हर घर की जान होती है, बच्चों की मुस्कान और उनका भोलापन पर वह आज लगभग कहीं खो सा गया है…? पर कहाँ, क्यों, कैसे—किसको कहे इसके लिए जिम्मेदार ? शायद हम यानि माता पिता और परिवार ही बच्चों की इस दशा का कारण हैं[जाने कैसे] 

जिस तरह से समय में बदलाव आया है | जीवन जीने का तरीका ही बदल गया हैं | उसी तरह से माता पिता ने भी बच्चों के पालन पोषण का तरीका भी बदल लिया है | माता पिता के इस बदलाव ने ही बच्चों को उपहार में दिया आज तनाव-अफसाद और हाइपर नेस यानि जल्दबाजी इस जल्दबाजी ने बच्चों को ऐसा गुमराह किया की चाहते  हुए भी माता पिता उनको सही राह पर नहीं ला पा रहे हैं, माता की लोरी के साथ सोना और पिता के कंधो पर चड़ना तो बच्चों को मिलना सपनो जैसी बात हो गयी है | आज के बच्चों को फ़ास्ट लाइफ पसंद है जिसमे उनको किसी की रोक टोक पसंद नहीं | जो कल उनको माता पिता ने अपनी सुविधा को देखते हुए वातावरण दिया, आज वही उनकी पसंद और जीवन जीने का तरीका जब बन गया तो समाज और माता पिता घबरा गए हैं और बच्चों की इस बदलाव को नाम मिला हाइपर नेस, पर कभी आपने सोचा की बच्चों ने हाइपर नेस का ख़िताब पाकर क्या खोया और क्या पाया ?

शारीरिक बदलाव…आज हाइपर नेस के कारण बच्चों में जो जल्दबाजी आ गयी है | उसके कारण बच्चों का स्वास्थ्य इतना अधिक नाजुक हो चुका हैं कि शुगर, मोटापा, थाइरोइड और दिल के रोग होना आम बात हो चली है, नीद ना आना, देर रात तक जागना तो आज हर बच्चे के जीवन से बुरी तरह चिपक गया है जो बच्चों को जीवन की सही दिशा से लगभग दूर कर चला है | आज के बच्चों में अवसाद और छोटी छोटी बातो पर नाराज होना और निराश होकर चीखना-गुस्सा करना आम बात हो गयी है | डॉक्टर प्रियंक सोढानी का मानना है, की अगर आज भी माता पिता ने बच्चों और अपने बीच आई दूरी को दूर नहीं किया तो वो दिन दूर नहीं होगा जब भारत में विदेशो की तरह बच्चों के घर से भागने की और माता पिता से अलग रहने की बात आम हो जाएगी और स्वास्थ्य और सब्र, जज्बात जैसे शब्द तो उनके जीवन से कभी जुड़ ही नहीं पायेगे | इस लिए माता पिता को दोबारा से भारतीय जीवन मूल्यों के हिसाब से अपने बच्चों का लालन पालन करना होगा, ताकि बच्चों को दोबारा मानसिक और शारारिक मजबूती मिल सके |

सामाजिक और पारिवारिक बदलाव…बदलते वक़्त में एकल परिवारों के बढने और सयुक्त परिवारों के घटने से बच्चों का जीवन आज अकेलेपन से भर गया है | दादा-दादी का साथ उनको मिल ही नहीं रहा बाकि ताऊ और चाचा के रिश्ते तो लगभग गायब ही हो गए है, बुआ, मासी, मामा और ननिहाल, ददिहाल जैसे रिश्तो को एकल परिवारों ने दूर उठा फैका है, तो बच्चों का हाइपर होना तो लाजमी ही है, क्योंकि जो बचपन बहुत सारे चचेरी, ममेरी, तयेरी, फुफेरी बहन और भाईयो  के साथ बितना चाहिये वो मोबाईल और टीवी और इंटर नेट के साथ अकेले और उदासी में बीत रहा है, क्योंकि माता पिता दोनों ही के कामकाजी होने के कारण बच्चों को जो सूनापन घरो में मिल रहा है, उस अकेलेपन को दूर करने के लिए कोई अपना उनके पास उस वक़्त नहीं होता है, क्योंकि एकल परिवारों में उनको समय देने वाला और कोई नही होता है, माता पिता के अलावा तब वो अपना वक़्त कैसे काटे | सुबह के घर से निकले माता पिता जब शाम और रात को घर आते है तो उनके पास थकावट के अलावा कुछ नहीं होता अपने बच्चों को देने के लिये जबकि बच्चों के पास उनकी जरूरतों का एक बड़ा पिटारा होता है | जिसको वो माता पिता के आते ही खोलना चाहते है पर जब बच्चों को माता पिता से निराशा ही हाथ लगती है और वो भी फटकार के साथ तब वो ना केवल दुखी होते है साथ ही कई बार तो माता पिता से नफरत करके गलत रास्ते पर  भी निकल जाते है, और स्वभाव में उनके उदासी और हाइपर नेस आ जाती है फिर जो उनको माता पिता से मिला होता है वहीं वो दुनिया में सबको देते है, और सब्र, नम्रता, नियम, कानून, संस्कृति जैसे शब्दों से सदा के लिए अलग हो होकर रह जाते है | तो माता पिता को जरुरत है की वो अपने बच्चों को भरपूर समय और साथ दे ताकि बच्चों को अपने मन की बातें कहने का अवसर मिले, और उनका जीवन अपनों के प्यार से हरा भरा  रहे, और बच्चे आक्रोश में आकर गलत कार्य न करे…

