटे और शुष्क होंठों पर लगाने से लाभ होता है।

● रोजाना तरबूज का इस्तेमाल करने से मूत्र स्वच्छ आता है और मूत्र की दाह और दर्द आदि परेशानियों का शीघ्र निदान होता है।

● तरबूज के बीजों की गिरी और मसूर की दाल को समभाग में लें। उसको गाय के दूध के साथ घोल लें। मुख पर इसका लेप करने से सभी प्रकार के दाग-धब्बे दूर हो जाते हैं।

● ग्रीष्म काल में तरबूज का सेवन बेहद फायदेमंद होता है। इससे कुछ ही काल में मोटापा कम होकर शरीर में सुडोलता और स्फूर्ति आ जाती है।

● इस फल के गूदे में 96 प्रतिशत जल पाया जाता है। यह तृषा शांत करने के साथ-साथ मस्तिष्क को भी शांत करता है।

● गुर्दे की अश्मरी (पथरी) से निजात पाने के लिए नियमित रूप से 2-3 गिलास तरबूज का रस पीएं। साथ ही तरबूज की गिरी को जल में पीसकर एक गिलास शर्बत बनाकर सेवन करें। पेशाब में एल्ब्यूमिन की वृद्धि करने वाली वस्तुओं का हरगिज इस्तेमाल न करें।

● तरबूज के रस को जीरा तथा शक्कर के साथ मिलाकर पीने से तन की ऊष्णता तथा मूत्र रोग की समस्या का निदान होता है। 

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