टीवी से आया बदलाव बच्चों में…बच्चों में लगातार टीवी का बढता झुकाव और इंटरनेट की बढती लत ने बच्चों को एक ऐसी दुनिया से जोड़ दिया है जो की मात्र भ्रम और वारदातों से भरी पढ़ी है | अफ़सोस इस बात का है की बच्चे इस दुनिया को सही और सुंदर मान कर इसको अपना रहे है | आज हालत ये हो गयी है, की शहर के साथ साथ गावों में भी टीवी के मायाजाल में फसकर बच्चे अपना जीवन दाव पर लगा बैठे है, और हाइपर नेस का शिकार शहर के साथ साथ गाँव के बच्चे भी हो रहे हैं, जिससे इसका असर भारत की संस्कृति पर पड़ रहा है |

हाइपर नेस के दुष्परिणाम बच्चों पर ये हो रहे है, नींद न आना, भूक का कम हो जाना, वजन का कम या बढना, पढाई में मन न लगना, नशाखोरी की लत लग जाना, जल्दी गुस्सा करना या आपा खोना, विकास का रुक जाना, आत्मविश्वास में कमी आना…

क्या करें

  • अगर बच्चों में ये लक्षण माता पिता देखे तो तुरंत सजग होकर घर का वातावरण बदले और अपनी व्यस्त समय में से बच्चों की लिये वक़्त रखे…
  • उनसे उनके मन की बाते जाने और अपने मन की उनसे कहे
  • कोशिश करे की बच्चों के सोते और उठते वक़्त आप उनके साथ हो आफिशियल काम को घर पर कम ही करे अगर करे भी तो बच्चों को बता दे और जल्दी उसके होते ही फिर बच्चों के साथ जुड़ जाये
  • घर में वातावरण एकदम शांत और खुशनुमा रखे छोटी छोटी बातों पर न खुद लडाई करे और न ही बच्चों को गलत बोले
  • बच्चों को देश और संस्कृति और अपने परिवार के रीतिरिवाजों को बताये उनको भगवान् में विश्वास और पूजा पाठ करना सिखाये
  • साथ ही बच्चों में  आतुरता नहीं बल्कि सब्र की आदत डालने की लिये पहले इन चीजों को खुद अपनाये और फिर बच्चों को इन सबसे जोडें
  • पारिवारिक रिश्तों को खुद सम्मान दे और बच्चों से भी दिलवाए अगर ये सब बाते बच्चे सीख गए तो फिर बच्चों को हाइपर नेस कभी अपनी गिरफ्त में नहीं ले सकता ये सत्य है |

डाक्टर की सलाह कब जरुरी होगी…अगर इन बातों से बात न बने और बच्चों की आदत में कोई बदलाव न आये तो डाक्टर से  मशवरा करे, दवाये शुरू कराये, योग कराये, क्योंकि अगर बच्चा ओवर हाइपर हो चुका है तो उसको इलाज की जरुरत होगी, बिना इलाज उसका शांत होना संभव नहीं होगा…अगर इलाज वक़्त पर नहीं हुआ तो बच्चा मानसिक रूप से तो बीमार रहेगा ही साथ ही शारीरिक रूप से भी खुद को और दूसरो को घायल कर सकता है| तो अगर बच्चा हाइपर ज्यादा हो चुका है, तो उसको बदलने से पहले खुद को बदले और बच्चे को अपना भरपूर वक़्त देकर उसकी  हाइपर नेस को दूर करे और बच्चे को सुंदर भविष्य दे और एक अच्छा इंसान बनाये…

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